" /> राज्यपाल बनाम सरकार, चक्रम तूफान!

राज्यपाल बनाम सरकार, चक्रम तूफान!

बोलने जैसी कोई बात न हो तो अपना मुंह बंद रखो, एक पुलिस अधिकारी ने डोनाल्ड ट्रंप को खरी-खरी सुनाई है। संकट के समय में सत्ताधीशों को कम-से-कम बोलना चाहिए। अधिकारी ने ट्रंप से कहा कि संकट के समय में वर्चस्व की लड़ाई नहीं लड़ी जाती, बल्कि लोगों का दिल जीता जाता है। महाराष्ट्र में इस समय अंतिम परीक्षा पर रार मची है। इसलिए एक दिन नाराज छात्र, उनके अभिभावक सड़कों पर उतरेंगे और रार मचाकर एक पीढ़ी बर्बाद करनेवालों का नेतृत्व करनेवालों से यही कहा जाएगा, ‘तुम अपनी राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई में हमें क्यों घसीटते हो? बोलने जैसा कुछ भी न हो और करने जैसा कोई काम न हो तो अपना मुंह बंद रखो।’ कोरोना संकट के कारण महाराष्ट्र सहित देशभर में अभूतपूर्व परिस्थिति बन गई है। इसमें लाखों विद्यार्थी और पूरा शिक्षा क्षेत्र पिस रहा है। एक पीढ़ी का भविष्य अधर में लटका हुआ है। क्या इन बच्चों को कोरोना रूपी मगरमच्छ के जबड़े में धकेलना चाहिए या परीक्षा की लटकती तलवार को हटाकर सर्वसमावेशक निर्णय लेना चाहिए? मुख्यमंत्री ठाकरे द्वारा ‘सरकार’ के रूप में निर्णय लिया गया कि डिग्री के अंतिम वर्ष की परीक्षा न लेते हुए छात्रों को पिछले सत्र के अंकों का मूल्यांकन करके औसत अंक दिए जाएंगे। इस निर्णय का छात्रों, अभिभावकों और शिक्षा विशेषज्ञों ने स्वागत किया, लेकिन हुआ ऐसा कि विपक्ष, जो हर मामले में इसका विरोध करने के लिए दृढ़ था, तुरंत राजभवन पहुंच गया और परीक्षा रद्द करने के निर्णय पर आपत्ति जताई। विपक्ष से पत्र प्राप्त होते ही राज्यपाल ने मुख्यमंत्री के निर्णय का विरोध करते हुए एक पत्र लिखा और मीडिया में इसकी घोषणा भी की। राज्यपाल महोदय का कहना है कि परीक्षाएं विश्वविद्यालय के नियमों के अनुसार होनी चाहिए। राज्यपाल ने स्वयं कहा कि परीक्षा आयोजित की जानी चाहिए और परीक्षा होगी। वे एक प्रकार से जीतेंगे या मरेंगे जैसे आवेश में हैं। लेकिन किससे जीतना है और किसे मारना है, इसे भी एक बार समझ लेना चाहिए। राज्यपाल ने मुख्यमंत्री को सूचित किया है कि राज्य सरकार, राज्य के सभी विश्वविद्यालयों के कुलपति के रूप में, पिछले सत्र के अंकों का मूल्यांकन करने के बाद औसत अंक तय करते समय राज्यपाल को विश्वास में लेना चाहिए था। वास्तव में उच्च और तकनीकी शिक्षा मंत्री उदय सामंत ने राज्यपाल से इस मामले पर चर्चा की है, ऐसी जानकारी प्रकाशित हुई। देशभर में समय कठिन है। समय आपातकाल का है। अधिकारों और नियमों के अहंकार को दरकिनार कर सरकार को निर्णय लेने होते हैं। लगभग तीन साल पहले, जब प्रधानमंत्री मोदी ने नोटबंदी का फैसला सुनाया तब भी देश अंधेरे में ही था। रिजर्व बैंक के गवर्नर, वित्त मंत्री और अन्य प्रमुख सदस्यों को भी विश्वास में नहीं लिया गया था। ‘लॉकडाउन’ का निर्णय भी उन्होंने इसी तरह लिया। यह निर्णय लेने में उन्होंने राष्ट्रपति की अनुमति नहीं ली थी और न ही उन्हें विश्वास में लिया था। मोदी सरकार के पास बहुमत है। हम मानते हैं कि उन्होंने देश के हित में निर्णय लिया। महाराष्ट्र में भी अगर संकट के समय में इस तरह के फैसले लिए जाते हैं व इस प्रकार के हर निर्णय में विरोधी पक्ष टांग अड़ाए और उस टांग पर राज्य के संवैधानिक प्रमुख ‘मम’ कहते आशीर्वाद दें, यह मूलतः नियम के बाहर है। ऐसी कितनी भी टांग डालो लेकिन राज्य के महाविकास आघाड़ी की सरकार नहीं गिरेगी। महाराष्ट्र में तीन-पक्षीय आघाड़ी टूटेगी, तो ही ये सरकार गिरेगी अन्यथा नहीं, ऐसा श्री अमित शाह ने खुद कहा है। इसलिए विपक्ष को इस भ्रम से बाहर निकलना चाहिए कि सरकार के निर्णय में अड़ंगा डालकर सरकार के लिए खतरा पैदा किया जा सकता है या उसे अस्थिर किया जा सकता है। डिग्री की अंतिम परीक्षा को लेकर राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच मतभेदों का सार्वजनिक प्रदर्शन जारी है। राजभवन में संबंधित लोगों की एक बैठक बुलाकर अंतिम परीक्षा के बारे में कोई निर्णय लिया जा सकता था। हालांकि राज्यपाल अधिकारियों आदि को बुलाकर समीक्षा बैठकें करते रहते हैं और समानांतर सत्ता केंद्र चलाते रहते हैं। तब तो इस मुद्दे पर भी छात्र संघों के प्रतिनिधियों सहित सभी को बुलाकर मामले को समझा जा सकता था। राज्यपाल राज्य के सभी विश्वविद्यालयों के कुलपति हैं, हम समझ सकते हैं कि उनके पास इस संबंध में उनके कुछ विचार होंगे। लेकिन हमें राज्य के १० लाख छात्रों का ध्यान रखना ही पड़ेगा। फिलहाल कोरोना का संक्रमण बढ़ ही रहा है। ऐसे समय में इतनी बड़ी संख्या में छात्रों की परीक्षा कैसे लें, उस समय सामाजिक दूरी के नियमों का पालन कैसे किया जाएगा, क्या लाखों छात्रों के जीवन को खतरे में डालें, ऐसे कई सवाल हैं और औसत अंक देना ही इन सवालों का व्यावहारिक उत्तर है। राज्य सरकार ने यही रास्ता चुना है और फिलहाल यही सही है। जिस प्रकार राज्यपाल की ‘संवैधानिक चिंता’ महत्वपूर्ण है, उसी प्रकार मंत्री और सरकार की ‘जनता की चिंता’ भी महत्वपूर्ण है। इन दो ‘चिंताओं’ को मिलाकर जनता की चिंता दूर करना ही वर्तमान संकट काल में सबका उद्देश्य होना चाहिए। देशभर में कई ‘बड़े लोग’ वर्तमान में फर्जी डिग्री के साथ राजनीति में घूम रहे हैं। ‘कोरोना ग्रेजुएट’ होने की बजाय फर्जी डिग्री वाले ज्यादा डेंजर होते हैं। यह सूची दिल्ली से गली तक की है। इसलिए कोरोना के संकट को देखते हुए, औसत अंक पद्धति का उपयोग ठीक है। राज्य के सभी विश्वविद्यालयों को मिलाकर एटीकेटी वाले ४० फीसदी छात्रों का क्या? उन्हें ये औसत अंक कैसे देंगे? इस तरह का एक मुद्दा भाजपा के नेता वकील आशीष शेलार ने उठाया। इस पर मंत्री, उप-कुलपतियों और शिक्षा विशेषज्ञों के बीच चर्चा के बाद निर्णय लिया जाएगा। हम राज्यपाल के विवेक पर विश्वास करते हैं, लेकिन राजभवन के प्रवेश द्वार पर कभी-कभार ‘चक्रम’ बादल टकराते रहते हैं। राज्यपाल एक सज्जन व्यक्ति हैं। उन्हें ऐसे चक्रम तूफानों से सावधान रहना चाहिए। अन्यथा लाखों छात्रों का भविष्य उद्ध्वस्त होने का खतरा है। फिर यह कानून केवल विश्वविद्यालय पर ही लागू नहीं होता, बल्कि अन्य क्षेत्रों में भी लागू होता है। यदि कानून से ही चलने की बात है तो जब जनता मीठी नींद सो रही थी, उस समय महाराष्ट्र से राष्ट्रपति शासन हटाकर एक अवैध शपथ ग्रहण समारोह आयोजित नहीं किया गया होता। फिलहाल इतना ही!