मोनो बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिए

फरवरी २०१४, देश की पहली मोनोरेल मुंबई के वडाला से चेंबूर के बीच चली। सड़क से काफी ऊपर, एलिवेटेड ट्रैक पर वो मुंबई का पहला शानदार वातानुकूलित सफर था। बेस्ट की बसों के बाद एसी की ठंडी-ठंडी, कूल-कूल अबाधित मोहक सवारी। विश्वास पुख्ता हो गया कि आज की मोनो का जॉयराइड कल की मुंबई की जरूरत अवश्य पूरी करेगा। सरकार का भी ‘मजबूत’ वादा था, सात रास्ता (जैकब सर्कल) तक मोनो को जल्द ही पहुंचाने का। लेकिन जब नीयत में ही खोट हो तो मंसूबे कभी कामयाब नहीं होते। मोनोरेल के मामले में भी यह सच्चाई सोलह आने सच साबित हुई। नियोजनकर्ताओं की बदनीयत से मोनो बदनाम हो गई। जिस राह पर उसे चलना था, उस राह पर स्वार्थ के कांटे बो दिए गए और जिस राह उसे चलाया गया, वहां मायूसियां ही थीं। आज मोनो लाचार है। उसके सामने समस्याएं अपार हैं। १० साल में १० रैक भी मोनो के पास नहीं हैं। पिछला कांट्रेक्टर कंटाल चुका है, नए काफी महंगे हैं। उसे इस लाचारी से उबारना बेहद खर्चीला ख्वाब है। जो कब जाकर हकीकत बनेगा? कहा नहीं जा सकता।
नवंबर २०१७ में मैसूर कॉलोनी मोनो स्टेशन पर कोच में लगी आग ने मोनो की हिम्मत ही तोड़ दी। उसकी रफ्तार को जो ब्रेक लगा वो साढ़े सात महीने की साढ़े साती के समान हो गया। जब मोनो थमी तो उसके यात्रियों की संख्या मात्र १५ हजार प्रतिदिन थी, जो होनी काफी अधिक चाहिए थी। आज अगर मोनो के दोनों चरण परिचालित होते, तब भी कम से कम उस पर यात्री संख्या एक लाख के पार होती। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है, क्या चेंबूर-वडाला मोनो का पहला चरण पैसों की बर्बादी है? क्योंकि इंतजार का हर लम्हा खर्च बढ़ा रहा है। हर दिन तीन लाख का नुकसान हो रहा है। दूसरे चरण का खर्च २,६९६ करोड़ रुपए तक पहुंच चुका है। उसकी अंतिम लागत २,४६० करोड़ रुपए आंकी गई थी और अब तक २,१३६ करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। अगर नियोजन में खामियां नहीं होतीं तो न ये खर्च बढ़ता और न ही मोनो के चलने में कोई दिक्कत होती। जाहिर है चूक क्रियान्वयन में ही है।
टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस (टीआईएसएस) का अध्ययन मोनो के अपराधियों का पर्दाफाश करता है। टीआईएसएस के अध्ययन से साफ है कि मोनो का नियोजन जानबूझकर, वर्ग विशेष को लाभ पहुंचाने के मकसद से प्रभावित किया गया। आवश्यकता थी कि उपलब्ध भूखंडों, कॉलोनियों, कार्यालयों, स्कूलों, अस्पतालों और महाविद्यालयों को ध्यान में रखकर उसके मार्ग का चयन किया जाता। जहां वाकई सार्वजनिक प्रणाली की जरूरत थी। वहां पर्याप्त संख्या में उसे यात्री मिल सकते थे। उसे आर्थिक खुराक मिल सकती थी। उसी रास्ते मोनो का मार्ग गुजरना चाहिए था, परंतु ऐसा नहीं हुआ? जनता जहां से चाहती थी, वहां से मोनो चली ही नहीं। पहला चरण उस वीराने में बनाया गया, जहां ज्यादातर भूखंड खाली पड़े थे। जहां इमारतें ही नहीं थीं। नई कॉलोनियां बन रही थीं। ऐसे में सवाल यही है कि एमएमआरडीए वास्तव में मुंबईकरों को भीड़ से निजात दिलाना चाहता था या उसकी मंशा कुछ और थी?
एक-एक करके दस साल बीत गए। वर्ष २००८ में मोनो रेल के पहले चरण का काम शुरू हुआ था। २०११ तक उसे शुरू करना था। हालांकि पूरा जोर लगाने के बावजूद वो फरवरी २०१४ तक ही चल सकी। वो भी सीमित सेक्शन में। चली भी तो अवरोध कायम रहे। ब्रेक डाउन, तकनीकी खराबियां और आखिर में आग की चपेट में आकर मोनो की दौड़ पर स्थायी ब्रेक लग गया। सीएजी ने भी सवाल उठाए। तो उसे बनानेवाली कंपनी ने भाव बढ़ा दिए। ये तो मोनो के सरकने के पहले पांच वर्षों का पंचनामा है। २०१४ के बाद उपेक्षा का ऐसा दौर चला कि मोनो के पटरी पर आने के आसार ही कम हो गए। ये कारनामा हुआ है ‘विकास की पुरोधा’ पार्टी के कार्यकाल में। जिसने एक के बाद एक, धड़ाधड़ सैकड़ों किलोमीटर मेट्रो की घोषणा कर डाली, पर वो २० किलोमीटर मोनो नहीं चला सकी। क्योंकि उसने मोनो का मोह त्याग कर मेट्रो की बांह मजबूती से पकड़ रखी है। आज मोनो के लिए मेट्रो सौतन बन चुकी है। इसलिए एक दशक बीत जाने के बावजूद मोनो यार्ड में खड़ी है। कमिश्नर रेलवे सेफ्टी की हरी झंडी मिलने के बाद भी उसे चलानेवाला ‘ड्राइवर’ नहीं मिल सका है। अमूमन होता यह है कि तैयारियों के बाद भी सेफ्टी सर्टिफिकेट न मिल पाने से रेल दौड़ नहीं पाती। मोनो के मामले में दुर्भाग्य यह है कि उसे सेफ्टी का सिग्नल तो मिल चुका है पर चलने का साजो-सामान नहीं मिल रहा।
सुबह उत्तर से दक्षिण और शाम को दक्षिण से उत्तर दौड़नेवाली मुंबई को लंबे अरसे से ईस्ट-वेस्ट कनेक्टिविटी की बेसब्री से तलाश थी। इस लिहाज से मोनो जैसी प्रणाली बेहद जरूरी थी। मध्य और दक्षिण मुंबई के व्यस्त इलाकों को ऐसी ही कोई व्यवस्था राहत दे सकती थी। तमाम पर्याय तत्कालीन सरकार के समक्ष थे, देशी भी और विदेशी भी। सरकार ने इनमें मोनो को चुना। यह उसकी पहली गलती थी। एक गलत प्रणाली का चयन। सरकार ने दूसरी गलती की, गलत मार्ग चुनकर। यह गलती जान-बूझकर की गई थी। नतीजा यह है कि अब जानकार भी मानने लगे हैं कि मोनो हमेशा लड़ख़ड़ाती रहेगी, क्योंकि उसके नीतिकर्ताओं ने यह सब साजिशन किया है। एक-दो नहीं, बहुत सारी गलतियां की हैं और समय रहते उन्हें सुधारने की कोशिश भी नहीं हुई। नतीजतन, जिस मोनो को मुंबई ने कभी ‘डार्लिंग’ का दर्जा दिया था, आज उसी से वो डर रहा है।
चेंबूर से जेकब सर्कल के दूसरे चरण पर मोनो संचालन में निजी क्षेत्र को खास रुचि नहीं है। चार-चार प्रयासों के बाद केवल दो कंपनियां सामने आई हैं। उन्होंने भी बोली बड़ी लगाई है। एमएमआरडीए १० साल का खर्च १ हजार करोड़ सोच रहा था, पर बोलियां २ हजार से साढ़े छह हजार करोड़ की आई हैं। जाहिर सी बात है ऐसे में परिचालन का दूसरा पर्याय खोजना बेहद जरूरी है। दिल्ली मेट्रो रेल कारपोरेशन से भी मदद लेने पर विचार हुआ पर बात नहीं बनी। तब एमआरवीसी के साथ चर्चा हुई। नतीजा आना अभी बाकी है। एमएमआरडीए, दिल्ली मेट्रो रेल और एमआरवीसी के अलावा हरसंभव पर्याय खोजने में जुटी है, परंतु सरकारी उपेक्षा में वो पर्याय मिल पाएगा क्या? यह मुश्किल ही लग रहा है। जब चलाने को रैक्स नहीं हों, पर्याप्त कोच नहीं हों, स्पेयर्स पाट्र्स नहीं हों, किसी को दिलचस्पी नहीं हो तो भला मोनो कैसे चल सकती है? तमाम डेडलाइन बीत जाने के बाद जनता के मन में वही सवाल है कि मोनो कब चलेगी? इस एक सवाल को लेकर एमएमआरडीए के सामने तमाम दूसरे सवाल हैं कि मोनो कैसे चलेगी? मोनो कौन चलाएगा? मोनो कितने दिन चलेगी या फिर मोनो चलेगी भी या नहीं? एमएमआरडीए के इन सवालों का जवाब ज्योतिषियों से ही मिल सकता है। धरातल पर तो उसका कोई आधार नजर नहीं आता। एमएमआरडीए की ‘कुंडली’ देखकर कयास जरूर लगाया जा सकता है। जो भी हो मोनो चलेगी। पब्लिक के लिए न सही सरकार के लिए। मोनो चलेगी तभी तो वोट मिलेंगे। अब अटकलें दिसंबर की हैं। हो सकता है, उसे इस बार भी जबरन चलाया जाए। कुछ महीनों के लिए ही सही। जैसे २०१४ के आम चुनाव से पहले चलाया गया था। तब भी तैयारियां अधूरी थीं। तब भी वो चुनावी वादों की तरह भरोसेमंद साबित नहीं हुई थी। पर चली जरूर, लड़खड़ाई और थम गई। एक ही जगह पर जम गई। इस बार भी किसी के स्वार्थ, किसी की गलतियों का खामियाजा भुगतने के लिए मोनो चलेगी। भले ही उसका मोह, मोहभंग में तब्दील हो जाए। भले ही उसकी ड्राइविंग सीट पर कोई बैठने को राजी न हो, ड्राइवरलेस सही, मोनो चलेगी।