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रंगों में भीगेंगे देवता

चैत्र मास की कृष्ण पक्ष पंचमी तिथि को रंग पंचमी पर्व मनाया जाता है। यह होली का ही एक रूप है। वैसे तो महाराष्ट्र में होली को ही रंग पंचमी कहा जाता है लेकिन रंग पंचमी होली का ही समापन रूप है जो देश के कई क्षेत्रों में चैत्र मास की कृष्ण पंचमी के दिन बहुत ही उल्लास और हर्ष के साथ मनाया जाता है। कहते हैं कि इस दिन श्री कृष्ण ने राधा पर रंग डाला था। इसी की याद में रंग पंचमी मनाई जाती है। यह त्यौहार देवताओं को समर्पित है। यह सात्विक पूजा आराधना का दिन होता है। मान्यता है कि कुंडली के बड़े से बड़े दोष को इस दिन पूजा आराधना से ठीक हो जाते हैं। धन लाभ पाने और गृह कलेश दूर करने के लिए भी यह रंग पंचमी मनाई जाती है। इस दिन देवी लक्ष्मी की विशेष पूजा होती है। रंगपंचमी अनिष्टकारी शक्तियों पर विजय प्राप्ति का उत्सव भी है। रज-तम के विघटन से दुष्टकारी या कहें पापकारी शक्तियों का उच्चाटन भी इस दिन होता है।
दरअसल होली का जश्न कई दिनों तक चलता है और इसकी तैयारियां होली के दिन यानी फाल्गुन पूर्णिमा से लगभग एक महीने पहले शुरू हो जाती है। फाल्गुन पूर्णिमा को होलिका दहन के पश्चात अगले दिन सभी लोग उत्साह में भरकर रंगों से खेलते हैं। रंगों का यह उत्सव चैत्र मास की कृष्ण प्रतिपदा से लेकर पंचमी तक चलता है। इसलिए इसे रंग पंचमी कहा जाता है। रंग पंचमी के दिन जो भी रंग इस्तेमाल किए जाते हैं, जिन्हें एक दूसरे पर लगाया जाता है, हवा में उड़ाया जाता है उससे विभिन्न रंगों की ओर देवता आकर्षित होते हैं। इससे ब्रह्मांड में सकारात्मक तंरगों का संयोग बनता है व रंग कणों में संबंधित देवताओं के स्पर्श की अनुभूति होती है। पुराणों में वर्णन मिलता है कि इस दिन देवता गीले रंगों की होली खेलते हैं और एक दूजे को रंगों से भिगोते हैं। असल में रंग पंचमी के जरिए एक प्रकार से तेजोमय सगुण स्वरूप का रंगों के माध्यम से आह्वान भी किया जाता है।