राजनीति में अटका मुसलमान

मुस्लिम समाज पर जब भी चर्चा होती है तो बात धार्मिक कट्टरता, बेरोजगारी और पिछड़ेपन पर आकर थम जाती है। देश में बेरोजगारी एक बड़ी समस्या है लेकिन मुसलमानों की हालत सबसे खराब है, इससे किसी को इंकार नहीं है लेकिन मुस्लिम समाज की तकलीफ यही है कि वह अपनी हर बदहाली के लिए सरकार और धार्मिक पूर्वाग्रहों को जिम्मेदार मानते हुए जीता है। हालांकि कुछ मुस्लिम विचारक मुसलमानों में शिक्षा की कमी को इसका जिम्मेदार मानते हैं। जिस धर्म के अनुयायी अपने सबसे पवित्र धर्मग्रंथ कुरआन की पहली नाजिल हुई आयत ‘इकरा’ के अर्थ ‘पढ़’ के मर्म को नहीं समझ सके उनकी बदहाली पर सिवाय रोने को और किया भी क्या जा सकता है?
मुस्लिम समाज के बीच शिक्षा प्रणाली को लेकर भी अक्सर बहस देखने को मिलती है। शिक्षा को लेकर दो तरह के भेद हुए। एक शिक्षा जिसे सेक्युलर कहा गया और दूसरी जिसे आधुनिक शिक्षा ठहराया गया। ‘मदरसा-शिक्षा’ के नाम पर जितनी सियासत हुई है वह भी किसी से छिपी नहीं है। मदरसा शिक्षा केंद्रों में सरकार के हस्तक्षेप से मुसलमानों को हमेशा शिकायत रही और ऐसे किसी भी प्रयास को पूरी तरह से रोकने की लगातार कोशिश की जाती रही है। मुस्लिम समाज को यह समझा दिया गया है कि दरअसल मदरसा ‘दीन’ को बचाए रखने का महत्वपूर्ण स्तंभ है। मीडिया और कुछ मखसूस तबके ने जहां इसे ‘आतंकवाद का अड्डा’ घोषित कर रखा है वहीं ‘माइनॉरिटी पॉलिटिक्स’ के नाम पर अपनी दुकान चमकानेवाले नेता इसकी स्वायत्ता बचाकर ‘सेक्युलर’ होने का ढिंढोरा पीटने से भी पीछे नहीं रहे हैं। मुस्लिम समाज अनावश्यक रूप से ‘कम्युनल आइडेंटिटी पॉलिटिक्स’ की अनसुलझी राजनीति में उलझकर रह गया। ऐसे में नुकसान केवल मुस्लिम समाज का ही हुआ है। यह बात मुसलमान अब भी समझने को तैयार नहीं हैं।
मुस्लिम समाज का बहुत बड़ा तबका अब भी धारा के विपरीत बहता है। सही मायने में देखा जाए तो मुसलमानों में आधुनिक शिक्षा की कमी इसका कारण है और यह मदरसे की पारंपरिक प्रणाली में बदलाव से मुमकिन हो सकता है। आधुनिक युग गलाकाट प्रतिस्पर्धा का है और चिंता इसी बात की है कि मदरसों में शिक्षा प्राप्त करनेवाले कहीं पीछे न रह जाएं। मुस्लिम समाज के पास देश भर में लाखों छोटे-बड़े मदरसों के रूप में इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद है। इनका दीनी तालीम के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा के लिए इस्तेमाल कर तालीमी पिछड़ेपन को बड़ी आसानी से दूर किया जा सकता है। हां, उसके लिए मदरसों की दीनी तालीम से अगर छेड़छाड़ न हो तो मदरसे इस फॉर्मूले पर एकजुट हो सकते हैं लेकिन सवाल यह है कि इस दिशा में ईमानदार पहल करे तो कौन?
ऐसा नहीं है कि मुस्लिम समाज इस बात से अनभिज्ञ है या वह नहीं चाहता कि उसका समाज भी पिछड़ेपन से निकलकर तरक्की की राह पर दौड़े। वर्षों से मदरसा शिक्षा प्रणाली पर लंबी बहस जारी है कि इसे कैसे आधुनिक बनाया जाए और इसे विज्ञान और प्रौद्योगिकी से जोड़ा जाए। मुस्लिम समाज इस बात को समझता है कि आधुनिक शिक्षा के बिना मदरसे से पढ़कर आनेवाले मुस्लिम बच्चे मॉडर्न स्कूल से आधुनिक शिक्षा हासिल किए हुए छात्रों के मुकाबले विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कहीं नहीं टिकते। वे उनसे प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते हैं और आखिर वे इस दौड़ में कहीं पीछे छूट जाते हैं। वैसे मुस्लिम विचारकों का एक तर्क यह भी है कि स्कूल जानेवाली उम्र के मुस्लिम बच्चों में से केवल चार फीसदी ही मदरसों में शिक्षा प्राप्त करते हैं।
मुस्लिम समाज में शिक्षा और बेरोजगारी की समस्या एक दूसरे से जुड़ी हुई है। मुसलमानों में बेरोजगारी इसलिए है क्योंकि उनमें शिक्षा की कमी है और शिक्षा इसलिए नहीं है क्योंकि वे गरीबी का शिकार हैं और इस गरीबी की वजह भी बेरोजगारी है। अगर मुस्लिम समाज का शिक्षा पर विश्लेषणात्मक जायजा लिया जाए तो यही साबित होता है कि उनकी मुख्य समस्या गरीबी है और इसका निराकरण किए बिना उन्हें मुख्यधारा में शामिल नहीं किया जा सकता। धार्मिक और सांस्कृतिक आधार पर एकरूप समझा जानेवाला मुस्लिम समाज आज मुख्यधारा में न के बराबर है।
मुस्लिम समाज की लीडरशिप भी सवालों के घेरे में है। इसमें धार्मिक नेताओं की लीडरशिप भी शामिल है। जरूरी है कि सामाजिक प्रगति के लिए यह लीडरशिप समुदाय के सारे वर्गों से निकल कर आए। मुस्लिम समाज का एक बड़ा वर्ग धार्मिक लीडरशिप पर ज्यादा यकीन रखता है। समाजसुधार या तरक्की की बात करनेवाले आधुनिक और दूरगामी सोच के नेताओं को अक्सर समाज नकार देता है, उन्हें समझना होगा कि वर्तमान परिस्थितियों में मुस्लिम धार्मिक गुरु रोजगारोन्मुख अथवा आधुनिक शिक्षायुक्त लीडरशिप नहीं दे सकते हैं। समावेशी समाज में फिरकों में विभाजित धार्मिक लीडरशिप आखिर कैसे कारगर हो सकती है? मुस्लिम समाज दूसरे फिरके के रहनुमा को अपना कायद मानने को तैयार हो नहीं सकता। ऐसे में आवश्यक है कि अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, कानून, समाजशास्त्र इत्यादि विषयों की गहन समझ रखनेवाला नेतृत्व आगे आकर मुस्लिम समाज को मुख्यधारा के मुद्दों पर जागृत करे। न केवल जागृत करे बल्कि उन्हें एकजुट भी करे। काम कठिन जरूर है मगर बिना इसे किए समाज का कल्याण भी तो मुमकिन नजर नहीं आता।
मुस्लिम समाज को एक और काम करना होगा। राजनीति में धर्म के हस्तक्षेप को पूरी तरह से रोकना होगा, जो बेहद जरूरी है। धर्म को राजनीति के साथ मिलाना हमारे जैसे आधुनिक और विविधतापूर्ण देश के लिए बेहद घातक साबित हुआ है। देश में ध्रुवीकरण का जिम्मेदार इसी रणनीति को माना जाना चाहिए। यह एक ऐसा जहर है, जिसने नई नस्लों की रगों में अविश्वास और दूरियां भरने का काम किया है। धर्म को राजनीति के साथ मिश्रित करने का परिणाम अगर देखना हो तो अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान में देखा जा सकता है। पाकि‍स्‍तान का सार्वजनि‍क जीवन, राजनीति, संस्कृति और समाज धर्म में इस कदर उलझ कर रहा गया है कि वहां राजनीति‍ की कमान हाफिज सईद जैसे जिहादी तत्वों के हाथों में तेजी से सरकती नजर आ रही है। हो सकता है इस बात से बहुत बड़ा मतभेद हो लेकिन सार्थक बहस के दरवाजे जड़ता की हद तक बंद तो नहीं किए जा सकते। समाज के हित में लाभकारी मार्ग निकालना अब मुस्लिम समाज की प्राथमिकता होनी चाहिए।
देशभर के मुसलमानों की समस्याओं पर गौर करें तो मिलेगा कि उनकी हर पीढ़ी शून्य से अपना सफर शुरू करती है। हर पीढ़ी एक ही तरह का संघर्ष करती हुई यही संघर्ष अगली पीढ़ी को सौंप देती है। इस बात को भी समझना होगा कि मुस्लिम समाज में क्षमता की कमी बिलकुल नहीं है। उसकी अपनी क्षमता, उसका अपना कौशल, उसकी अपनी शिक्षा केवल उसकी अपनी बनकर रह जाती है अगर उसका उपयोग सही मार्गदर्शन और सही दिशा में न हो। मुस्लिम समाज अपनी देशभक्ति का परचम थामे इसी संघर्ष में रहता है कि कैसे उसे देशद्रोही न समझा जाए। असमानता, असुरक्षा की भावना तथा आर्थिक पिछड़ापन उसकी कमजोरी बन गया है। किसी एक मोर्चे पर फतह मिलती है तो दूसरा मोर्चा उसे फिर गर्त में ले जाता है। मुस्लिम समाज इस मकड़जाल से निकलना चाहता है और उसे निकलना होगा।
जरूरत इस बात की है कि खोखली अल्पसंख्यक राजनीति से ऊपर उठकर वर्तमान समय और स्थिति को देखते हुए समस्या से समाधान के बीच पारस्परिक तारतम्यता बनाई जाए। जरूरत है अंतरनिहित सिद्धांतों और लोकहित की पद्धतियों को अपनानेवाली नीतियों को बढ़ावा दिया जाए। मुस्लिम समाज को राजनीति चमकाने के लिए तुष्टीकरण और भेदभाव की राजनीति करनेवालों से दूरी बनानी होगी, ऐसी नकारात्मक शक्तियों से बाहर निकलकर ही मुस्लिम समाज का सामाजिक और शैक्षणिक आधार पर पिछड़ापन दूर किया जा सकता है।