यहां मिलती है आपकी वंशावली

बिरले ही होंगे जिन्हें अपनी तीन पीढ़ी के पहले के लोगों के नाम याद रहता होगा लेकिन दुनिया के सबसे बड़े आध्यात्मिक और सांस्कृतिक समागम कुंभ में पुरोहितों के पास अपने यजमानों की ५०० पीढ़ियों से अधिक का लेखा-जोखा मौजूद है। पुरोहितों को केवल जजमान अपना नाम और स्थान का पता बताने की देरी होती है बस, शेष काम उनका होता है। वह आधे घंटे के अंदर कई पीढ़ियों का लेखा-जोखा सामने रख देते हैं। लाखों लोगों के ब्योरे के संकलित करने का यह तरीका इतना वैज्ञानिक और प्रमाणिक है कि पुरातत्ववेत्ता और संग्रहालयों के अधिकारी भी इससे सीख ले सकते हैं। अत्याधुनिक दौर में भी पुरोहित अपने यजमानों राजा-महाराजाओं और मुस्लिम शासकों से लेकर देशभर के अनगिनत लोगों की पाच सौ वर्षों से अधिक की वंशावलियों के ब्योरे बहीखातों में पूरी तरह संभाल कर रखते हैं। तीर्थराज प्रयाग में करीब १००० तीर्थ पुरोहितों की झोली में रखे बही-खाते बहुत सारे परिवारों, कुनबों और खानदानों के इतिहास का ऐसा दुर्लभ संकलन हैं जिससे कई बार उसी परिवार का व्यक्ति ही पूरी तरह वाकिफ नहीं होता है। उनका कहना है कि इन पुरोहितों के खाता-बही में यजमानों का वंशवार विवरण वास्तव में वर्णमाला के व्यवस्थित क्रम में आज भी संजो कर रखा हुआ है। पहले यह खाता-बही मोर पंख बाद में नरकट फिर जी-निब वाले होल्डर और अब अच्छी स्याही वाले पेनों से लिखे जाते हैं। वैसे मूल बहियों को लिखने में कई तीर्थ पुरोहित जी-निब का ही प्रयोग करते हैं। टिकाऊ होने की वजह से सामान्यतया काली स्याही उपयोग में लाई जाती है। मूल बही का कवर मोटे कागज का होता है। जिसे समय-समय पर बदला जाता है। बही को मोड़कर मजबूत लाल धागे से बांध दिया जाता है।उनका दावा है कि पुराने पुरोहितों के वंशजों के पास के पास ऐसे कागजात हैं जब अकबर ने प्रयाग के तीर्थ पुरोहित चंद्रभान और किशनराम को २५० बीघा भूमि मेला लगाने के लिए मुफ्त दी थी। यह फरमान भी उनके पास सुरक्षित है। पुराहितों की बहियों में यह भी दर्ज है कि झांसी की रानी लक्ष्मीबाई कब प्रयाग आई थीं। इनके पास नेहरू परिवार के लोगों के लेख और हस्ताक्षर भी मौजूद हैं। पंडितों ने बताया कि भगवान राम ने लंका विजय के प्रयाग में स्नान के बाद पुरोहित को दान देना चाहा लेकिन ब्रह्महत्या का आरोप लगाकर उनसे किसी ने दान नहीं लिया। उसके बाद उन्हें अयोध्या के तत्कालीन कवीरापुर, बट्टपुर जिले के रहने वाले कुछ लोगों को ब्राह्मणों को यहां लाए और स्नान कर उन्हें दान दिया था। यहां के जानकार बताते हैं कि इन दस्तावेजों को संजोकर रखने में कड़ी मशक्कत करनी पड़ती है। बड़े-बड़े बक्सों में रखे मोटे-मोटे बहीखातों की साफ-सफाई करनी पड़ती है। दीमक और अन्य कीटों से बचाने के लिए फिनाइल की गोलियां अथवा अन्य कीटनाशक दवाइयों का प्रयोग करते हैं।

कुंभ पर्व की एक और कथा
कुंभ पर्व की दूसरी कथा प्रजापति कश्यप की पत्नियों `कद्रू’ और विनता के बीच हुई तकरार से संबद्ध है। कथा कुछ इस प्रकार है- एक बार प्रजापति कश्यप की पत्नियों कद्रू और विनता के बीच सूर्य के अश्व (घोड़े) काले हैं या सफेद, विषय को लेकर विवाद छिड़ गया। विवाद ने प्रतिष्ठा का रूप ले लिया और शर्त लग गई कि जिसकी बात झूठी निकलेगी, वह दासी बनकर रहेगी। कद्रू के पुत्र थे `नागराज वासुकि’ और विनता के पुत्र थे `वैनतेय गरुड़’। कद्रू ने विनता के साथ छल किया और अपने नागवंश को प्रेरित करके उनके कालेपन से सूर्य के अश्वों को ढंक दिया। फलत: विनता शर्त हार गई और उसे दासी बनकर रहना पड़ा। इसपर कद्रू ने गरुड़ से कहा कि यदि नागलोक में वासुकि से रक्षित `अमृत कुंभ’ जब भी कोई ला देगा, तब मैं विनता को दासत्व से मुक्ति दे दूंगी। कद्रू के मुख से उपाय सुनकर स्वयं गरुड़ ने नागलोक जाकर वासुकि से अमृत कुंभ अपने अधिकार में ले लिया और अपने पिता कश्यप मुनि के उत्तराखंड में गंध मादन पर्वत पर स्थित आश्रम के लिए वे चल पड़े। उधर वासुकि ने देवराज इंद्र को अमृत हरण की सूचना दे दी। `अमृत कुंभ’ को गरुड़ से छीनने के लिए देवराज इंद्र ने गरुड़ पर चार बार हमला किया जिससे मार्ग में पड़ने वाले स्थलों- प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन और त्र्यंबकेश्वर (नासिक) में कलश से अमृत छलककर गिर पड़ा। उक्त चारों स्थलों पर अमृतपात् की स्मृति में कुंभ पर्व मनाया जाने लगा।

अमृत बचाने में योगदान किसका था?
कुंभ का आयोजन हरिद्वार, प्रयागराज, उज्जैन व नासिक में किया जाता है। अमृत की छीना-झपटी के समय चंद्रमा ने अमृत को बहने से बचाया। गुरु ने कलश को छुपाकर रखा। सूर्यदेव ने कलश को फूटने से बचाया और शनि ने इंद्र के कोप से रक्षा की। चूंकि इन ४ ग्रहों के सहयोग से ही अमृत की रक्षा हुई थी इसलिए जब-जब भी इन ग्रहों का राशि अनुसार विशेष संयोग होता है, तब-तब कुंभ का आयोजन होता है। कुंभ का प्रारंभ आदिशंकराचार्य ने किया था। कुंभ का व्यावहारिक पक्ष देखें तो प्राचीनकाल में साधु-संन्यासी मेले इत्यादि जैसे मनोरंजक कार्यक्रमों में हिस्सा नहीं लेते थे और समस्त साधु-संन्यासियों का एक ही स्थान पर दर्शन कर पाना आम नागरिकों के लिए भी संभव नहीं था किंचित इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर कुम्भ मेले की परंपरा का प्रारंभ हुआ। कुंभ में हमारे देश के प्रसिद्ध अखाड़ों का शाही स्नान आकर्षण का प्रमुख केंद्र होता है। ऐसी मान्यता है कि `कुंभ स्नान’ करने से व्यक्ति आवागमन के दुष्चक्र से छूटकर मोक्ष को प्राप्त करता है।
अब कब है मुख्य स्नान?
द्वितीय शाही स्नान- ४ फरवरी २०१९- मौनी अमावस्या
तृतीय शाही स्नान- १० फरवरी २०१९- वसंत पंचमी
१६ फरवरी २०१९- माघी एकादशी
१९ फरवरी २०१९- माघी पूर्णिमा
४ मार्च २०१९- महाशिवरात्रि