रतनपुर का सिद्धशक्ति पीठ

भारत में देवी माता के अनेक सिद्ध मंदिर हैं, जिनमें माता के ५१ शक्तिपीठ सदा से ही श्रद्धालुओं के लिए विशेष धार्मिक महत्व के रहे हैं। इन्हीं में से एक है छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में रतनपुर स्थित मां महामाया देवी मंदिर। रतनपुर का महामाया मंदिर इन्हीं शक्तिपीठों में से एक है। शक्ति पीठों की स्थापना से संबंधित एक पौराणिक कथा प्रसिद्ध है। शक्तिपीठ उन पूजा स्थलों को कहते हैं, जहां सती के अंग गिरे थे। सती की मृत्यु से व्यथित भगवान शिव उनके मृत शरीर को लेकर तांडव करते हुए ब्रह्मांड में भटकते रहे। इस समय माता के अंग जहां-जहां गिरे, वहीं शक्तिपीठ बन गए। इन्हीं स्थानों को शक्तिपीठ रूप में मान्यता मिली। महामाया मंदिर में माता का स्कंध गिरा था। इसीलिए इस स्थल को माता के ५१ शक्तिपीठों में शामिल किया गया। बिलासपुर-कोरबा मुख्य मार्ग पर २५ कि.मी. पर स्थित आदिशक्ति महामाया देवी की पवित्र पौराणिक नगरी रतनपुर का इतिहास प्राचीन एवं गौरवशाली हैं।
पौराणिक ग्रंथ महाभारत, जैमिनी पुराण आदि में इसे राजधानी होने का गौरव प्राप्त है। त्रिपुरी के कलचुरियों ने रतनपुर को अपनी राजधानी बनाकर दीर्घकाल तक छत्तीसगढ़ में शासन किया। इसे चतुर्युगी नगरी भी कहा जाता है जिसका तात्पर्य है कि इसका अस्तित्व चारों युगों में विद्यमान रहा है। राजा रत्नदेव प्रथम ने मणिपुर नामक गांव को रतनपुर नाम देकर अपनी राजधानी बनाया।
मंदिर का निर्माण- लगभग एक हजार वर्ष प्राचीन महामाया देवी का दिव्य एवं भव्य मंदिर दर्शनीय है। इसका निर्माण राजा रत्नदेव प्रथम द्वारा ११वीं शताब्दी में कराया गया था। १०४५. ई में राजा रत्नदेव प्रथम, मणिपुर नामक गांव में शिकार के बाद जहां रात्रि विश्राम एक वट वृक्ष पर किया, अर्धरात्रि में जब राजा की आंख खुली तब उन्होंने वट वृक्ष के नीचे अलौकिक प्रकाश देखा, यह देखकर चमत्कृत हो गए कि वहां आदिशक्ति श्री महामाया देवी की सभा लगी हुई है। इतना देखकर वे अपनी चेतना खो बैठे। सुबह होने पर वे अपनी राजधानी तुम्मान खोल लौट गए और रतनपुर को अपनी राजधानी बनाने का निर्णय लिया तथा १०५० ई में श्री महामाया देवी का भव्य मंदिर निर्मित कराया। मंदिर के भीतर महाकाली, महासरस्वती और महालक्ष्मी की कलात्मक प्रतिमाएं विराजमान हैं।
मान्यता है कि इस मंदिर में यंत्र-मंत्र का केंद्र रहा होगा तथा रतनपुर में देवी सती का दाहिना स्कंध गिरा था भगवान शिव ने स्वयं आविर्भूत होकर उसे कौमारी शक्ति पीठ का नाम दिया था। जिसके कारण मां के दर्शन से कुंवारी कन्याओं को सौभाग्य की प्राप्ति होती हैं। यह जागृत पीठ है, जहां भक्तों की समस्त कामनाएं पूर्ण होती हैं। नवरात्रि पर्व पर यहां की छटा दर्शनीय होती है। इस अवसर पर श्रद्धालुओं द्वारा यहां हजारों की संख्या में मनोकामना ज्योति कलश प्रज्वलित किए जाते हैं।
रतनपुर में स्थित अन्य प्रसिद्ध देवस्थली-
श्री काल भैरवी मंदिर- यहां पर काल भैरव की करीब ९ फुट ऊंची भव्य प्रतिमा विराजमान है। कौमारी शक्ति पीठ होने के कारण कालांतर में तंत्र साधना का केंद्र था। बाबा ज्ञानगिरी ने इस मंदिर का निर्माण कराया था।
श्री खंडोबा मंदिर- यहां शिव तथा भवानी की अश्वारोही प्रतिमा विराजमान है। इस मंदिर का निर्माण मराठा नरेश बिंबाजी भोसले की रानी ने अपने भतीजे खांडो जी के स्मृति में बनवाया था। किंवदंती है कि मणि मल्ल नामक दैत्यों के संहार के लिए भगवान शिव ने मार्तण्ड भैरव का रूप बनाकर सहयाद्रि पर्वत पर उनका संहार किया था। खंडोबा मंदिर के पार्श्व में प्राचीन एवं विशाल सरोवर दुलहरा तालाब स्थित है।
श्री महालक्ष्मी देवी मंदिर- कोटा मुख्य मार्ग पर इकबीरा पहाड़ी पर श्री महालक्ष्मी देवी का ऐतिहासिक मंदिर स्थित है। इसका निर्माण राजा रत्नदेव तृतीय के प्रधानमंत्री गंगाधर ने करवाया था। इसका स्थानीय नाम लखनीदेवी मंदिर भी है। यहां नवरात्रि के पर्व पर मंगल जवारा बोया जाता है तथा धार्मिक
अनुष्ठान होते हैं।