" /> मृत्यु पर विजय दिलाता है महामृत्युंजय मंत्र!

मृत्यु पर विजय दिलाता है महामृत्युंजय मंत्र!

शिव पुराण कथा के अनुसार शिव ही ऐसे भगवान हैं, जो शीघ्र प्रसन्न होकर अपने भक्तों को मनचाहा वर दे देते हैं। वे सिर्फ अपने भक्तों का कल्याण करना चाहते हैं, वे यह नहीं देखते कि उनकी भक्ति करनेवाला इंसान है, राक्षस है, भूत-प्रेत है या फिर किसी और योनि का जीव है। शिव को प्रसन्न करना सबसे आसान है। एक समय की बात है जब महादेव की अर्धांगिनी देवी पार्वती, बाल्यावस्था में अपनी माता मैना देवी के साथ मार्वंâडेय ऋषि के आश्रम में रहती थीं। पार्वती देवी एक दिन असुरों के कारण संकट में पड़ गईं और महादेव ने उनके प्राणों की रक्षा की।
मैना ने जब अपनी पुत्री की जान पर आई आपदा के बारे में सुना तो वह अत्यंत दुखी और भयभीत हो गईं। ऋषि मार्वंâडेय ने उन्हें जब बताया कि वैâसे महादेव ने देवी पार्वती की रक्षा की, पर वह तब भी संतोष न कर सकीं, मैना देवी विष्णु भगवान की उपासक थीं, जिस वजह से शिव की महिमा में जरा भी विश्वास नहीं रखती थीं, शिवजी ठहरे वैरागी और श्मशान में रहनेवाले तो भला वह वैâसे उनकी पूजा करें?
तत्पश्चात ऋषि मार्वंâडेय ने मैना को शिव भगवान की महिमा के बारे में बताने का विचार किया और उनको यह कथा विस्तार से बताई- जब मार्वंâडेय ऋषि केवल ग्यारह वर्ष के थे, तब उनके पिता ऋषि मृकण्डु को गुरुकुल आश्रम के गुरु से यह ज्ञात हुआ कि मार्कंडेय की सारी शिक्षा-दीक्षा पूर्ण हो चुकी है और अब वे उन्हें अपने साथ ले जा सकते हैं।
क्योंकि उन्होंने सारा ज्ञान इतने कम समय में ही अर्जित कर लिया और अब उनको और ज्ञान देने के लिए कुछ शेष नहीं था। यह जानने के बाद भी की उनका पुत्र मार्वंâडेय इतना बुद्धिमान और ज्ञानवान है, उनके माता-पिता खुश नहीं हुए। मार्वंâडेय ने जब पूछा की उनके दु:ख का कारण क्या है? तब उनके पिता ने उनके जन्म की कहानी बताई कि पुत्र की प्राप्ति हेतु उन्होंने और उनकी माता ने कई वर्षों तक कठिन और घोर तप किया है। तब भगवान महादेव प्रसन्न होकर प्रकट हुए और उनको इस बात से अवगत कराया कि उनके भाग में संतान सुख नहीं है, परंतु उनके तप से प्रसन्न होकर उनको पुत्र का वरदान दिया और उनसे पूछा कि वह वैâसा पुत्र चाहते हैं, जो बुद्धिमान ना हो पर उसकी आयु बहुत ज्यादा हो या ऐसा पुत्र जो बहुत बुद्धिमान हो परंतु जिसकी आयु बहुत कम हो।
मृकण्डु और उनकी पत्नी ने कम आयुवाला पर बुद्धिमान पुत्र का वरदान मांगा, महादेवजी ने उनको बताया कि यह पुत्र केवल बारह वर्ष तक ही जीवित रहेगा, वह फिर विचार कर लें, पर उन्होंने वही मांगा और महादेव उनको वरदान देकर अंतर्ध्यान हो गए। ऋषि मृकण्डु ने यह सब अपने पुत्र को बताया, जिसको सुनने के बाद वह बहुत दुःखी हुआ, यह सोचकर की वह अपने माता-पिता की सेवा नहीं कर सकेगा।
परंतु बालक मार्वंâडेय ने उसी समय यह निर्णय किया कि वह अपनी मृत्यु पर विजय प्राप्त करेंगे और भगवान शिव की पूजा से यह हासिल करेंगे। बालक मार्वंâडेय ग्यारह वर्ष की आयु में वन को चले गए। लगभग एक वर्ष के कठिन तप के दौरान उन्होंने एक नए मंत्र की रचना की जो मृत्यु पर विजय प्राप्त कर सके, वह है- `ॐ त्रयम्बकं यजामहे, सुगन्धिं पुष्टिवर्धनं, उर्वारुकमिव बन्धनात मृत्योर्मोक्षिय मामृतात्’
जब वह १२ वर्ष के हुए तब यमराज उनके सामने, प्राण हरण के लिए प्रकट हो गए। बालक मार्वंâडेय ने यमराज को बहुत समझाया और याचना की कि वह उनके प्राण बख्श दें, परंतु यमराज ने एक ना सुनी और वह यमपाश के साथ उनके पीछे भागे बालक मार्वंâडेय भागते-भागते वन में एक शिवलिंग तक पहुंचे, जिसे देख कर वे उनसे लिपट गए और भगवान शिव का मंत्र बोलने लगे जिसकी रचना उन्होंने स्वयं की थी।
यमराज ने बालक मार्वंâडेय की तरफ फिर से अपना यमपाश फेंका परंतु शिवजी तभी प्रकट हुए और उनका यमपाश अपने त्रिशूल से काट दिया। बालक मार्कंडेय शिवजी के चरणों में याचना करने लगे कि वे उनको प्राणों का वरदान दें, परंतु महादेव ने उनको कहा कि उन्होंने ही यह वरदान उनके माता-पिता को दिया था। इस पर बालक मार्वंâडेय कहते हैं कि यह वरदान तो उनके माता-पिता के लिए था ना कि उनके लिए?
यह सुनकर महादेव बालक मार्वंâडेय से अत्यंत प्रसन्न हुए और उनको जीवन का वरदान दे दिया। भगवान भोलेनाथ ने यमराज को आदेश दिया कि वह इस बालक के प्राण ना लें। कहते हैं तब से यह महामृत्युंजय मंत्र कठिन रोग से मुक्ति के लिए जप हेतु प्रयोग किया जाता है।

शिवलिंग की पूरी परिक्रमा निषिद्ध
शिवजी की आधी परिक्रमा करने का विधान है। वह इसलिए कि शिव के सोमसूत्र को लांघा नहीं जाता है। जब व्यक्ति आधी परिक्रमा करता है तो उसे चंद्राकार परिक्रमा कहते हैं। शिवलिंग को ज्योति माना गया है और उसके आसपास के क्षेत्र को चंद्र। आपने आसमान में अर्ध चंद्र के ऊपर एक शुक्र तारा देखा होगा। यह शिवलिंग उसका ही प्रतीक नहीं है बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड ज्योतिर्लिंग के ही समान है।
`अर्द्ध सोमसूत्रांतमित्यर्थ: शिव प्रदक्षिणीकुर्वन सोमसूत्र न लंघयेत।।
इति वाचनान्तरात।’
सोमसूत्र :
शिवलिंग की निर्मली को सोमसूत्र ही कहा जाता है। शास्त्र का आदेश है कि शंकर भगवान की प्रदक्षिणा में सोमसूत्र का उल्लंघन नहीं करना चाहिए, अन्यथा दोष लगता है। सोमसूत्र की व्याख्या करते हुए बताया गया है कि भगवान को चढ़ाया गया जल जिस ओर से गिरता है, वहीं सोमसूत्र का स्थान होता है। सोमसूत्र में शक्ति-स्रोत होता है अत: उसे लांघते समय पैर पैâलाते हैं और वीर्य ‍निर्मित और पांच अन्तस्थ वायु के प्रवाह पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इससे देवदत्त और धनंजय वायु के प्रवाह में रुकावट पैदा हो जाती है। जिससे शरीर और मन पर बुरा असर पड़ता है। अत: शिव की अर्ध चंद्राकार प्रदक्षिणा ही करने का शास्त्र का आदेश है।
शास्त्रों में अन्य स्थानों पर मिलता है कि तिनकों, लकड़ी, पत्तों, पत्थर, र्इंट आदि से ढके हुए सोम सूत्र का उल्लंघन करने से दोष नहीं लगता है।
लेकिन ‘शिवस्यार्ध प्रदक्षिणा’ का मतलब शिव की आधी ही प्रदक्षिणा करनी चाहिए। शिवलिंग की परिक्रमा हमेशा बाएं ओर से शुरू कर जलाधारी के आगे निकले हुए भाग यानी जल स्रोत तक जाकर फिर विपरीत दिशा में लौटकर दूसरे सिरे तक आकर परिक्रमा पूरी करें।