मेरा देश बेरोजगार हो गया!, मोदी सरकार में बढ़ी ३ गुना बेरोजगारी

 ४५ साल का टूटा रिकॉर्ड

नोटबंदी की असली सड़ांध अब बाहर निकली है। देश में बड़ी संख्या में बेरोजगारी बढ़ी है। बेरोजगारी की रफ्तार का आलम यह है कि पिछले ४५ वर्षों का रिकॉर्ड तक टूट गया। वैसे इतना दूर भी जाने की जरूरत नहीं है। सिर्फ ६ साल पहले की मनमोहन सिंह की सरकार के समय से तुलना करें तो मोदी सरकार के राज में ३ गुना बेरोजगारी बढ़ी है। यह कोई हवा-हवाई की बात नहीं है बल्कि एनएसएसओ (नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस) के रिकॉर्ड बताते हैं। इस विभाग के पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे ने हिंदुस्थान में बेरोजगारी की दर २०१७-१८ में ६.१ फीसदी रिकॉर्ड की है जो कि पिछले ४५ सालों में सबसे ज्यादा है।
‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ की रिपोर्ट के अनुसार इसी हफ्ते नेशनल स्टेटिस्टिकल कमीशन के २ सदस्यों ने कथित रूप से सरकार द्वारा रिपोर्ट को प्रकाशित न किए जाने के कारण अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। यह रिपोर्ट अभी तक सार्वजनिक नहीं की गई है। गौरतलब है कि पिछले २ साल से कहा जा रहा है कि जॉब्स जा रही हैं और लोग बेरोजगार हो रहे हैं पर सरकार इसे खारिज करती रही है।
यह जनता पर मोदी सरकार की गलत नीतियों की मार है कि देश के युवा बेरोजगार हो रहे हैं। मोदी सरकार द्वारा २०१६ में नोटबंदी की घोषणा के बाद बेरोजगारी को लेकर किया गया पहला सर्वे रिपोर्ट लीक हो गई है। इस सर्वे रिपोर्ट के अनुसार मोदी राज में बेरोजगारी काफी तेजी से बढ़ी है। इस सर्वे के लिए डेटा जुलाई २०१७ से जून २०१८ के बीच लिए गए हैं। आर्थिक मीडिया ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ ने इस रिपोर्ट को जारी किया है। इसके द्वारा जिन डाक्युमेंट को रिव्यू किया गया, उसके आधार पर पता चला कि १९७२-७३ के बाद से यह अब तक की बेरोजगारी की सबसे ज्यादा दर है। सर्वे के अनुसार यूपीए के दूसरे कार्यकाल के दौरान २०११-१२ में बेरोजगारी की दर २.२ फीसदी थी।
रिपोर्ट से पता चलता है कि युवाओं में बेरोजगारी की दर सबसे ज्यादा है। ग्रामीण इलाकों में १५ से २९ साल के बीच के लोगों में बेरोजगारी की दर २०११-१२ से बढ़कर १७.४ हो गई है, जबकि ग्रामीण इलाकों में महिलाओं में बेरोजगारी की दर ४.८ फीसदी से बढ़कर १३.६ फीसदी हो गई है।
बिजनेस स्टैंडर्ड ने एनएसएसओ की जिस रिपोर्ट को देखने का दावा किया है उसके मुताबिक ‘युवा अब कृषि क्षेत्र में काम करने के बजाय बाहर जाकर काम की तलाश कर रहे हैं क्योंकि कृषि के काम में उन्हें वाजिब मेहनताना नहीं मिल पा रहा है।’
रिपोर्ट में बताया गया है कि शिक्षित लोगों में बेरोजगारी की दर भी तेजी से बढ़ी है। २००४-०५ के मुकाबले २०१७-१८ में इस मामले में ग्राफ ऊपर गया है। २००४-०५ में शिक्षित महिलाओं में बेरोजगारी की दर १५.२ फीसदी थी जो २०१७-१८ में बढ़कर १७.३ फीसदी पहुंच गई है। इसी तरह शहरों के शिक्षित पुरुषों में भी बेरोजगारी की दर २०११-१२ के ३.५-४.४ फीसदी से बढ़कर २०१७-१८ में १०.५ फीसदी पहुंच गई है।

सरकार की सफाई
हालांकि सरकार ने इस मामले में सफाई देते हुए कहा था कि राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय जुलाई २०१७ से दिसंबर २०१८ तक की अवधि के लिए तिमाही आंकड़ों का प्रसंस्करण कर रहा है। इसके बाद रिपोर्ट जारी कर दी जाएगी। साथ ही मंत्रालय ने यह भी कहा कि हिंदुस्थान के मजबूत जनसांख्यिकीय लाभ और करीब ९३ फीसदी असंगठित क्षेत्र के कार्यबल को देखते हुए रोजगार के मानकों को प्रशासनिक सांख्यिकी के जरिए बेहतर करना जरूरी हो जाता है।

क्यों हुई ये हालत?
– नोटबंदी
– लघु उद्योगों की उपेक्षा
– मंदी की मार
– मंदी में छंटनी
– व्यापार घाटा

बेरोजगारी दर
– २०१८ में ६.२ %
– २०१३ में २.२ %

बेरोजगारी में बढ़ोत्तरी
शिक्षित महिला
२००४-०५ में १५.२%
२०१७-१८ में १७.३%

शिक्षित पुरुष
२०११-१२ में ३.५ %
२०१७-१८ में १०.५ %

ग्रामीण इलाके
युवा वर्ग में १७.४ %