" /> यह नया कलियुग, लॉकडाउन : पर्व चार

यह नया कलियुग, लॉकडाउन : पर्व चार

लॉकडाउन को ३१ मई तक बढ़ाने में चौंकानेवाली कोई बात नहीं है। केंद्र और राज्य सरकारों के सामने दूसरा विकल्प ही क्या था? यह चौथा लॉकडाउन देशव्यापी है, लेकिन इसका सख्ती से पालन किया जाएगा क्या, इस बारे में संदेह है। दो महीने से अधिक समय से सब-कुछ ‘बंद’ है। लोग उस बंद की काल-को’री से बाहर निकलने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। अब ये जो चौथा ‘लॉकडाउन’ किया गया है, इसमें आम जनजीवन में कोई राहत मिलती नहीं दिख रही। मेट्रो, ट्रेन सेवाएं, घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय एयरलाइंस, सिनेमा, शॉपिंग मॉल, जिम आदि बंद रहेंगे। यदि यह ‘बंद’ घोषित किया भी जाता है, तो क्या लोग वास्तव में ‘बंद’ का पालन कर पाएंगे? आज की तस्वीर भयावह है। प्रवासी मजदूरों का पैदल चलना और परेशानी कायम है। महाराष्ट्र सहित देश के कई हिस्सों से जब ये मजदूर उत्तर प्रदेश के लिए रवाना हुए तब उन्हें केंद्र सरकार द्वारा नहीं रोका गया। उनकी व्यवस्था नहीं की गई। जब ये लाखों मजदूर उत्तर प्रदेश की सीमा में पहुंचे तो वे वहां फंस गए। उन्हें उत्तर प्रदेश की सीमा में प्रवेश की अनुमति नहीं देने के आदेश हैं। इसमें महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग बड़ी संख्या में हैं। अन्य राज्यों में भी यही हालात है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने भी स्पष्ट किया है कि चार राज्यों यानी महाराष्ट्र, गुजरात, केरल और तमिलनाडु में फंसे कर्नाटक के मजदूरों और अन्य नागरिकों को ३१ मई तक कर्नाटक में प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पहले ही विभिन्न राज्यों में फंसे बंगाली मजदूरों को ले जानेवाली गाड़ियों का विरोध किया था। बाद में एक महीने के अंतराल में उन्होंने १०५ ट्रेनों के लिए हामी भर दी। सरकारें अपने ही लोगों के साथ ऐसा व्यवहार कैसे कर सकती हैं? आज पड़ोसी देशों के अल्पसंख्यक हिंदुओं का स्वागत करनेवाली ये सरकारें पड़ोसी राज्यों से आए अपने ही भाइयों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। इस अमानवीय अस्पृश्यता को क्या कहें? ऐसे में सरकार द्वारा चौथी बार लॉकडाउन की घोषणा चिंता का विषय है। लोग घरों पर रहने के लिए तैयार हैं, लेकिन भविष्य की बात सोचकर वे विचलित हैं। समाचार चैनलों पर कुछ तस्वीरें ‘सोमालिया’ जैसे देश की स्थिति की याद दिलाती हैं। भूखे लोग एक-दूसरे के हाथों से खाने की चीजें छीनकर लड़ रहे हैं। इसी तरह की घटना जबलपुर रेलवे स्टेशन पर हुई। जब बेंगलुरु-हाजीपुर ट्रेन में सवार श्रमिकों को भोजन नहीं मिला, तो गुस्साए श्रमिकों ने स्टेशन पर खाद्य स्टॉलों, खाद्य वेंडिंग मशीनों और खाद्य पदार्थों को लूट लिया। हालांकि यह दृश्य फिलहाल भले ही सामान्य हो लेकिन कल इसको उग्र रूप लेने में देर नहीं लगेगी। ऐसा कहा जा रहा है कि दैनिक लेन-देन कुछ स्थानों पर चरणबद्ध तरीके से शुरू होगा। यह कहना मुश्किल है कि ये कब शुरू होगा? जहां तक ​​महाराष्ट्र का सवाल है तो बड़ी संख्या में लोग मुंबई से कोंकण के लिए रवाना हुए हैं, लेकिन उन्हें भी कई स्थानों पर जिलाबंद किया गया है। स्थानीय लोगों ने मुंबईकरों को जिलों और गांवों में प्रवेश करने से रोक दिया है। महाराष्ट्र भय की स्थिति में फंस गया है। इस भय को दूर किया जाए या बढ़ाया जाए, इस पर चर्चा की जा रही है। मुंबई सहित महाराष्ट्र में कोरोना पीड़ितों की संख्या बढ़ रही है। कोरोना श्रृंखला को तोड़ने के लिए युद्धस्तर पर प्रयास के बावजूद मरीजों की बढ़ती संख्या पर काबू पाने में अपेक्षित सफलता नहीं मिल पा रही है। राज्य में कोरोना पीड़ितों की संख्या ३०,००० हो गई है। मुंबई में लगभग २०,००० हैं। मुख्यमंत्री और उनकी सरकार कोरोना के साथ संघर्षरत हैं लेकिन कोरोना बढ़ ही रहा है। तेजी से नए अस्पताल बनाकर कोरोना पीड़ितों के लिए उनका लोकार्पण किया जा रहा है। भविष्य में राज्य सरकारों को सिर्फ यही काम करना होगा, ऐसा ही प्रतीत हो रहा है। शिक्षण संस्थान कब खुलेंगे? कामगार काम पर कब लौटेंगे? (मतलब नौकरी बची तो!) आसमान में हवाई जहाज कब उड़ान भरेंगे? रेलवे पटरियों पर लोकल्स कब दौड़ेंगी? बस सेवा कब शुरू होगी? मुंबई के सिनेमाघरों में रौनक कब लौटेगी? या हम ‘मूक चित्रपट’ या जंगल युग में वापस जाएंगे? फिलहाल यह एक रहस्य ही बना हुआ है। अगर हम चरणबद्ध तरीके से ये सब शुरू करने का विचार करें तो मुंबई में २०,००० कोरोना पीड़ितों का आंकड़ा खतरे की घंटी बजा रहा है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मलाताई रोज किसी-न-किसी को पैकेज देने की घोषणा करने के लिए दैनिक प्रेस कॉन्प्रâेंस कर रही हैं। हालांकि जिस दिन ये पैकेज लोगों तक पहुंचेगा, वही असली साबित होगा। प्रवासी कामगारों के पैर बुरी तरह से घायल हैं। राहुल गांधी दिल्ली की सड़कों पर मजदूरों के साथ रुक गए, कुछ देर बै’े और बातचीत की। इसके कारण निर्मलाताई का दुखी होना आश्चर्यजनक ही कहा जाएगा। अगर कोई श्रमिकों की पीड़ा को कम कर रहा है, तो सरकार को खुश होना चाहिए, लेकिन यहां इसके विपरीत हो रहा है। मंत्री लॉकडाउन सहलाते बै’े हैं। मजदूर लॉकडाउन तोड़कर बाल-बच्चों के साथ सड़कें नाप रहे हैं। जो लोग इस तथ्य से दुखी थे कि गांधी नाम को जीते हुए विपक्ष के एक नेता ने सड़कों पर खड़े होकर मजदूरों को गले लगाया, उन लोगों को अब मानवता और परंपरा की डींगें नहीं हांकनी चाहिए। वे अपने ही लोगों को राज्य में लेने का विरोध करते हैं और उन लोगों से नफरत करते हैं जो श्रमिकों की पीड़ा के बारे में बात करते हैं। यह सच है कि कोरोना एक नया कलियुग लेकर आया है!