" /> रामायण का विज्ञान समझो!

रामायण का विज्ञान समझो!

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के साथ राम की सनातन ऐतिहासिकता एवं सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की स्थापना हो जाएगी। अब विभिन्न रामायणों में दर्ज उस विज्ञान की वैज्ञानिकताओं को भी मान्यता देने की जरूरत है, जिन्हें वामपंथी पूर्वाग्रहों के चलते वैज्ञानिक एवं बुद्धिजीवी न केवल नकारते रहे हैं, बल्कि इनकी ऐतिहासिकता को भी कपोल-कल्पित कहकर उपहास उड़ाते रहे हैं। अतएव यह समय प्राचीन भारतीय विज्ञान के पुनरुत्थान का भी है। क्योंकि रामायण और महाभारत की कथाएं नाना लोक स्मृतियों और विविध आयामों में प्रचलित बनी रहकर, इनका विस्तार सार्वभौमिक है। इस विरासत को मिथक कहकर नकारने की कोशिशों के बावजूद दुनिया के जनमानस में राम-कृष्ण की जो मूर्त-अमूर्त छवि है, उन्हें गढ़े गए कुतर्कों से कभी खंडित नहीं किया जा सका। शायद इसीलिए भवभूति और कालिदास ने रामायण को इतिहास बताया। वाल्मीकि रामायण और उसके समकालीन ग्रंथों में ‘इतिहास’ को ‘पुरावृत्त’ कहा गया है। गोया, कालिदास के ‘रघुवंश’ में विश्वामित्र राम को पुरावृत्त सुनाते हैं। मार्क्सवादी चिंतक डॉ. रामविलास शर्मा ने रामायण को महाकाव्यात्मक इतिहास की श्रेणी में रखा है। इन ग्रंथों में विज्ञानसम्मत अनेक ऐसे सूत्र हैं, जिनके जरिए नए आविष्कार की दिशा में बढ़ा जा सकता है। हम इन्हें क्यों नहीं संकलित कर पाठ्यक्रमों में शामिल करते? ऐसा करने से मेधावी छात्रों में विज्ञान सम्मत महात्वाकांक्षा जगा सकते हैं और भारतीय जीवन-मूल्यों के इन आधार ग्रंथों से मिथकीय आध्यात्मिकता की धूल झाड़ने का काम भी कर सकते हैं।
रामायण का शब्दार्थ भी राम का ‘अयण’ अर्थात ‘भ्रमण’ से है। वे ३०० रामायण और अनेक रामायण विषयक संदर्भ ग्रंथ, जिनके प्रभाव को नकारने के लिए पाउला रिचमैन ने १९४२ में ‘मैनी रामायणस द डाइवर्सिटी ऑफ ए नैरेटिव ट्रेडिशन इन साउथ एशिया’ लिखी और ए के रामानुजन ने ‘थ्री हंड्रेड रामायण फाइव एग्जांपल एंड थ्री थॉट्स ऑन ट्रांसलेशन’ निबंध लिख कर कामजन्य विद्रूप अंशों का संकलन किया। जबकि इन्हीं रामायणों, रामायण विषयक संदर्भ ग्रंथों और मदन मोहन शर्मा शाही के उपन्यास ‘लंकेश्वर’ से विज्ञान सम्मत आविष्कारों की पड़ताल की जा सकती है। रामायण एकांगी दृष्टिकोण का वृतांत भर नहीं है। इसमें कौटुम्बिक सांसारिकता है। राज-समाज संचालन के कूट मंत्र हैं। भूगोल है। वनस्पति और जीव जगत हैं। राष्ट्रीयता है। राष्ट्र के प्रति उत्सर्ग का चरम है। अस्त्र-शस्त्र हैं। यौद्धिक कौशल के गुण हैं। भौतिकवाद है। कणाद का परमाणुवाद है। सांख्यदर्शन और योग के सूत्र हैं। वेदांत दर्शन है और अनेक वैज्ञानिक उपलब्धियां हैं। गांधी का रामराज्य और पं. दीनदयाल उपाध्याय के आध्यात्मिक भौतिकवाद के उत्स इन्हीं रामायणों में हैं।
लंकाधीश रावण के पास लड़ाकू वायुयानों और समुद्री जलपोतों के बड़े बेड़े थे। प्रक्षेपास्त्र और ब्रह्मास्त्रों का अकूत भंडार व उनके निर्माण में लगी अनेक वेधशालाएं थीं। दूरसंचार व दूरदर्शन की तकनीकी-यंत्र लंका में स्थापित थे। राम-रावण युद्ध केवल राम और रावण के बीच न होकर एक विश्वयुद्ध था। जिसमें उस समय की समस्त विश्व-शक्तियों ने अपने-अपने मित्र देश के लिए लड़ाई लड़ी थी। परिणामस्वरूप ब्रह्मास्त्रों के विकट प्रयोग से लगभग समस्त वैज्ञानिक अनुसंधान-शालाएं उनके आविष्कारक, वैज्ञानिक व अध्येता काल-कवलित हो गए। यही कारण है कि हम कालांतर में हुए महाभारत युद्ध में भी वैज्ञानिक चमत्कारों को रामायण की तुलना में उत्कृष्ट व सक्षम नहीं पाते हैं। महाभारत युद्ध भी इतना विकराल था कि रामायण काल से शेष बचा जो विज्ञान था, उसका विध्वंस हो गया। इसीलिए महाभारत के बाद के जितने भी युद्ध हैं, वे खतरनाक अस्त्र-शस्त्रों से न लड़े जाकर थल सेना के माध्यम से ही लड़े गए।
वाल्मीकि रामायण एवं अन्य ग्रंथों में ‘पुष्पक विमान’ के उपयोग के विवरण हैं। इससे स्पष्ट होता है, उस युग में राक्षस व देवता न केवल विमान शास्त्र के ज्ञाता थे, बल्कि सुविधायुक्त आकाशगामी साधनों के रूप में वाहन उपलब्ध भी थे। रामायण के अनुसार पुष्पक विमान के निर्माता ब्रह्मा थे। ब्रह्मा ने यह विमान कुबेर को भेंट किया था। कुबेर से इसे रावण ने छीन लिया। रावण की मृत्यु के बाद विभीषण इसका अधिपति बना और उसने फिर इसे कुबेर को दे दिया। कुबेर ने इसे राम को उपहार में दे दिया। राम लंका विजय के बाद अयोध्या इसी विमान से पहुंचे थे।
रामायण के अनुसार पुष्पक विमान मोर जैसी आकृति का आकाशचारी विमान था, जो अग्नि-वायु की समन्वयी ऊर्जा से चलता था। इसकी गति तीव्र थी और चालक की इच्छानुसार इसे किसी भी दिशा में गतिशील रखा जा सकता था। इसे छोटा-बड़ा भी किया जा सकता था। यह सभी ऋतुओं में आरामदायक यानी वातानुकूलित था। यह दिन और रात दोनों समय गतिमान रहने में समर्थ था। इस विवरण से जाहिर होता है, यह उन्नत प्रौद्योगिकी और वास्तु कला का अनूठा नमूना था। ‘ऋग्वेद’ में चार तरह के विमानों का उल्लेख है। जिन्हें आर्य-अनार्य उपयोग में लाते थे। इन चार वायुयानों को शकुन, त्रिपुर, सुन्दर और रुक्म नामों से जाना जाता था। ये अश्वहीन, चालक रहित, तीव्रगामी और धूल के बादल उड़ाते हुए आकाश में उड़ते थे। इनकी गति पतंग (पक्षी) की भांति, क्षमता तीन दिन-रात लगातार उड़ते रहने की और आकृति नौका जैसी थी। त्रिपुर विमान तो तीन खण्डों (तल्लों) वाला था तथा जल, थल एवं नभ तीनों में विचरण कर सकता था।
किवदंती है कि गौतम बुद्ध ने भी वायुयान द्वारा तीन बार लंका की यात्रा की थी। एरिक फॉन डॉनिकेन की किताब ‘चैरियट्स ऑफ गॉड्स’ में भारत समेत कई प्राचीन देशों से प्रमाण एकत्रित करके वायुयानों की तत्कालीन उपस्थिति की पुष्टि की गई है। इसी प्रकार डॉ. ओंकारनाथ श्रीवास्तव ने अनेक पाश्चात्य अनुसंधानों के मतों के आधार पर संभावना जताई है कि ‘रामायण’ में अंकित हनुमान की यात्राएं वायुयान अथवा हेलीकॉप्टर की यात्राएं थीं या हनुमान ‘राकेट बेल्ट’ बांधकर आकाशगमन करते थे, जैसे कि आज के अंतरिक्ष-यात्री करते हैं। हनुमान-मेघनाद में परस्पर हुआ वायु-युद्ध भी हावरक्राफ्ट से मिलता-जुलता है। आज भी लंका की पहाड़ियों पर चैरस मैदान पाए जाते हैं, जो वैमानिक अड्डे थे। कुछ गुफा-चित्रों में आकाशचारी मानव एवं अंतरिक्ष वेशभूषा से युक्त व्यक्तियों के चित्र भी निर्मित हैं। मिस्त्र में तो दुनिया का ऐसा नक्शा मिला है, जिसका निर्माण आकाश में उड़ान-सुविधा की पुष्टि करता है।
ताजा वैज्ञानिक अनुसंधानों ने तय किया है कि रामायण काल में वैमानिकी प्रौद्योगिकी इतनी अधिक विकसित थी, जिसे आज समझ पाना कठिन है। रावण का ससुर मयासुर अथवा मयदानव ने भगवान विश्वकर्मा से वैमानिकी विद्या सीखी और पुष्पक विमान बनाया। पुष्पक विमान की प्रौद्योगिक का विस्तृत व्यौरा महर्षि भारद्वाज द्वारा लिखित पुस्तक ‘यंत्र-सर्वेश्वम्’ में किया गया था। वर्तमान में यह पुस्तक विलुप्त हो चुकी है, लेकिन इसके ४० अध्यायों में से एक ‘वैमानिक शास्त्र’ उपलब्ध है। इसमें भी शकुन, सुन्दर, त्रिपुर एवं रुक्म विमान सहित २५ तरह के विमानों का विवरण है। इसी पुस्तक में वर्णित कुछ शब्द जैसे ‘विश्व क्रिया दर्पण’ आज के राड़ार जैसे यंत्र की कार्यप्रणाली का रूपक है।
राम-रावण युद्ध में प्रयोग में लाई गई शक्तियों को मायावी या दैवीय कहकर उनके वास्तविक महत्व, आविष्कार के ज्ञान व सामर्थ्य को सर्वथा नकार दिया गया। वास्तव में ये विध्वंसकारी परमाणु अस्त्र और अद्भुत भौतिक यंत्र थे। इनकी सूक्ष्म और यथार्थ विवेचना के लिए इनके रहस्यों को समझना शेष है। गोया, विश्वविद्यालयों में विभिन्न रामायणों के विज्ञान से जुड़े अंशों को पाठ के रूप में संकलित कर पढ़ाया जाए। इससे विद्यार्थियों में प्राचीन भारतीय विज्ञान को जानने की जिज्ञासा पैदा होगी। छात्र उस मिथक को तोड़ेंगे, जिसे कवि की कपोल कल्पना कहकर अब तक उपेक्षा की जाती रही है।