" /> ‘मेरे पंख’

‘मेरे पंख’

बचपन के सपनों में मैं,
‘पंख’ फैलाया करती थी।
ऊंची इक उड़ान के लिए,
तारों से बातियाया करती थी।
‘चंदा’ बैठे पास हमारे,
कहा चली मंज़िल को तुम्हारे।
पंख लगे, मैंनें भरी उड़ान
पार किए पर्वत,खेत,नदी,खलिहान
देखकर ‘कुशल कला’ हमारी
सब ‘हैरान-परेशान’ थे भारी!
उड़ने का था बड़ा आनंद
न कोई बंदिश, न हम पाबंद।
हक़ीकत ने जो किया प्रहार
`कटे पंख’…उड़ना तो क्या,
चलना भी `हुआ दुश्वार’।
सुना है `खुदा’ तू ऊपर रहता
सब कुछ देखे, क्यों कुछ नहीं कहता?
मिल जाए हमें, जो ‘पंख’ हमारे
जा पहुंचूं मै `तेरे द्वारे’
करने तुम से कई सवाल
देखे न क्यों `तू’ दुनिया का हाल?
सुना था ‘सच्चाई’ ही जीते
फिर क्यों यहां, `सच्चे’ हैं पीछे?
सुना था तू ‘रहमतें’ है करता
फिर क्यों निर्धन, मेहनती, भूखा मरता?
`ज़ुल्मी’ यहां खुशियां माने
‘धर्मी’ तुझे ही ‘जुल्मी’ जाने।
सुना है जब तू ‘धरा’ पे आया
तुझे भी मिला ‘मां का आंचल’
तुझे भी मिला `पिता का साया’
फिर क्यों कोई ‘निर्बल सा बच्चा’
‘माता- पिता के प्यार’ को तरसा?
ऐ खुदा, अब और ‘सहा’ नहीं जाए
जंजीरों में `कैद’ रहा नहीं जाए।
दे ‘बचपन के पंख हमारे’
खुला आकाश है मुझे पुकारे
सबसे मिलने जाऊंगी मैं
सबसे मिलके आऊंगी मैं
बिछड़ों को मिलवाऊंगी मैं
रोतों को हंसाऊंगी मैं
कुछ कर गुजर जाऊंगी मैं।
– नैन्सी कौर जहांगीरपुरी,
नई दिल्ली