ये अंतिम यात्रा नहीं शुरुआत है!

अटल जी अनंत में विलीन हो गए। देश शोक में है। नेता आएंगे और जाएंगे। सत्ता पद के शपथ ग्रहण के समारोह होंगे लेकिन अटल जी का फिर निर्माण नहीं होगा। अटल जी की दहकती चिता देखी और लगा कि ये कैसा दिन उदित हुआ है। अटल जी के जाने से किसने क्या गंवाया है इसका हिसाब दिया गया है। किसी का आधार टूट गया है, कोई कह रहा है कि कोहिनूर हीरा खो गया। किसी ने कहा कि युगांत हो गया है लेकिन हम कहते हैं अटल जी का स्वर्गारोहण शिवसेनाप्रमुख की ही तरह है। अटल जी के जीवित रहते हम जितने धनी थे अब उतने ही निर्धन हो गए हैं। उसी तरह उनके रहते हम जितने सामर्थ्यवान थे, उतने ही आज असमर्थ हो गए हैं। वाजपेयी संपूर्ण मनुष्य थे। वे आनंद यात्री थे। वे नए नेहरू थे। वाजपेयी मुश्किल पहेली नहीं थे। मूलत: वे पहेली थे ही नहीं। मोरारजी के मंत्रिमंडल में अटल जी विदेश मंत्री थे। उनके विदेश भ्रमण पर टिप्पणी हुआ करती थी। ये विदेश मंत्री अपनी बैग देश में रखते ही नहीं। इस टिप्पणी को वे खुले दिल से स्वीकारते थे। जनता दल के कार्यकाल में दोहरी निष्ठा का विवाद उठा। मंत्री राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के समारोह में उपस्थित न रहें, ऐसा फरमान जब मोरारजी देसाई ने दिया तब वाजपेयी ने उन्हें तत्काल सूचित किया कि ‘मुझे जिस समारोह में उपस्थित रहने का मन करेगा उसमें उपस्थित रहने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।’ उन्होंने आगे स्पष्ट कहा कि ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से मेरा जो रिश्ता है उसे तोड़ दो यदि ऐसा कोई कहे तो मैं इसे मान्य नहीं करूंगा।’ वाजपेयी ने अपनी उदारवादिता से पहले जनसंघ को और बाद में भारतीय जनता पार्टी को बड़ा किया। कम्युनिस्टों को भी वाजपेयी के प्रति स्नेह था। कम्युनिस्टों के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जनसंघ तथा भाजपा के प्रति धुर विरोधी विचार हैं। लेकिन वाजपेयी का नाम आते ही ये ‘लाल फूलवाले’ अधिक फूल जाते हैं। वे कहने लगते हैं, ‘कौन, वाजपेयी न? वे बिल्कुल अलग इंसान हैं। वे उदार व्यक्तित्व के हैं। उनमें वो सनक नहीं है इसीलिए संघवालों को वाजपेयी अपने नहीं लगते।’ ‘जनसंघ में रहनेवाला हमारा आदमी’ ऐसा वाजपेयी का वर्णन करने की कोशिश भले ही कम्युनिस्ट वाले न करें पर वाजपेयी के बारे में वे स्नेह से बोलते थे। वाजपेयी जी का यही उदार व्यक्तित्व सभी पीढ़ियों को अपना सा लगता था। वे सभी घटकों में आसानी के साथ घुल-मिल जाते थे। सोशल मीडिया तब नहीं था। इलेक्ट्रॉनिक खबरों की मीडिया नहीं थी, लेकिन वाजपेयी युवकों के हीरो थे। कीएव्ह में हिंदुस्थानी छात्रों के सामने प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई भाषण कर रहे थे तब अटल बिहारी वाजपेयी बगल में बैठे थे। मोरारजी भाई छात्रों की बौद्धिक परीक्षा ले रहे थे और सिर्फ छड़ी उनके हाथ में नहीं थी। ‘मद्यपान नहीं करना, स्वयं का भोजन स्वयं पकाना। तुम्हें मिलनेवाली छात्रवृत्ति यदि कम पड़ रही होगी तो तुम्हें यहां आने के लिए किसने कहा? सामान बांधो और घर जाओ।’ मोरारजी भाई का यह प्रवचन सुनकर परेशान छात्र वाजपेयी के इर्द-गिर्द जमा हो गए। मोरारजी के रुतबे के कारण वाजपेयी दुविधा में थे। ऐसा नजर आते ही एक छात्र ने उनसे कहा, ‘यहां इतनी ठंड होती है कि थोड़ा-सा मद्यपान किया तो कुछ नहीं बिगड़ता?’ मोरारजी भाई आसपास नहीं हैं इसका अंदाजा होने के बाद आंख मिचकाते हुए (यह उनका चिर-परिचित अंदाज है) वाजपेयी उस लड़के से बोले, ‘पीयो, दवा के रूप में पीयो!’ इस छोटी-सी गपशप से वाजपेयी ने उन बच्चों को अपना बना लिया था। मौजूदा राजनीतिज्ञों के बीच जवाहरलाल नेहरू टिप्पणी का विषय हैं लेकिन नेहरू के प्रति वाजपेयी हमेशा आदर जताते थे। नेहरू की विदेश नीति की मूलभूत कल्पना मुझे मंजूर है, ऐसा उन्होंने कई बार कहा है। वाजपेयी जी का लोकसभा में दिया गया पहला भाषण आज भी लोगों के जहन में है। उस भाषण में उन्होंने एक मार्मिक उच्चारण किया है। ‘भाषण करने के लिए वक्तृत्व लगता है, परंतु मौन रखने के लिए वत्तृâत्व के साथ ही संयम की भी जरूरत होती है।’ जिन अंतर्राष्ट्रीय सवालों से हिंदुस्थान का संबंध नहीं आता उसमें नाक घुसेड़ने की बिल्कुल जरूरत नहीं, ऐसा ही उन्हें कहना था और इस तत्व का पालन आखिर तक उन्होंने किया। ‘सूर्य अस्त हो गया’ इस तरह अत्यंत प्रभावी शब्दों में वाजपेयी ने नेहरू के निधन का वर्णन किया था। नेहरू को आदरांजलि अर्पित करते हुए वाजपेयी बोले, ‘नेहरू, बहुत ही ईमानदार थे। उनका ध्येयवाद विशाल था। चर्चा से वे कभी डरे नहीं और कभी डरकर उन्होंने चर्चा नहीं की।’ वाजपेयी उस समय भाव-विह्वल हो उठे कि वे रोने लगे। बांग्लादेश युद्ध के बाद वाजपेयी ने इंदिरा गांधी की प्रशंसा दुर्गावतार के रूप में की। उस समय भी संघ उनसे नाराज हुआ था, पर वे पीछे नहीं हटे। वे हिंदुत्ववादी थे, मगर मुसलमानों के विरोधी नहीं थे। पाकिस्तान के प्रति उनके मन में चिढ़ थी। पर चिढ़ने का उपयोग क्या? आखिरकार वह पड़ोसी राष्ट्र है। ‘हम इतिहास बदल सकते हैं, भूगोल कैसे बदलेंगे? पड़ोसी वैâसे बदलेंगे? उनके साथ ही रहना होगा।’ यह उनकी नीति थी। विदेश मंत्री के रूप में वे पाकिस्तान दौरे पर गए। उस समय पाकिस्तान के अध्यक्ष जिया उल हक ने उन्हें उनके अनेक पुराने बयानों के लिए छेड़ा। तब वाजपेयी ने हक से कहा, ‘मैं अपना भूतकाल भूल चुका हूं। आप भी अपना भूतकाल भूल गए होंगे, ऐसा मुझे लगता है।’ इसके बाद दोनों के बाद खुली चर्चा हुई। अटल जी अजातशत्रु थे। सिर पर बोझ लेकर वे नहीं चले। वे खुद जिए और अन्य लोगों को जीने दिया। दूसरों की सफलता देखकर उन्हें जलन नहीं होती थी। देश की सर्वसमावेशक संस्कृति की बागडोर उन्होंने पकड़ी। अश्रुपूरित आंखों से, रुंधे हुए गले से तमाम देशवासियों ने अटल जी को शुक्रवार की शाम अंतिम विदाई दी। एक आनंद यात्री जिसने देश को आनंद देने की कोशिश की वे आखिरी यात्रा पर निकले और उस यात्रा में देश के प्रधानमंत्री मोदी सहित अनेक मान्यवर पैदल चल रहे थे। ये उन चलनेवालों की किस्मत थी। गीता में कहा गया है, उसे सच मान लिया जाए तो ‘शस्त्रों से इस तरह के इंसान कभी मरते नहीं। अग्नि से वे कभी भी जलते नहीं। पानी से वे कभी भी भीगते नहीं। हवा से वे कभी भी सूखते नहीं।’ ऐसा हिंदुस्थानी तत्वज्ञान कहता है। अटल जी की यात्रा एक दिलदार, सत्वशील वीर पुरुष की यात्रा थी। इस वीर पुरुष ने जितना प्यार गांधी-नेहरू से किया उतना ही प्यार वीर सावरकर से किया। इस वीर पुरुष की आखिरी यात्रा की ओर देखते हुए कार्लाइल के एक वचन को याद किया जाए तो पर्याप्त है। ‘काल का जो उद्देश्य था, वो कल की शुरुआत है।’ ऐसा एक चिरंतन सत्य कार्लाइल ने कहा है। आज से हमें उस दिशा की ओर चलना शुरू कर देना चाहिए। अटल जी की अंतिम यात्रा जब खत्म होगी उस समय यह यात्रा शुरू हो चुकी होगी। एक प्रदीर्घ, विक्रमी, सत्वशील कालखंड की यह यात्रा आखिरी नहीं है। जहां वो खत्म होगी, वहां से वह नई शुरू होगी। आत्मा अमर होने का तत्व मान लिया जाए तो अटल जी देश की आत्मा में विलीन हो गए हैं, देश की विच्छिन्न हुई आत्मा को नए सिरे से एकत्रित करने के लिए। आज उसकी जरूरत है!