रामलला को फिर छला!, जनवरी भी स्वाहा

कल सुबह तक राम भक्तों को बड़ी उम्मीद थी कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित ५ जजों की संवैधानिक पीठ राम जन्मभूमि पर सुनवाई शुरू कर देगी और अयोध्या में जल्दी राम मंदिर बनने का रास्ता प्रशस्त हो जाएगा। मगर रामलला एक बार फिर छले गए। मुस्लिम समुदाय के वकील राजीव धवन ने पीठ में शामिल एक जज यू.यू. ललित पर सवाल उठा दिया। इसके बाद पांचों जजों ने मंत्रणा की और नई पीठ बनाने के लिए २९ जनवरी की तारीख दे दी। इस तरह यह जनवरी का महीना भी तारीख पर तारीख में स्वाहा हो गया।
सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई कल सुबह करीब आधे घंटे तक चली और धवन की आपत्ति के बाद तय हो गया कि अब पांच जजों की पीठ में जस्टिस यूयू ललित शामिल नहीं होंगे और नई बेंच का गठन किया जाएगा। इसके साथ ही धवन ने दस्तावेजों के अनुवाद पर भी आपत्ति प्रकट की। इस मामले से जुड़े १८८३६ पेज के दस्तावेज हैं, जबकि हाई कोर्ट का फैसला ही ४३०४ पेज का है। जो भी मूल दस्तावेज हैं वे अरबी, फारसी, संस्कृत, उर्दू और गुरमुखी में लिखे हैं। वकीलों ने कहा कि अनुवाद की भी पुष्टि होनी चाहिए। चर्चा के दौरान मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ने कहा कि बेंच में शामिल जस्टिस यूयू ललित १९९४ में कल्याण सिंह की ओर से कोर्ट में पेश हुए थे। हालांकि इतना कहते ही उन्होंने तुरंत खेद भी जताया। जिस पर चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने उन्हें कहा कि वह खेद क्यों जता रहे हैं। आपने सिर्फ तथ्य को सामने रखा है।
कल अयोध्या के राम जन्मभूमि मुकदमे में तारीख पर तारीख का मामला जारी रहा। रामलला को कोर्ट ने एक बार फिर तारीख दे दी। यह तारीख आगामी २९ जुलाई की है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचे साधु-संत व राम भक्त काफी निराश दिखे। उनका मानना है कि जान बूझकर इस मामले को टरकाया जा रहा है और रामलला को सिर्फ तारीख पर तारीख दी जा रही है। कल सुनवाई शुरू होते ही मुस्लिम पक्षकार के वकील राजीव धवन ने पांच जजों की बेंच में शामिल जज यू.यू. ललित पर सवाल उठा दिया। उनका कहना था कि जस्टिस ललित पूर्व में कल्याण सिंह के वकील की हैसियत से कोर्ट में पैरवी कर चुके हैं। इसके बाद जस्टिस ललित ने खुद को पीठ से अलग करने की बात कही।
यूपी सरकार के वकील हरीश साल्वे ने कहा कि जस्टिस यू.यू.ललित के पीठ में शामिल होने से उन्हें कोई दिक्कत नहीं है लेकिन इस तरह का मामला उठाने के बाद जस्टिस यू.यू. ललित ने खुद को इस मसले से अलग कर लिया। इसके अलावा राजीव धवन ने संविधान पीठ पर भी सवाल उठा दिया। उन्होंने कहा कि ये मामला पहले ३ जजों की पीठ के पास था लेकिन अचानक ५ जजों की पीठ के सामने मामला गया जिसको लेकर कोई न्यायिक आदेश जारी नहीं किया गया। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान पीठ का गठन करना चीफ जस्टिस का अधिकार है।
बता दें कि यह पीठ इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई कर रही है। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षतावाली इस ५ सदस्यीय संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में जस्टिस एस. ए. बोबडे, जस्टिस एन.वी. रमन, जस्टिस यू.यू. ललित और जस्टिस धनंजय वाई. चंद्रचूड़ शामिल हैं।

नहीं था संविधान पीठ का संकेत
जब मामला गत ४ जनवरी को सुनवाई के लिए आया था तो इस बात का कोई संकेत नहीं था कि भूमि विवाद मामले को संविधान पीठ को भेजा जाएगा क्योंकि तब सुप्रीम कोर्ट ने बस इतना कहा था कि इस मामले में गठित होनेवाली उचित बेंच १० जनवरी को अगला आदेश देगी। राम जन्मभूमि विवाद से संबंधित २.७७ एकड़ भूमि के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के ३० सितंबर, २०१० के २:१ के बहुमत के पैâसले के खिलाफ शीर्ष अदालत में १४ अपीलें दायर की गई हैं। हार्âकोर्ट ने इस पैâसले में विवादित भूमि सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला विराजमान के बीच बराबर- बराबर बांटने का आदेश दिया था। इस पैâसले के खिलाफ अपील दायर होने पर शीर्ष अदालत ने मई २०११ में हाईकोर्ट के निर्णय पर रोक लगाने के साथ ही विवादित स्थल पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था।