मैनहोल की बलि!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब अपने धुआंधार प्रचार भाषणों की धूल सोलापुर में उड़ा रहे थे, ठीक उसी समय नई मुंबई में मैनहोल में सांस न ले पाने के कारण तीन मजदूरों की मौत हो गई। एक तरफ आर्थिक दृष्टि से दुर्बल सवर्णों को आरक्षण दिए जाने की खुशियां मनाई जा रही हैं। दलितों एवं शोषितों के सिर्फ हम ही एकमेव तारणहार हैं, ऐसा डंका पीटा जा रहा है। हर राज्य में जा-जाकर योजनाओं की घोषणाएं की जा रही हैं, वहीं दूसरी ओर गरीब मजदूरों को अपना पेट भरने के लिए मैनहोल में उतरना पड़ रहा है और उसमें दम घुटने से उन्हें अपनी जान से हाथ धोना पड़ रहा है। पनवेल स्थित कालुंद्रे गांव में दो दिन पहले तीन मजदूरों की इसी तरीके से मैनहोल में दम घुटने से मौत हो गई। मैनहोल में उतरने से मजदूर की मौत की यह पहली घटना नहीं है। मुंबई, ठाणे, कल्याण सहित कई शहरों में इस तरह की घटनाएं हुई हैं और गरीब मजदूरों ने अपनी जान गंवाई है। नाले व गटर साफ करने के लिए इससे पहले बाल मजदूरों का उपयोग होता था। इसमें उनकी भी कई बार जान गई। कुछ युवा बच्चे भी इस तरह का काम करते हुए अपनी जान गंवा चुके हैं। ऐसा पहली बार नहीं घटा है बल्कि पिछले कई वर्षों से ऐसा हो रहा है। मुंबई जैसे शहरों में आग लगती है या लगाई जाती है? उसमें भी नागरिकों सहित अग्निशमन दल के जवानों की झुलसकर मौत हो जाती है। मंत्रालय में जाकर आम जनता आत्महत्या करती है। कहीं पर शिक्षा मंत्री के सामने छात्रों को पीटा जा रहा है। यह सच तो भयानक है ही। मगर घर का चूल्हा जलाने के लिए नाले और गटर के मैनहोल में जब गरीब मजदूर उतरता है और मरता है तब मन बहुत ही खिन्न हो जाता है। मजदूरों को खुद की जिम्मेदारी पर इस तरह की सुरंगवाले गटर में उतरना पड़ता है और किस्मत ने साथ दिया तो वे जिंदा बाहर आते हैं। पनवेल के कालुंद्रे में तीन मजदूरों का किस्मत ने साथ नहीं दिया और वे मारे गए। ये मजदूर ठेकेदारों के थे और उनका नाम, गांव, पता किसी को भी मालूम नहीं। मोदी के कार्यकाल में मजदूर क्षेत्र पूर्णत: खत्म हो गया है। हालांकि इसकी शुरुआत इससे पहले ही हो चुकी थी। फिर भी इस तरह के गरीब मजदूर और कामगार क्षेत्र के लोगों को ‘अच्छे दिन’ का सपना दिखाया गया था। वह सपना हकीकत में नहीं बदला और मजदूर वर्ग का दम घुटने से मरने का सिलसिला जारी है। पनवेल की तरह अब तक ऐसे कितने मजदूर गटर साफ करते समय मारे गए और उसके लिए जिम्मेदार कौन हैं, उन मजदूरों को किस तरह का मुआवजा दिया गया? इसका जवाब राज्य या केंद्र सरकार देगी क्या? इस तरह की साफ-सफाई का कार्य ठेका पद्धति से दिया जाता है। मतलब मजदूरों की जिंदगी और मौत से हमारा कोई संबंध नहीं। ठेकेदार और उनका मजदूर जो होगा उसे देख लेगा। इस तरीके से सरकार और प्रशासन खुद का हाथ झटक लेता है। कश्मीर में फौज द्वारा मारे गए आतंकवादियों को सरकारी तिजोरी से मुआवजा मिलता है लेकिन ‘मैनहोल’ में दम घुटकर मरनेवालों की ओर कोई पलटकर भी नहीं देखता। प्रधानमंत्री ने स्वच्छता के लिए एक बहुत बड़ा आंदोलन हाथ में लिया है। खुद हाथ में झाड़ू लिया और उस झाड़ू के प्रचार के लिए १००-५०० करोड़ रुपए विज्ञापनबाजी पर खर्च किए। उसके बदले सफाई मजदूर दम घुटने से क्यों मरते हैं उनकी जान बचाने के लिए क्या उपाय योजनाएं की जा सकती हैं इस पर खर्च किया होता तो अच्छा होता। रेल की पटरियों पर काम करनेवाले ‘गैंगमैन’ तथा सुरंगी गटर में साफ-सफाई करने के लिए उतरनेवाले मजदूरों का कोई रखवाला नहीं है। आज ही हमने पढ़ा है कि कृषि मजदूरों सहित असंगठित मजदूरों के लिए सात कल्याणकारी योजनाएं राज्य सरकार ने घोषित की हैं। उसमें कृषि मजदूर, घरेलू कामगार, कचरा इकट्ठा करनेवाले, अखबार और दूध बांटनेवाले, अगरबत्ती और चप्पल व्यवसाय के मजदूर, रंग काम करनेवाले, यंत्र कामगार मजदूर, दुकान और गोदाम मजदूर, रिक्शा चालक, बढ़ई काम करनेवाले असंगठित मजदूरों का समावेश किया गया है और उन्हें भविष्य निर्वाह निधि, स्वास्थ्य, शिक्षा, घर और दुर्घटना में मौत होने से ४ लाख रुपए की सहायता देना तय किया है। यह अच्छा ही है लेकिन मैनहोल में तड़पनेवाले मजदूर उसमें हैं क्या बताओ। पनवेल में तीन मजदूर मरे। सुरंगी गटरों में और कितने मजदूरों की बलि चढ़नेवाली है?