मौत का ट्रायल!, मजबूरी में परीक्षण को मजबूर,  ४ साल में ८८ ने तोड़ा दम,

चिकित्सकीय क्षेत्र में अक्सर विवादों में रहनेवाले क्लीनिकल ट्रायल (नैदानिक परीक्षण) मौत का ट्रायल बनता जा रहा है। राज्य सभा में पेश की गई रिपोर्ट के मुताबिक मोदी सरकार के कार्यकाल यानी पिछले ४ साल में क्लीनिकल ट्रायल के दौरान १,४४३ लोगों की जानें गई हैं जिसमें से ८८ लोगों की मौत का सीधा कारण दवाइयों का साइड इफेक्ट रहा। मजबूरी में गरीब लोग ऐसे परीक्षण को मजबूर हो रहे हैं। इसके लिए इच्छुक लोगों को पहले एथिकल कमिटी से एप्रूव कराना होता है। पैसों का लालच देकर व उनसे मौत की सच्चाई छुपाकर उनके ऊपर दवाओं का यह ट्रायल किया जाता है। इसी कारण इन मौतों के बावजूद मौत के इस ट्रायल में हिस्सा लेनेवालों की संख्या बढ़ती जा रही है। इस बात की पुष्टि स्वास्थ्य अधिकार मंच की अमूल्या निधि ने की है।
बता दें कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से राज्यसभा में पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार वर्ष २०१५ से २०१८ के बीच ट्रायल की संख्या में काफी वृद्धि हुई है। वर्ष २०१५ में ८५९, २०१६ में ८७३, २०१७ में २,५१६ और नवंबर २०१८ तक ३,८६९ लोगों पर ट्रायल दर्ज किए गए हैं। वर्ष २०१५ से २०१८ के बीच क्लीनिकल ट्रायल के चलते ८८ लोगों ने दम तोड़ा, जिनमें से सिर्फ ४४ मृतकों के परिवारों तक मुआवजा पहुंचा है। साल २०१८ में हुई १३ मौतों में से सिर्फ एक ही परिवार को ४,८७,२५० रुपए का मुआवजा मिला है। अमूल्या निधि ने ‘दोपहर का सामना’ को बताया कि मुंबई, पुणे, गुजरात, तमिलनाडु व अन्य जगहों पर बड़े पैमाने पर क्लीनिकल ट्रायल हो रहा है। यह ट्रायल लोगों को अंधेरे में रखकर किया जाता है। नई केमिकल या कहें मॉलिक्यूल की टेस्टिंग करना हमेशा घातक ही साबित होता है क्योंकि उसका मनुष्य के स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ेगा, इसका जांचकर्ताओं को भी अंदाजा नहीं होता। अच्छे-अच्छे लोगों पर भी बिना बताए ट्रायल किया जाता है। सरकार को इस पर कड़े नियम व दिशा-निर्देश जारी करने की जरूरत है। जब तक ऐसा नहीं होगा मौत का आंकड़ा बढ़ता रहेगा और लोग इसका शिकार होते रहेंगे। शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति हो जिसे पता हो कि इस ट्रायल में मौत भी हो सकती है। इसके बावजूद वो हिस्सा लेता है। क्लीनिकल ट्रायल के नाम पर बिजनेस हो रहा है।