" /> मेरी राह न रोको साथी

मेरी राह न रोको साथी

मेरी राह न रोको साथी,
मुझे अपनी धुन में बहने दो,
मैं बनी राह पर चल न सका,
मुझे अपना रास्ता गढ़ने दो।
मुझे पता है इस राह पर,
अपने भी अवरोधक बनेंगे,
अपने गैरो का पता चलेगा,
कुछ होंगे जो साथ चलेंगे।
ये वक्त कभी तो ठहरेगा,
मेरे संघर्षों पर पिघलेगा,
मैं मूक रहूंगा दर्शक बन,
इतिहास वक्त ही स्वयं लिखेगा।
मुझसे फिर गया जमाना भी,
मुझको ही मुड़कर देखेगा,
मेरी ही सृजित राह पर वो,
अपने भविष्य को सौंपेगा।
यकीन रखो तुम ऐ साथी,
तुमको भी ऊपर लाऊंगा,
मैं कलम प्रथा का वंशज हूं,
एक नया संसार बनाऊंगा।
मुझे पता है ऐ साथी,
कांटें और रोड़े रोज मिलेंगे,
अंत में वे सब हारेंगे,
पदचिन्ह स्वयं ही जीतेंगे।
मैं इससे विचलित नहीं हुआ,
दुनिया क्या मुझको कहती है?
सत्य मार्ग का पथिक रहा,
जिस राह पर दुनिया चलती है।
मैं निश्चछल निडर स्वतंत्र रहा,
मुझको बस लिखते जाने दो,
मेरी राह न रोको ऐ साथी,
मुझे अपनी धुन में बहने दो।

-डॉ. शिवम तिवारी, कोलाबा, मुंबई

शक्ति का अवतार है नारी
शक्ति का अवतार है नारी,
फिर भी किस्मत की मारी।
इसने दिए वरदान है तुझको,
और खुद आज जुल्म से हारी।
क्यों नारी का अपमान होय रे हर युग में?
इसे लूट रहे शैतान जख्म होय हर युग में।
चाहे द्रौपदी चाहे हो सीता,
एक ही दर्द कहानी।
बेकसूर अहिल्या की भी,
तो बात किसी ने न मानी।
क्यों जीना मौत समान होय रे हर युग में?
क्यों नारी का अपमान होय रे हर युग में?
भगवान से भी बढ़कर दुनिया में
मां की ममता प्यारी।
शूरवीर भक्तों की जननी,
फिर क्यों मारी-मारी?
क्यों तड़प-तड़पकर प्राण खोए रे हर युग में?
क्यों नारी का अपमान होय रे हर युग में?
एक दहेज की खातिर तुझको
लाखों बार जलाया।
सदियों से विष पीकर मरना,
ये तेरे हिस्से आया।
तेरे आंसू ही मुस्कान होय रे हर युग में।
क्यों नारी का अपमान होय रे हर युग में?
-गोपाल ठाकुर,
नालासोपारा (पूर्व)

घड़ी
मैं घड़ी हूं अपने इशारों पर
संसार को चलाती हूं।
समय-समय पर लोगों को
जगाती और सुलाती हूं।
इंसान का वक्त अच्छा हो या बुरा
हर वक्त में सही समय बतलाती हूं।
मैं मानव के जीवन का अभिन्न अंग हूं।
मैं बंद पड़ जाऊं तो मानव जीवन
हो जाएगा पूरा अस्त-व्यस्त।
धरती, आकाश, सूरज, चांद, सितारे
भी समझते हैं मेरे एक-एक इशारे।
मैं मानव द्वारा निर्मित एक छोटी-सी मशीन हूं।
मैं हर दुकान, ऑफिस, घर की
दीवार पर लटकी नजर आती हूं।
इंसान के हाथ की कलाई पर और मोबाइल
पर हर क्षण हर पल का समय बताती हूं।
मैं घड़ी हूं अपने इशारों पर
संसार को चलाती हूं।
समय-समय पर लोगों को
जगाती और सुलाती हूं।।
-विजय कुमार अग्रवाल, वसई

साहित्य की लीला अपरंपार
साहित्य की लीला अपरंपार,
खोले बैठे हैं व्यापार,
गली, मोहल्ले, शहरों में भी
देखो बैठे हैं चोर चिहाड़।
जिनको न कुछ आता-जाता,
न लिख पाते लेख, सुलेख
अक्सर वही मोहल्ले भर में
पैâलाते अपने अभिलेख।
साहित्य की लीला अपरंपार,
खोले बैठे हैं व्यापार।
शहरों में डंका बजवाते,
लेखक को कहीं दूर बिठाते,
लेखक खुद को स्वयं बताते,
साहित्य जगह में ख्याति पाते।
चार-छह पुस्तक और गिनाते,
साहित्य जगत में पूजे जाते,
पुरस्कारों की गठरी भी घर लाते।
साहित्यकार को दरकिनार कर जाते,
लीला अपरंपार बताते।
आखिर ये तो मनमानी है,
साहित्य जगत में बेइमानी है।
सिस्टम ऐसा अस्त-व्यस्त है,
जनमानस तो त्रस्त-ग्रस्त है।
कौन करे इनका संहार?
साहित्य जगत में बेड़ा पार।
मजबूरी की खाई में,
बेमानी की परछार्इं में,
गड्ढे सबके खोद रहे हैं,
साहित्य को उसमें झोंक रहे हैं।
साहित्य की लीला अपरंपार,
खोले बैठे हैं व्यापार।
-मनोज चंद तिवारी,
कोच्ची, केरल