यादों के झरोखों से- गीत गाने के लिए मुकदमा झेलना पड़ा

३० वर्षों से भी अधिक समय तक फिल्म संगीत के आकाश पर एक पार्श्वगायक के रूप में छाए रहनेवाले महेंद्र कपूर के करियर का आरंभ एक बहुत ही नाटकीय एवं रोचक घटना के साथ हुआ था। जब पहले गीत के लिए ही उन्हें उनका पारिश्रमिक मिलना तो दूर बल्कि घोर अपमान का घूंट पीना पड़ा था। यह घटना १९६० के दशक में घटी थी जब महेंद्र कपूर गायक कलाकार बनने के लिए संघर्ष कर रहे थे और उस दौर के हर नामी संगीतकार के चक्कर लगा रहे थे। इन्हीं नामी संगीतकारों में अनिल बिस्वास भी थे जो उन दिनों ‘फिल्मिस्तान’ कंपनी की एक नई फिल्म ‘हीर’ के लिए संगीत तैयार कर रहे थे। नए, संघर्षशील गायक की आवाज अनिल बिस्वास को जम गई और उन्होंने महेंद्र कपूर से ‘हीर’ का एक गीत रिकॉर्ड करवा लिया। शर्त यह थी कि महेंद्र कपूर को गाने का पारिश्रमिक फिल्म की रिलीज के बाद दिया जाएगा।
‘हीर’ प्रदर्शित हुई और असफल हो गई। फिल्म के साथ ही फिल्म के गीत भी असफल साबित हुए। संघर्षशील गायक महेंद्र कपूर जब अपना पारिश्रमिक लेने के लिए ‘फिल्मिस्तान’ कंपनी के कार्यालय में पहुंचे तो उन्हें कार्यालय में एक पारसी क्लर्क मिला। क्लर्क ने पूछा वे कौन हैं और क्यों आए हैं, तो महेंद्र कपूर ने बताया कि ‘वे एक गायक हैं। ‘हीर’ के लिए उन्होंने गाना गाया था और वे अपना पारिश्रमिक लेने के लिए आए हैं।’ इतना सुनना था कि पारसी क्लर्क भड़क गया और बोला, ‘पिक्चर फेल हो गई और तू पैसा लेने को आया है। चल भाग यहां से।’ जब महेंद्र कपूर अड़े रहे तो पारसी क्लर्क ने चपरासी को बुलाया और महेंद्र कपूर को कार्यालय से बाहर करवा दिया।
पहली फिल्म के पहले ही गीत का पारिश्रमिक न मिलने के बदले जब ऐसा अपमान मिला तो महेंद्र कपूर का दिल टूट गया और उन्होंने तय कर लिया कि वे भविष्य में कभी किसी फिल्म के लिए नहीं गाएंगे। परिवार की गुजर-बसर के लिए वे संगीतकार खय्याम के ‘कोरस सिंगर’ समूह से जुड़ गए जो उन दिनों देशभक्ति और देश प्रेम के गीत गाया करता था। जब महेंद्र कपूर इस ‘कोरस समूह गान’ के साथ जुड़े थे तब उन्हें यह नहीं मालूम था कि किस्मत उनके साथ वैâसा खेल खेल रही है और उन्हें पहले गीत के लिए पारिश्रमिक क्यों नहीं मिला था? समूह गायक कलाकार के रूप में गाते हुए महेंद्र कपूर सबकुछ भूल गए थे। इसी बीच नए गायक कलाकारों के लिए एक प्रतियोगिता आरंभ हुई, जिसका नाम ‘मेट्रो मर्फी कंपटीशन’ था। इस प्रतियोगिता के निर्णायकों में फिल्म जगत के नामी संगीत निर्देशक नौशाद, मदन मोहन, वसंत देसाई और सी. रामचंद्र थे और प्रतियोगिता के विजेता को पुरस्कार स्वरूप इन सभी संगीतकारों की फिल्मों में गीत गाने का अवसर मिलनेवाला था। इस प्रतियोगिता की शर्त यह थी कि भाग लेनेवाला गायक एकदम नया हो, अपरिपक्व हो और उसने व्यावसायिक रूप से पहले कभी कहीं न गाया हो। महेंद्र कपूर का दिल इस कदर टूट गया था कि वे ऐसी किसी भी प्रतियोगिता में भाग नहीं लेना चाहते थे। किंतु उनके एक प्रिय मित्र सुरेंद्र कपूर ने प्रतियोगिता के लिए फॉर्म भर दिया और तब न चाहते हुए भी मित्र का प्रेम देखकर महेंद्र कपूर ने ‘मेट्रो मर्फी कंपटीशन’ में भाग ले ही लिया। सौभाग्य से महेंद्र कपूर अपने प्रतिद्वंद्वियों पर भारी पड़े और निर्णायकों ने उन्हें विजेता घोषित किया। महेंद्र कपूर के लिए यह बहुत बड़ी विजय थी क्योंकि उन्हें सभी निर्णायक नामी संगीतकारों की फिल्मों में गाने का अवसर मिल रहा था।
किंतु अभी महेंद्र कपूर अपनी जीत का जश्न भी नहीं मना पाए थे कि एक मुसीबत सामने आकर खड़ी हो गई। प्रतियोगिता के एक अन्य प्रतियोगी ने अदालत में महेंद्र कपूर पर धोखाधड़ी करने का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज करा दी कि वे एक नए और अपरिपक्व गायक नहीं हैं। वे ‘हीर’ नामक फिल्म में व्यावसायिक गायक के रूप में गीत गा चुके हैं और उन्होंने झूठ बोलकर उस प्रतियोगिता की शर्त को तोड़ा है और निर्णायकों को धोखा दिया है। आखिरकार, अदालत में मामले की सुनवाई आरंभ हुई और एक कठिनाई न्यायाधीश के सामने यह आ गई कि वे एक परिपक्व गायक और एक अपरिपक्व गायक कलाकार को किस सीमा रेखा से नापकर अलग-अलग श्रेणी में रखें। अदालत में अपने ढंग का पहला और एक अनोखा मामला था। कानून की किसी भी धारा में न तो ऐसी कोई व्याख्या थी और न सीमा-रेखा तय की गई थी। न्यायाधीश श्री तुलजापुरकर ने अपने आपको विचित्र स्थिति में पाया तो इस विषय में अपने अन्य साथी न्यायाधीशों से विचार-विमर्श किया और इस निर्णय पर सहमत हुए कि विपक्षी पार्टी से इस बात के सबूत मांगे जाएं कि महेंद्र कपूर ने सचमुच व्यावसायिक रूप से किसी फिल्म के लिए गीत गाया है। अंतत: मामले पर निर्णय से पहले न्यायाधीश ने विपक्षी प्रतिद्वंद्वी से कहा कि वह अपने आरोप को सिद्ध करने के लिए महेंद्र कपूर द्वारा गाए ‘हीर’ के पारिश्रमिक की रसीद अदालत में सबूत के रूप में प्रस्तुत करे ताकि ये साबित हो सके कि महेंद्र कपूर ने व्यावसायिक गायक के रूप में गाना गाया है और वे एक अपरिपक्व गायक नहीं हैं। न्यायालय में सबूत जमा करने के लिए जब प्रतिद्वंद्वी ने पारिश्रमिक की रसीद के लिए ‘फिल्मिस्तान’ में भाग-दौड़ की तो तमाम प्रयत्नों के बावजूद उसे ऐसी कोई रसीद नहीं मिल सकी। क्योंकि वास्तव में महेंद्र कपूर को न तो ‘हीर’ के गीत के लिए कोई पारिश्रमिक मिला था और न ही कोई रसीद कंपनी के रिकॉर्ड में मौजूद थी। अंतत: सबूत के अभाव में प्रतिद्वंद्वी अदालत में हार गया और महेंद्र कपूर विजयी मुस्कान के साथ अदालत से बाहर आए। उस दिन महेंद्र कपूर ने महसूस किया कि किस्मत ने ‘हीर’ के लिए गीत का पारिश्रमिक न दिलवाकर उनके साथ कितना सुखद काम किया था। क्योंकि अदालत में विजयी होने के बाद महेंद्र कपूर को ‘मेट्रो मर्फी कंपटीशन’ की प्रतियोगिता का निर्विवाद विजेता घोषित किया गया। इस घोषणा के बाद सी. रामचंद्र ने महेंद्र कपूर से वी. शांताराम की फिल्म ‘नवरंग’ के सारे गीत गवाए तो नौशाद ने ‘सोहनी महिवाल’ में महेंद्र कपूर से ऐसा गीत गवाया, जिसे सुनकर दुनिया ने स्वीकार कर लिया कि महेंद्र कपूर के रूप में फिल्म संगीत संसार को एक और मोहम्मद रफी मिल गया है। फिल्म ‘सोहनी महिवाल’ के गीत को सुनकर निर्माता बी.आर. चोपड़ा ने महेंद्र कपूर से अपनी नई फिल्म ‘धूल का फूल’ का यादगार गीत ‘तेरे प्यार का आसरा चाहता हूं…’ गवाया और इसके बाद इस अमर गायक ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। महेंद्र कपूर भले ही मोहम्मद रफी नहीं बन सके किंतु अपने गीतों और अपनी मधुर आवाज से उन्होंने अपनी जो पहचान बनाई थी वो आज भी उतनी ही ताजा है।