" /> योगी फॉर्मूले पर टिके रहने का सवाल!

योगी फॉर्मूले पर टिके रहने का सवाल!

नागरिकता संशोधन कानून को लेकर दिल्ली में हुए दंगों के दौरान उत्तर प्रदेश में हालात पर काबू पाने के जिस कामयाब योगी फॉर्मूले की चर्चा जोर-शोर से थी, फिलहाल उसके इम्तिहान का वक्त आ गया है। भारतीय जनता पार्टी २०२२ के विधानसभा चुनाव के पहले राम मंदिर का पहला चरण शुरू करने के साथ ही विगत दिनों के हालात को मुफीद मानते हुए आगे बढ़ने की तैयारी में थी लेकिन अदालती आदेशों में उसे पसोपेश में डाल दिया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के बाद उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के आला अफसरों की एक बैठक में गंभीर मंथन के बाद भी नए कदम पर कोई निर्णय नहीं हो सका है। हालांकि इस बात की चर्चा थी कि सरकार हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करेगी लेकिन गृह विभाग के मुखिया अवनीश अवस्थी ने फिलहाल इससे इंकार किया है। वैसे अभी भी लखनऊ का प्रशासन तय नहीं कर सका है कि दंगों के आरोपी जिन लोगों के पोस्टर राजधानी की सड़कों पर चस्पां किए गए थे उसे हटाया जाए या नहीं।
राजधानी लखनऊ में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ प्रदर्शन करनेवालों के होर्डिंग लगाए जाने के मामले में उच्च न्यायालय के निर्णय को उच्चतम न्यायालय में चुनौती देने की तैयारियों की अटकलों के बीच उत्तर प्रदेश सरकार का कहना है कि उसने अभी इस बारे में कोई निर्णय नहीं लिया है। अवनीश अवस्थी कहते हैं कि होर्डिंग मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पैâसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती देने को लेकर अभी कुछ भी तय नहीं किया गया है।
शासन का कहना है कि अभी तय होना है कि इस मामले में क्या करना है? अपर मुख्य सचिव का कहना है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश के बाद क्या सोमवार रात मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस मामले में वरिष्ठ अधिकारियों के साथ कोई ऐसी बैठक नहीं की है, जिसकी चर्चा है। दरअसल मीडिया रिपोर्ट में कहा जा रहा है कि योगी सरकार कथित दंगाइयों के होर्डिंग हटाने के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पैâसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती देगी।
गत १९ दिसंबर को राजधानी लखनऊ में नागरिकता संशोधन कानून यानी सीएए के खिलाफ हुए हिंसक प्रदर्शन के मामले में पुलिस ने बड़ी संख्या में लोगों को दंगाई करार देते हुए उन्हें गिरफ्तार किया था और उनमें से ५७ के खिलाफ वसूली नोटिस जारी किए थे। गत गुरुवार को जिला प्रशासन ने नगर के हजरतगंज समेत चार थाना क्षेत्रों में १०० प्रमुख चौराहों तथा स्थानों पर होर्डिंग लगवाई थी, जिसमें इन आरोपियों की बड़ी तस्वीरें, पता और वल्दियत जैसी निजी जानकारियां भी छपवाई गई थीं। इनमें से अनेक के मामले अभी अदालत में लंबित हैं।
दो दिन पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने लखनऊ जिला प्रशासन को आगामी १६ मार्च तक ये सभी होर्डिंग तथा पोस्टर हटाने के आदेश दिए। उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति गोविंद माथुर और न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा की पीठ ने जिला प्रशासन के इस कदम को निहायत नाइंसाफी भरा करार देते हुए इसे व्यक्तिगत आजादी का खुला अतिक्रमण माना था। हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा था कि कथित सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों के पोस्टर लगाने की सरकार की कार्यवाही बेहद अन्यायपूर्ण है। यह संबंधित लोगों की आजादी का हनन है। ऐसा कोई कार्य नहीं किया जाना चाहिए, जिससे किसी के दिल को ठेस पहुंचे। पोस्टर लगाना सरकार के लिए भी अपमान की बात है और नागरिक के लिए भी। किस कानून के तहत लखनऊ की सड़कों पर इस तरह के पोस्टर लगाए गए? सार्वजनिक स्थान पर संबंधित व्यक्ति की इजाजत के बिना उसका फोटो या पोस्टर लगाना गलत है। यह निजता के अधिकार का उल्लंघन है।
तानाशाही से नहीं चलेगा
श्रवण राम दारापुरी पूर्व आईपीएस दारापुरी के मुताबिक पैâसले से साफ हो गया कि देश में योगी सरकार की अराजकता का नहीं, कानून और संविधान का राज चलेगा। लोकतंत्र की जीत हुई, तानाशाही की हार हुई है। पोस्टर लगने के बाद हम लोगों की जान को खतरा है। अगर हमारी जान को कोई भी हानि होती है तो इसकी जिम्मेदार उत्तर प्रदेश सरकार होगी। कांग्रेस नेता व एक्ट्रेस सदफ जफर का कहना है कि ये संविधान और कानून की जीत है। कोर्ट का साफ संदेश है कि राज्य हो देश, यह तानाशाही से नहीं चलेंगे। देश संविधान और कानून से चलेगा। यह ऐतिहासिक पैâसला एक नजीर है कि किसी की आवाज को दबाया नहीं जा सकता है। होर्डिंग लगने के बाद मुझे धमकी मिल रही है। हमारी निजता का हनन किया गया।
समाजसेवी दीपक मिश्र कबीर ने कहा कि सरकार ने जो किया था, वह सरासर गलत है। इसकी पुष्टि हाईकोर्ट ने भी अपने पैâसले में कर दी है। कोर्ट का पैâसला देश में संविधान और कानून का राज साबित करता है। रिहाई मंच के प्रमुख मोहम्मद शोएब ने कहा, ‘सरकार ने सार्वजनिक तौर पर हमारी निजता का हनन किया है। इसके बाद अगर किसी की जानमाल को खतरा होगा, इसकी जिम्मेदारी सरकार की होगी।’ रिहाई मंच के मुस्लिम संगठन पर पीएफआई से जुड़े होने का आरोप है।
रिकवरी का नोटिस
१९ दिसंबर, २०१९ को जुमे की नमाज के बाद लखनऊ के चार थाना क्षेत्रों में हिंसा पैâली थी। ठाकुरगंज, हजरतगंज, वैâसरबाग और हसनगंज में तोड़फोड़ करनेवालों ने कई गाड़ियां भी जला दी थीं। राज्य सरकार ने नुकसान की भरपाई प्रदर्शनकारियों से कराने की बात कही थी। इसके बाद पुलिस ने फोटो, वीडियो के आधार पर १५० से ज्यादा लोगों को नोटिस भेजे। जांच के बाद प्रशासन ने ५७ लोगों को सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का दोषी माना। उनसे ८८ लाख ६२ हजार ५३७ रुपए के नुकसान की भरपाई कराने की बात कही गई। लखनऊ के डीएम अभिषेक प्रकाश ने कहा था कि अगर तय वक्त पर इन लोगों ने जुर्माना नहीं भराए तो इनकी संपत्ति कुर्क की जाएगी।
मॉब लिंचिंग का खतरा
जिन लोगों की तस्वीरें होर्डिंग में लगाई गई हैं, उनमें पूर्व आईपीएस एसआर दारापुरी, एक्टिविस्ट सदफ जफर और दीपक कबीर भी शामिल हैं। कबीर ने कहा कि सरकार डर का माहौल बना रही है। होर्डिंग में शामिल लोगों की कहीं भी मॉब लिंचिंग हो सकती है। दिल्ली हिंसा के बाद माहौल सुरक्षित नहीं रह गया है। सरकार सबको खतरे में डालने का काम कर रही है।