" /> यादों के झरोखे से… भारतीय सिनेमा के पुरोधा

यादों के झरोखे से… भारतीय सिनेमा के पुरोधा

फिल्मी दुनिया से जुड़े लोग क्या इस बात की कल्पना कर सकते हैं कि आज वे जिस विशालकाय वटवृक्ष के नीचे ऐश्वर्य भरा जीवन जी रहे हैं उस वृक्ष को पल्लवित करने के लिए एक अकेले इंसान ने अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया। भारतीय सिनेमा के उस जन्मदाता का नाम धुंडीराज गोविंद फालके था, जिसे आज दुनिया दादासाहेब फालके के नाम से जानती है। उस समय देश में अंग्रेजों का राज था और धुंडीराज मुंबई के जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स में शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। यहां से वे बड़ौदा भवन पहुंचे तो मराठी नाटकों का निर्देशन आरंभ कर दिया और फोटोग्राफी कला के विशेषज्ञ भी बन गए। एक दिन धुंडीराज ने ‘लाइफ ऑफ क्राइस्ट’ फिल्म देखी तो उनके मन में भी फिल्म बनाने की कसक जाग उठी। उनकी रातों की नींद गायब हो गई। धुन के पक्के धुंडीराज सिनेमा के हर पक्ष और पहलू को सीखने में जुट गए। उनके परिचितों को लगा कि धुंडीराज दीवाने हो गए हैं क्योंकि दिन-रात उन पर सिनेमा की ही धुन सवार रहती। सिनेमा के भारतीयकरण के इस महान उद्देश्य में उनकी पत्नी सरस्वती फालके कंधे-से-कंधा मिलाकर उनका साथ दे रही थीं।
धुंडीराज फालके नासिक का अपना पैतृक घर छोड़कर मुंबई आ गए और सिनेमा के आगामी चरण की तैयारियों के रूप में साधनों, मशीनों और अन्य तकनीकी वस्तुओं के मूल्यों की सूची तैयार करने लगे। पूरी तैयारी के बाद वे यशवंत नाडकर्णी से मिले और उनसे कहा कि वे उनकी जीवन बीमा की पॉलिसी को गिरवी रखकर उन्हें दस हजार रुपए उधार दे दें। तब नाडकर्णी ने उनके सामने शर्त रखी कि वे उन्हें कोई फिल्म शूट करके दिखाएं। तब धुंडीराज ने ‘ग्रोथ
ऑफ एवी प्लांट’ नामक एक लघु फिल्म बनाकर दिखाई। नाडकर्णी फिल्म देखकर इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने दस हजार रुपए का कर्ज धुंडीराज को दे दिया। इस रकम को लेकर धुंडीराज १ फरवरी, १९१२ को लंदन के सफर पर निकल गए। लंदन पहुंचकर धुंडीराज ‘बाइस्कोप विकली’ के संपादक केबोर्न से मिले, जिन्होंने धुंडीराज को कैमरा, प्रिंटिंग मशीन और कच्ची फिल्म खरीदने में सहयोग किया। केबोर्न ने न सिर्फ सामान खरीदने में, बल्कि फिल्म निर्माता सिसिल हेपवर्थ से भी उनकी मुलाकात करवाई, जिससे उन्हें मूल्यवान जानकारियां मिलीं। अप्रैल, १९१२ में जब धुंडीराज स्वदेश लौटे तो उनके अंदर एक सर्जक आत्मविश्वास के साथ लबरेज था। धुंडीराज ने अपनी पत्नी और बच्चों को कलाकार बनाकर कुछ शूट किया और उसे एक फाइनांसर को दिखाया। फाइनांसर कर्ज देने को तैयार हो गया और गारंटी के रूप में पत्नी ने अपने सारे गहने गिरवी रख दिए। ‘राजा हरिश्चंद्र’ के रूप में पहली फिल्म का जन्म हुआ। सब कुछ तय हो गया। हीरो से लेकर अन्य कलाकार तो उपलब्ध हो गए लेकिन कोई महिला कलाकार हीरोइन का रोल करने को तैयार नहीं हुई। अंतत: धुंडीराज ने रेस्तरां में काम करनेवाले सालुंखे को राजा हरिश्चंद्र की पत्नी तारामती की भूमिका के लिए तैयार कर लिया। १९१२ में जब किसी को सिनेमा के जन्म की कल्पना भी न थी तब धुंडीराज फालके ने अपना सर्वस्व अर्पण कर अड़चनों, कठिनाइयों और अथक परिश्रम के बाद ६ महीनों में ‘राजा हरिश्चंद्र’ को बनाकर पूरा कर लिया। ३ मई, १९१३ को मुंबई के ‘कोरोनेशन सिनेमा’ में भारत की ये सर्वप्रथम फिल्म प्रदर्शित हुई तो प्रेस से लेकर हर किसी ने इस फिल्म की प्रशंसा की।
निर्माता के रूप में धुंडीराज फालके ने सौ फीचर और तीस लघु फिल्मों का निर्माण किया। १९४४ में ७४ वर्ष की उम्र में भारतीय सिनेमा के इस पुरोधा की मृत्यु हुई तो कोई उन्हें जानता तक नहीं था। वर्षों बाद जब दुनिया को उनके समर्पण का पता चला तब उन्हें दादा साहेब फालके कहकर न केवल सम्मान दिया गया, बल्कि १९६९ में भारत सरकार ने सिनेमा से जुड़े कलाकारों के लिए ‘दादा साहेब फालके’ पुरस्कार की घोषणा की, जिसे प्राप्त करना किसी भी कलाकार के लिए गर्व ही नहीं सम्मान की बात है।