यादों के झरोंखे से : एक नदी दो किनारे

जो पाठक संगीतकार शंकर-जयकिशन की जोड़ी से परिचित हैं उन्हें यह जानकर आश्चर्य होगा कि तीन दशकों से अधिक समय तक फिल्म संगीत के संसार की नंबर वन रही इस जोड़ी के दोनों संगीतकारों ने कभी भी एक साथ अपने किसी भी गीत की रिकॉर्डिंग नहीं की। वर्षों तक दुनिया इस राज को नहीं जान सकी कि शंकर और जयकिशन ने हमेशा अपने हर गीत की रिकॉर्डिंग अलग-अलग ही की। वे दोनों हमेशा ही एक नदी और दो किनारों की भांति अलग-अलग ही रहे।
शंकर मूलरूप से हैदराबाद के रहनेवाले थे। रामसिंह सूर्यवंशी के पुत्र शंकर सिंह को बचपन से पहलवान बनने का जुनून था और वह अखाड़े के कुशल पहलवानों में से थे। तबला बजाने का शौक शंकर सिंह को कब लग गया उन्हें पता ही नहीं चला। यह सुखद संयोग ही था कि मुंबई की एक नाट्य संस्था हैदराबाद में मंचन के लिए आई थी और संस्था को एक तबला वादक की जरूरत थी। शंकर तबला वादक के रूप में उस नाट्य संस्था से जुड़ गए और हैदराबाद से मुंबई आ गए। मुंबई में जब नाट्य संस्था बंद हो गई तो शंकर दूसरी एक नाट्य संस्था ‘पृथ्वी थिएटर्स’ से जुड़ गए। उन्हें ७५ रुपए माह का वेतन मिलने लगा।
‘पृथ्वी थिएटर्स’ नाट्य संस्था वास्तव में राज कपूर के पिताश्री पृथ्वीराज कपूर चलाते थे। राम गांगुली नामक संगीतकार ‘पृथ्वी थिएटर्स’ के नाटकों का संगीत तैयार करते थे और साथ ही साथ राज कपूर की फिल्मों का संगीत निर्देशन भी करते थे। ‘पृथ्वी’ में एक दिन एक गुजराती युवक हारमोनियम बजाने के लिए राम गांगुली से मिला। इस युवक का नाम जयकिशन पांचाल था। इस प्रकार राम गांगुली की संगीत मंडली में शंकर और जयकिशन दोनों आ मिले और तबले व हारमोनियम की जुगलबंदी कमाल करने लगी। किंतु दोनों ही अत्यधिक स्वाभिमानी और महत्वाकांक्षी थे। दोनों ही राम गांगुली और अन्य लोगों को ये जताने में लगे रहते थे कि दोनों में बेस्ट कौन है?
अपनी इस महत्वाकांक्षा के चलते शंकर-जयकिशन इस चक्कर में लगे थे कि किसी प्रकार राज कपूर उन्हें अपनी किसी फिल्म में संगीत निर्देशन का अवसर दे दें। किंतु राम गांगुली के रहते यह कतई संभव न था। तब अचानक राम गांगुली को किसी काम से कुछ दिनों के लिए मुंबई से बाहर जाना पड़ा और शंकर-जयकिशन को वह अवसर मिल गया, जिसकी वे प्रतीक्षा कर रहे थे। दोनों राज कपूर से मिले और अपनी-अपनी कुछ धुनें सुनार्इं। राज कपूर को दोनों की धुनें इस कदर पसंद आर्इं कि उन्हें अपनी नई फिल्म ‘बरसात’ का संगीत देने के लिए अनुबंधित कर लिया। किंतु शंकर-जयकिशन के बीच एक नई समस्या खड़ी हो गई। दोनों का आग्रह था कि उनका नाम संगीतकार के रूप में भले ही साथ में दे दें किंतु वे अपने-अपने गाने अलग-अलग ही रिकॉर्ड करेंगे और बैकग्राउंड संगीत भी इसी प्रकार किया जाएगा। तब राज कपूर ने अनुबंध में यह शर्त भी जोड़ दी कि वे भले ही अलग-अलग काम करें लेकिन कभी भी ये राज किसी को नहीं बताएंगे। इस प्रकार लिखित रूप से दोनों ने राज कपूर की इस शर्त को मान लिया और दुनिया को हमेशा यही दिखाया कि वे दोनों साथ-साथ संगीत देते हैं किंतु सच्चाई यही थी कि दोनों अपने गीत अलग-अलग ही रिकॉर्ड करते थे। रिहर्सलों में भी दोनों दिखावे के लिए साथ रहते थे किंतु किसी को भी वर्षों तक भनक नहीं लगी कि वे नदी के दो किनारों की भांति अलग-अलग हैं।
वर्ष १९५० में शंकर-जयकिशन की जोड़ी सफल और लोकप्रिय ही नहीं बल्कि १९७० तक ये जोड़ी नंबर वन संगीतकार के रूप में शिखर पर बनी रही। दोनों के बीच कई बार अनबन की खबरें भी आती रहीं। किंतु जोड़ी बनी रही। किंतु राज कपूर की फिल्म ‘संगम’ जब १९६४ में प्रदर्शित हुई तो एक ऐसी घटना घट गई जिसने इस जोड़ी के वर्षों तक पर्दे में छुपे राज को खोल दिया और जोड़ी को टूटने की कगार पर पहुंचा दिया। वास्तव में ‘संगम’ का एक गीत ‘ये मेरा प्रेम पत्र पढ़कर कि तुम नाराज न होना…’ बहुत लोकप्रिय हो गया था और इसी का श्रेय पाने के लिए दोनों संगीतकार दावा पेश करने लगे थे। शंकर का कहना था कि वो गीत उनका बनाया हुआ है तो जयकिशन इस गीत पर अपना दावा जता रहे थे। अंतत: एक पत्रकार को इंटरव्यू देते समय जयकिशन ये बता बैठे कि गीत के बारे में उनका दावा ही सच है। क्योंकि प्रेमिका (बाद में पत्नी) पल्लवी ने कभी अपने प्रेम पत्र में जयकिशन को इस प्रकार की ये पंक्तियां लिखी थीं और जब गाना बनाना था तो उस समय यही पंक्तियां उन्होंने गीतकार हसरत जयपुरी को दे दी थीं और इन्हीं पर हसरत जयपुरी ने ‘संगम’ का पूरा गीत लिख दिया था। इस प्रकार ये गीत जयकिशन का ही बनाया हुआ है और प्रमाण के साथ सच सबके सामने रखा है। इस घटना के बाद शंकर-जयकिशन की वो जोड़ी टूट गई जिसने डेढ़ सौ फिल्मों के संगीत का एक सफल कीर्तिमान बनाया था। साथ ही वो राज भी खुल गया जो ‘बरसात’ के लिखित अनुबंध के साथ कई वर्षों तक छुपा रहा था। जोड़ी टूट जाने के बाद राज कपूर ने दोनों को समझाया कि वे भले ही फिल्में अलग-अलग करें लेकिन संगीतकार के रूप में नाम जोड़ी के साथ ही दें तो उन्हें इसका व्यावसायिक लाभ होगा। फिल्म जगत के अन्य बड़े निर्माताओं ने भी जब यही समझाया तो दोनों ने इसे मान लिया। अलग-अलग अपनी फिल्मों का संगीत देने के बावजूद टाइटल्स में दोनों का नाम एक साथ ‘शंकर-जयशिन’ के रूप में ही आता रहा। ‘आर.के. फिल्म्स’ की फिल्म ‘कल आज और कल’ इस जोड़ी की अंतिम फिल्म थी। इसके बाद घटनाएं तेजी से बदलीं और वाद-विवाद इतना बढ़ गया कि दोनों ने अपने-अपने नाम अलग देना प्रारंभ कर दिया। किंतु यह अधिक दिनों तक न चल सका।
यहां मुझे जयकिशन के विवाह के चक्कर में राज कपूर की पिटाई का रोचक प्रसंग याद आ रहा है। जयकिशन की प्रेमिका पल्लवी मरीवाला एक बड़े गुजराती परिवार की बेटी थी। पल्लवी और जयकिशन एक-दूसरे के प्रेम में दीवाने हो चुके थे। किंतु पल्लवी का परिवार व माता-पिता दोनों के विवाह के लिए तैयार नहीं थे। एक दिन जयकिशन ने मित्र राज कपूर को अपनी ये समस्या बताई तो राज कपूर ने तुरंत एक गुप्त योजना बना डाली। योजना के अनुसार राज कपूर पल्लवी और जयकिशन को अपनी कार में भगाकर पुणे स्थित अपने लोनी फार्म पर ले गए और पंडित को बुलवाकर गुपचुप दोनों का विवाह संपन्न करा दिया। बाद में ये बात पल्लवी के परिवार को पता चली कि गुप्त विवाह के पीछे राज कपूर का हाथ है तो उन लोगों को इतना क्रोध आया कि वे कारों में भरकर आए और राज कपूर को पीटकर ही दम लिया। बहुत मुश्किल से समझा-बुझाकर मामले को शांत कराया जा सका था।