ये हिरासत अच्छी है…

आईएनएक्स मीडिया मामले में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम हिरासत में हैं, सीबीआई की हिरासत में। हो सकता है कि वे वहां से बाहर निकलें तो दरवाजे पर ही उनकी भेंट ईडीवालों से हो जाए। हाल-चाल लिया जाए और दोबारा उन्हें हिरासत के हवाले कर दिया जाए। फिर शायद अपने ‘लंबे’ कारनामों के लिए उन्हें लंबा वक्त वहीं गुजारना पड़े। सलाखों के पीछे। चुपचाप, बिल्कुल चुपचाप। मुंह बंद करके।
इस समय सुर्खियों में पी. चिदंबरम के भ्रष्टाचार का मुद्दा है, अचानक उनके प्रति सख्त हुई कार्यवाहियों का मुद्दा है। समाचार चैनलों से सोशल मीडिया तक बस यही मंथन चल रहा है। चिदंबरम पर लगे तमाम भ्रष्टाचार के आरोपों का पोस्टमार्टम हो रहा है। कुल जमा तर्क यही कि चिदंबरम को हिरासत में लेने की इतनी जल्दबाजी क्या थी? और वितर्क यह भी कि उन्हें अभी और वक्त दिया जाना चाहिए था या नहीं? चार दिनों से इसी पर बहस जारी है। वैसी ही बहस जैसी अनुच्छेद ३७०, जम्मू-कश्मीर पुर्नगठन और पाकिस्तानी चालबाजियों को लेकर जारी है। संजोग देखिए, गत १५ दिनों की उस बहस में भी एक फोकस चिदंबरम ही थे और आज तो अहम किरदार ही वे ही हैं। गत ५ अगस्त को जब राज्यसभा के पटल पर जम्मू-कश्मीर का प्रस्ताव आया था तो उसका सबसे मुखर विरोध चिदंबरम की ओर से ही हुआ था। लोकतंत्र में वैचारिक विरोध होना भी चाहिए, यह लोकतंत्र की मजबूती का कारक है पर विरोध इतना गंदा और अंधा नहीं हो कि वो देश विरोधी बन जाए। यह आम समझ की बात है परंतु दुर्भाग्य से कांग्रेस के थिंक टैंक को यह समझ नहीं आया। तभी तो सदन से लेकर सड़क तक चिदंबरम ने देश विरोधी राह पकड़ी। उनके हिंदुओं को लेकर सड़े हुए विचार, ओछी सोच और सियासत का गंदा गणित हर बार पाकिस्तान के लिए हथियार बना। जनता तभी से उनके मुंह पर लगाम चाहती थी। देश की अस्मिता, आदर्श और आवश्यकताओं को दरकिनार करके वे लगातार सरकार को संविधान की हत्यारी, सांप्रदायिक और शरारती साबित करने में जी-जान से लगे थे। वे निज हित में इतने अंधे हो गए थे कि अपनी जहरीली जुबान से हिंदुस्थान के हितों को ही डंसते रहे। वे देश को हर मोर्चे पर नीचा दिखाने का द्रोह करते रहे। वे अपने स्वार्थ में इतना आगे बढ़ गए कि तुष्टिकरण वाली उनकी सियासी नीति देश की अखंडता के लिए खतरा बनने लगी थी। कभी कश्मीर पर सरकार के पैâसले को उन्होंने सार्वजनिक मंच से हिंदू-मुसलमानों से जोड़ा तो कभी फिलिस्तीन के हालातों से। चिदंबरम के ऐसे ही बयानों के सहारे पाकिस्तान को लगातार अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिंदुस्थान को हतोत्साहित करने का मौका मिल रहा था। वो इसी के सहारे कश्मीर मसले पर दुनिया भर में भ्रम फैला रहा था। कुटनीति के मामले में भी पाकिस्तान जैसे ‘कुपोषित’ देश को चिदंबरम लगातार टॉनिक दे रहे थे। इसीलिए यहां हिंदुस्थान में चिदंबरम की भर्त्सना होती तो वहां पाकिस्तान में जमकर प्रशंसा। चिदंबरम का कहा एक शब्द दशकों के हमारे कूटनीतिक प्रयासों को मिट्टी में मिला रहा था। इसलिए देश की जनता उनके मुंह पर ताला देखना चाहती थी। लिहाजा देशद्रोह के मामले में न सही, भ्रष्टाचार के मामले में ही सही, उन्हें हिरासत में लेना तो जरूरी था। उनके देश विरोधी बयानों पर अंकुश जरूरी था। तभी तो आज देश बोल रहा है ये हिरासत अच्छी है…!