" /> यूपी के सिस्टम पर सुप्रीम सवाल!

यूपी के सिस्टम पर सुप्रीम सवाल!

कानपुर के बिकरू गांव में हुए आठ पुलिस वालों के सामूहिक संहार और दुर्दांत विकास दुबे सहित छह लोगों को एनकाउंटर पर सवाल खड़ा करती हुई एक याचिका पर सुनवाई करते हुए योगी सरकार पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल खड़े किए हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने इसे सिस्टम का फेल हो जाना बताया है। जिस तरह से मुकदमे की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की और प्रदेश सरकार की पैरवी करते यूपी सरकार लाचार नजर आई, उसने यह साफ कर दिया है कि कम से कम इस मामले में तो सरकार पाक-साफ नहीं है। पहले भी यह सवाल खड़ा हो चुका है कि आखिर ६० मुकदमे दर्ज होने के बाद भी कुख्यात अपराधी विकास दुबे क्यों जेल में नही था? पैरोल किस सूरत में मिल गई और थाने में घुसकर हत्या कर देने के बाद भी बाइज्जत कैसे बरी हो गया?
फिलहाल विकास दुबे कांड को लेकर उत्तर प्रदेश की योगी सरकार अदालती और राजनैतिक दोनो मोर्चों पर घिर गई है। जहां एक ओर अदालत में इस मुडभेड़ पर सवाल हैं, वहीं राजनैतिक दल उस पर ब्राह्मणों के विरोध का आरोप लगा रहे हैं। इन आरोपों को सोशल मीडिया पर चल रही तमाम बहसों से और भी बल मिलता है। योगी सरकार ने इसका राजनैतिक जवाब देने के लिए प्रदेश में फिलवक्त सबसे भरोसेमंद ब्राह्मण चेहरा कहे जाने वाले मंत्री ब्रजेश पाठक को उतारा है तो अदालत में उसकी पैरवी भारत के शीर्ष अधिवक्ता हरीश साल्वे और तुषार मेहता कर रहे हैं। ब्रजेश पाठक भाजपा और प्रदेश सरकार पर ब्राह्मण विरोधी होने के आरोपों पर सफाई दे रहे हैं और बाकी दलों के इस जाति के लिए उमड़े प्रेम पर सवाल भी खड़े कर रहे हैं। वैसे तो सरकार में ब्राह्मण समाज का व्यापक प्रतिनिधित्व है पर विपक्ष के हमलों का जवाब देने के लिए पाठक को चुनने का एक बड़ा कारण इस समाज में उनकी लोकप्रियता और लोगों का भरोसा है।
अब तक के घटनाक्रम से इतना तो साफ होता है कि योगी सरकार भले ही राजनैतिक लड़ाई में औरों को पटखनी देने में सफल होती दिख रही हो पर अदालत में उसे जरूर कई सवालों के जवाब देने पड़ सकते हैं। मुडभेड़ और उसकी जांच से लेकर विकास दुबे के पनाहगारों तक के सवाल पर यूपी सरकार को सुप्रीम कोर्ट में जवाब देना पड़ा है और आगे भी देना पड़ सकता है। बुधवार को सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश फिर इस मामले को सुनेंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने एनकाउंटर पर दाखिल एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सोमवार को कहा था कि विकास दुबे पर मुकदमा चलना चाहिए था और उसे न्यायिक प्रक्रिया के तहत सजा दी जानी चाहिए थी। सुप्रीम कोर्ट में यूपी सरकार की ओर से पैरवी करने के लिए दिग्गज वकील हरीश साल्वे और तुषार मेहता खड़े हुए थे। बिकरू कांड के बाद मुख्य आरोपी विकास दुबे ने पुलिस के हथियार छीन कर भागने की कोशिश की और मुडभेड़ में मारा गया। विकास के पांच साथियों , जिसमें एक नाबालिग प्रभात मिश्रा भी शामिल है, को यूपी पुलिस ने मुडभेड़ में मार दिया था। इतना ही नहीं विकास दुबे के बिकरू गांव वाले घर को भी बुलडोजर चला कर गिरा दिया गया था। वारदात में विकास के साथ रहे और दाहिना हाथ बताए जाने वाले अमर दुबे को भी मुडभेड़ में मार दिया गया था और उसकी नौ दिन की ब्याहता पत्नी को जेल भेज दिया था। इन्ही मुठभेड़ों पर सवाल खड़ा करते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाली गई थी।
उच्चतम न्यायालय में याचिका की सुनवाई करते हुए कहा कि कानून व्यवस्था बनाए रखना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है। मुख्य न्यायाधीश ने जांच आयोग के गठन पर भी सवाल खड़े किए। इससे पहले याचिकाकर्ता ने आयोग के गठन के पहले विधानसभा या राज्यपाल की मंजूरी न लेने का सवाल उठाया था। याचिकाकर्ता का कहना था कि जांच आयोग के अध्यक्ष जस्टिस शशिकांत रिटायर्ड जज नहीं हैं बल्कि उन्होंने नौकरी से इस्तीफा दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार को जांच आयोग के पुनर्गठन की अधिसूचना जारी करने से भी रोक दिया है। कोर्ट ने यूपी सरकार से कहा कि पहले हमें नाम बताइए कि आयोग में कौन होगा फिर हम विचार करेंगे।
अदालत ने कहा कि जिसके खिलाफ इतने मामले थे वो जमानत पर कैसे बाहर था? यह सीधे-सीधे सिस्टम की विफलता है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि विकास दुबे केस का ट्रायल होना चाहिए था। उन्होंने कहा कि यह मामला हैदराबाद एनकाउंटर से किस तरह से अलग है। यहां भी सिस्टम ही फेल दिखता है।
उच्चतम न्यायालय में सोमवार को हुई सुनवाई में यह साफ हो गया कि विकास दुबे कांड की जांच कमेटी में सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज और रिटायर्ड डीजीपी शामिल होंगे। आयोग के यह दोनों सदस्य कौन होंगे, यह सुप्रीम कोर्ट तय करेगा। सुनवाई के दौरान ही न्यायाधीशों ने प्रदेश सरकार से पूछा था कि क्या जांच कमेटी में सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज या रिटायर्ड पुलिस अफसर को शामिल करेंगे? यूपी सरकार के इस पर सहमति जताने पर अदालत ने कमेटी के पुनर्गठन की अधिसूचना जारी करने से योगी सरकार को रोका और कहा- आप हमें नाम बताइए। हम विचार करेंगे। इस रुख के बाद यह उम्मीद है कि अब इस कांड की आगे की जांच सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हो सकती है।
बिकरू कांड के बाद यूपी सरकार ने वरिष्ठ आईएएस अधिकारी संजय भूसरेड्डी की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय एसआईटी की गठन किया गया है जबकि पूर्व न्यायाधीश शशिकांत अग्रवाल की अध्यक्षता में न्यायिक आयोग का गठन किया था। दोनों ही आयोगों ने अपना काम भी शुरू कर दिया है।
विकास दुबे का वित्तीय प्रबंधन देखने वाले कानपुर के व्यवसायी जय बाजपेयी को यूपी पुलिस ने आधिकारिक रूप से गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस का कहना था कि जय बाजपेयी के आर्थिक अपराधों की जांच प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) करेगा। इस मामले में भी जय बाजपेयी को छोड़े जाने के बाद हुई किरकिरी को देखते हुए उसे रविवार रात आधिकारिक रूप से गिरफ्तार कर लिया गया। प्रदेश पुलिस के पूर्व अधिकारियों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच होने और उसकी मर्जी के अधिकारियों के शामिल होने के बाद असली परीक्षा मुठभेड़ को साबित करने की होगी। साथ विकास दुबे के मददगारों, उसे पनाह देने वालों और अब उसके जरायम को पाल पोस रहे सरकार व प्रशासन के आला अधिकारियों के नाम भी सामने आ सकते हैं।
कानपुर के विकास दुबे के एनकाउंटर मामले को लेकर ब्रजेश पाठक का दावा है कि सोशल मीडिया पर ब्राह्मणों के नाम पर फर्जी अकाउंट बनाकर सरकार को बदनाम करने का काम हो रहा है लेकिन जनता जागरूक है और इसका भंडाफोड़ समय आने पर किया जाएगा। पाठक कहते हैं कि अपराधी किसी भी जाति का हो, कोई भी हो, जो कानून को हाथ में लेगा, उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी और जो भी निर्दोष हैं, उन्हें कभी भी कोई नाजायज सताने नहीं पाएगा। यह हमारी सरकार की जिम्मेदारी है।कुल मिलाकर यूपी सरकार ब्राह्मण वोट बैंक को लेकर डैमेज कंट्रोल मोड में आ गई है। इसी के चलते कहा जा रहा है कि सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने सांसद शिव प्रताप शुक्ल को राज्यसभा में मुख्य सचेतक के पद पर नियुक्त किया है। उच्च सदन में पार्टी के लिए व्हिप जारी करने की जिम्मेदारी अब उनके कंधों पर होगी।
भाजपा ने अभी तीन दिन पहले आगरा के विधायक योगेंद्र उपाध्याय को उत्तर प्रदेश वधिानसभा में पार्टी का सचेतक बनाया है। अब देखने वाली बात यह है कि ब्रजेश पाठक के प्रयास और शिव प्रताप शुक्ला और योगेंद्र उपाध्याय की नियुक्ति से यूपी सरकार ब्राह्मण वोट साधने में कितनी सफल हो पाती है?