राजा लोकप्रिय जनता हड़ताल पर

सरकार की तिजोरी में पैसा नहीं है इसलिए सरकारी कर्मचारियों की मांगें स्वीकार नहीं की जा सकतीं, इस पर हमारा विश्वास नहीं। तिजोरी में भले ही पैसा न हो पर सरकार चलानेवालों की जेब में पैसा है और यह पैसा हर चुनाव में लहर की तरह मचलते हुई बाहर निकलता रहता है। जलगांव, सांगली महानगरपालिका चुनाव में एक बार फिर ऐसा दिखाई दिया। सरकारी कामकाज बंद है क्योंकि सरकारी कर्मचारी हड़ताल पर गए हैं। सरकार चलानेवालों के पास विज्ञापनबाजी करने के लिए हजारों करोड़ रुपए हैं। चुनाव लड़ने के लिए और सत्ता बचाने के लिए बेहिसाब, गैरकानूनी व्हाइट मनी है परंतु सरकार की तिजोरी खाली है। सातवां वेतन आयोग तत्काल लागू किया जाए, ऐसी कर्मचारियों की मांग है। चुनाव से पहले भाजपा ने सातवां वेतन आयोग लागू करने का आश्वासन दिया था और वह पूरा नहीं हुआ इसीलिए सरकारी कर्मचारी हड़ताल पर गए हैं। मुख्यमंत्री लोकप्रिय हैं इसीलिए वे एक के बाद एक चुनाव जीत रहे हैं। राज्य में इतना असंतोष रहते हुए भी भाजपा ही जीत रही है, ऐसा इन लोगों का कहना है। मगर राज्य में किसानों से लेकर सरकारी कर्मचारी तक सभी विरोध में रहते हुए ये लोग कैसे जीत रहे हैं? यह भी संदेह का विषय है। सरकारी कर्मचारी जब हड़ताल पर जाता है, उस समय राज्य ठप हो जाता है, ऐसा इस बार भी हुआ है। मंत्रालय और सरकारी कार्यालय वीरान पड़े हैं। सरकारी अस्पतालों में सेवाएं ठंडी पड़ गई हैं और गरीबों की दुर्दशा जारी है। इसलिए महाराष्ट्र के लोकप्रिय तथा सदैव चुनाव जीतनेवाले मुख्यमंत्री को हड़ताल खत्म करने के लिए आगे आना होगा। किसान और सरकारी कर्मचारियों की समस्याओं को सुलझाना मतलब सांगली-जलगांव के चुनाव साम-दाम-दंड-भेद से जीतने जितना आसान नहीं है। मुख्यमंत्री तथा उनकी सरकार इतनी लोकप्रिय होती तो किसान और कर्मचारी हड़ताल पर नहीं गए होते और मराठा समाज सड़क पर उतरकर हिंसक नहीं हुआ होता। कर्मचारियों का सवाल हल करने के लिए सरकार ने एक समिति का गठन किया है। यह समय व्यतीत करने जैसा है और इस तरह का टाइमपास देश में और महाराष्ट्र में ४ वर्षों से जारी है। चुनाव से पहले मुंह फटने तक आश्वासन देना तथा सत्ता में आते ही उससे दूर भागना। ऐसा किसानों के साथ हुआ, उसी तरह सरकारी कर्मचारियों के बारे में भी होता दिखाई दे रहा है। सरकारी कर्मचारियों की मांगें स्पष्ट हैं। उन्हें पांच दिन का सप्ताह चाहिए। पुरानी निवृत्ति वेतन योजना में परिवर्तन चाहिए और सेवानिवृत्ति की उम्र ६० वर्ष की जाए, ऐसी उनकी मांग है। विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा ने ये सभी मांगें आंख बंद कर मानी थीं। मगर अब सत्ता में आने के बाद वे इस पर बोलने को तैयार नहीं हैं। इस जुमलेबाजी के खिलाफ पहले किसानों ने बगावत की और अब सरकारी कर्मचारियों ने बगावत की है। आंगनवाड़ी सेविकाओं ने आंदोलन किया, उस वक्त उन पर कठोर कार्रवाई का डंडा चलाया गया और ‘मेस्मा’ जैसा फालतू कानून उन पर लादा गया। फिर उसी तरीके से हड़ताल पर गए सरकारी कर्मचारियों को देशद्रोही ठहराकर जेल में डालनेवाले होंगे तो अनर्थ हुए बिना नहीं रहेगा। न्याय और अधिकार की लड़ाई के रूप में जनता की मांग की ओर देखना होगा। आपको सत्ता में लानेवाले यही लोग हैं। उन्होंने ही अब उद्रेक किया है। यह लोकप्रियता का लक्षण है क्या? प्रजा रोजी-रोटी के लिए हड़ताल पर है। राजा कह रहा है, मैं लोकप्रिय हूं!