" /> ये खेल परछाइयों का!, ‘शैैडो’ मतलब क्या?

ये खेल परछाइयों का!, ‘शैैडो’ मतलब क्या?

महाराष्ट्र के घटनाक्रम के कारण देश की राजनीति को नया मोड़ मिल गया है। इसलिए सबसे बड़ी पार्टी भारतीय जनता पार्टी को एक ही रात में विरोधी दल की बेंच पर जाकर बैठना पड़ा। फिलहाल भाजपा विरोधी दल है इसके बावजूद उसका बर्ताव सत्ताधारी पार्टी की तरह ही होता है। ये मजेदार है। लोकतंत्र में प्रबल विरोधी दल का सत्ताधारियों से लगातार विरोध चलता रहता है लेकिन विरोधी दल के नेताओं का स्थान और उनका काम क्या होता है, इस संदर्भ में हमारे नेताओं को ज्ञान नहीं है। इसलिए राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर विरोधी दल ‘फुटकर’ प्रयोग करता रहता है। ऐसे प्रयोगों से विरोधी दल की प्रतिमा धूमिल होती है। इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और न्यूजीलैंड जैसे देशों के लोकतंत्र में विरोधी पार्टी के नेताओं को भी प्रधानमंत्री जितना ही महत्व है। लोकतंत्र का ये अविभाजित अंग है। यहां तक कि उनका वर्णन ‘वैकल्पिक प्रधानमंत्री’ (प्रिटेंडर टू डू प्राइम मिनिस्टर्स थ्रोन) के रूप में किया जाता है। लोकतंत्र और विरोधी दलों के बारे में एक घड़ा तेल उड़ेलने का कारण ये है कि महाराष्ट्र के मंत्रिमंडल पर ‘नजर’ रखने के लिए एकमात्र विधायक वाली पार्टी ने एक ‘शैडो वैâबिनेट’ बनाने की घोषणा की है। ये ‘शैडो’ मंत्रिमंडल राज्य के लोकनियुक्त मंत्रिमंडल का काम वैâसे चल रहा है इस पर नजर रखेगी। संबंधित राजनीतिक पार्टी की ओर से घोषणा की गई है कि सरकार के गलत कामकाज पर आपत्ति जताने के लिए ये ‘शैडो वैâबिनेट’ बनाई गई है। सरकार की गलतियां बताओ और सरकार ने कुछ अच्छा काम किया तो उसका अभिनंदन भी करने की बात कही गई है। वास्तव में इस प्रकार की ‘शैडो वैâबिनेट’ किसे तैयार करनी चाहिए? इस बारे में कुछ मान्यताएं हैं। यह प्रयोग संसद की प्रमुख और प्रबल विरोधी पार्टी द्वारा किया जाना चाहिए। महाराष्ट्र एक बड़ा राज्य है और यहां भाजपा एक प्रबल विरोधी दल है। उस १०५ विधायकों वाले दल ने ‘शैडो’ मंत्रिमंडल नहीं बनाया लेकिन एकमात्र विधायक वाले ने ‘शैडो’ आदि कुछ बनाया। शैडो मतलब क्या? इसे समझ लें। बै. विट्ठलराव गाडगिल आज नहीं हैं। उनके भाषणों और लेखन में यूरोप आदि देशों की ‘शैडो’ वैâबिनेट की जानकारी कई बार मिलती है। ये दिलचस्प है। राज्य के ‘शैडो’ वालों ने इस बारे में पूरी तैयारी नहीं की है। इंग्लैंड के लोकतंत्र में विरोधी दल के नेता को जो महत्व प्राप्त हुआ है वो ‘शैडो वैâबिनेट’ के कारण ही मिला है। इंग्लैंड में विरोधी दल के नेताओं को ज्यादा महत्व, मतलब १९५५ से ‘छाया मंत्रिमंडल’ (शैडो कैबिनेट) और ‘विरोधी दल के अधिकृत प्रवक्ता’ (अपोजिशन स्पोक्समैन) का महत्व बढ़ गया है। १९वीं सदी में सत्तासीन और उदारवादी मंत्रिमंडल के मंत्री सत्ता जाने के बाद विरोधी दल के रूप में काम करते समय या काम करवाने के लिए समय-समय पर मिलते रहते थे। मंत्रिमंडल की तरह उनकी बैठकें होती थीं। इन अनौपचारिक बैठकों से छाया मंत्रिमंडल की कल्पना सूझी। इस सदी में छाया मंत्रिमंडल का औपचारिक रूप से प्रयोग होने लगा। सत्ताधारी दल जब विरोध करता है तब उनका नेता छाया मंत्रिमंडल का सदस्य चुनता है। विपक्षी दल में संसदीय दल का नेता चुनता है। उनकी औपचारिक रूप से नियमित बैठक होती है। उसकी जानकारी अखबारों को दी जाती है और विकल्प के रूप में प्रधानमंत्री के साथ ही वैकल्पिक मंत्रिमंडल भी तैयार है, जनता के सामने ऐसी तस्वीर प्रस्तुत की जाती है। १९५१ में सत्तापक्ष की हार के बाद विरोधी दल के रूप में काम करते समय नीति-नियमों के मुद्दे पर अलग-अलग सांसद अलग-अलग मत व्यक्त करने लगे। दल के सांसद एक ही बात बोलें ऐसी मांग जोर पकड़ने लगी तथा जुलाई, १९५५ में पार्टी की एक बैठक के बाद विरोधी पार्टी के नेता श्री एटली ने २४ अलग-अलग मुद्दों को लेकर विरोधी पार्टी के ३९ अधिकृत प्रवक्ताओं का नाम घोषित किया। नीति के मुद्दे पर ये प्रवक्ता अपनी पार्टी का अधिकृत पक्ष संसद में रखने लगे। उस पार्टी ने १९६४ मतलब १३ सालों तक विरोधी दल के रूप में काम किया। अधिकृत प्रवक्ताओं का ये सिलसिला उस समय इतना छा गया कि १९६४ में सत्ताधारी पार्टी जब विरोधी दल बनी तब उसने भी अधिकृत प्रवक्ताओं को चुनना शुरू कर दिया और उनके चुनाव का महत्व बढ़ गया। परिणाम ये हुआ कि विरोधी दल के नेता का पार्टी में प्रभाव और महत्व बढ़ा। इस शैडो वैâबिनेट की बैठक विरोधी दल के अधिकृत नेता की अध्यक्षता में होती है। इन बैठकों में किन विषयों पर चर्चा होगी, ये अध्यक्ष तय करता है। महत्वपूर्ण मुद्दों पर सदन में हम कमजोर न पड़ें और हमारा प्रतिस्पर्धी अधिक शक्तिशाली न बनने पाए, इस प्रकार की रणनीति बनाई जाती है। ये हुई इंग्लैंड की बात। महाराष्ट्र या देश के वर्तमान विरोधी दल की स्थिति को देखते हुए ‘शैडो’ वैâबिनेट का प्रयोग मतलब ‘ये परछाइयों का खेल’ साबित न होने पाए। लोकसभा में अधिकृत विरोधी दल नेता ही नहीं हैं और राज्य में विरोधी दल बादशाह की भूमिका से बाहर निकलने को तैयार नहीं है। ‘शैडो’ की घोषणा करते समय उनके प्रमुख नेता को छाया मंत्रिमंडल के संदर्भ में बोलना पड़ा कि, ‘संभलकर काम करें, ब्लैकमेल आदि न करें।’ ये ठीक ही हुआ। अनुभव इंसान को समझदार बना देता है। ये ऐसे समय काम आता है। ‘शैडो’ मंत्रिमंडल बनाने के लिए उतनी संख्या में विधायक या सांसद चुनकर लाया जाना चाहिए लेकिन ऐसा दिख नहीं रहा। ‘शैडो’ वालों का मुख्यमंत्री पद खाली ही है। शैडो मुख्यमंत्री अधिकृत रूप से विरोधी दल का नेता होता है। इस शैडो मंत्रिमंडल को शपथ दिलाने के लिए एकाध ‘शैडो’ राज्यपाल की भी नियुक्ति कर देते तो ठीक था। इससे ‘परछाइयों का खेल’ अधिक मजेदार हो जाता। महाराष्ट्र में मजाक बाकी है, राजनीति में मजाक का तोड़ नहीं।