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राम बनाम परशुराम!, यूपी में सवर्ण संग्राम

उत्तर प्रदेश में राम मंदिर के भूमिपूजन के साथ ही राजनीतिक दलों का परशुराम प्रेम एकदम से उमड़ने लगा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा भव्य मंदिर के भूमिपूजन के बाद विपक्ष ने फिर से ब्राह्मणों के अपमान, संहार का मुद्दा उठा कर सामने परशुराम को खड़ा कर दिया है। नतीजतन उत्तर प्रदेश में अब राम से भी ज्यादा परशुराम पर दावेदारी की जंग तेज हो गई है। समाजवादी पार्टी ने सूबे में हर जिले के चौराहों पर परशुराम की मूर्तियां लगाने का एलान किया तो बसपा ने सबसे ऊंची प्रतिमा लगवाने का पासा फेंक दिया है। सपा के परशुराम की मूर्तियां लगवाने के एलान पर मायावती बिफरी हैं तो भाजपा ने विपक्ष पर ब्राह्मणों को सदन व सरकार में भागीदारी का सवाल उठा दिया है।

प्रदेश में पिछले कुछ दिनों से ब्राह्मणों को लेकर सियासत काफी चर्चा में है। समाजवादी पार्टी ने ब्राह्मणों को रिझाने के लिए राजधानी लखनऊ में भगवान परशुराम की १०८ फीट ऊंची मूर्ति लगाने का निणर्‍य लिया है। फिलहाल सूबे की सियासत में `तेरे राम तो मेरे परशुराम’ के बीच मचे घमासान का केंद्र ब्राह्मण बना है। योगी आदित्यनाथ सरकार के बेसिक शिक्षा मंत्री डॉ सतीश द्विवेदी ने समाजवादी पार्टी के ब्राह्मण कार्ड पर हमला बोलते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी तो पूर्वांचल के गोपीगंज से निषाद पार्टी के एकमात्र विधायक विजय मिश्रा के एक वीडियो को शेयर करके कांग्रेस के जितिन प्रसाद ने योगी सरकार से जवाब मांगा है। उक्त वीडियो में विधायक विजय मिश्रा ने योगी सरकार को ब्राह्मण विरोधी बताया और कहा कि हमारे ऊपर गलत तरीके से मुकदमे लादे जा रहे हैं और मुझे फंसाया जा रहा है। जितिन प्रसाद ने सरकार को पत्र लिखकर परशुराम जयंती पर अवकाश बहाली की मांग भी उठा दी है। सपा मुखिया अखिलेश यादव को निशाना बनाते हुए मंत्री द्विवेदी ने ट्वीट कर कहा कि ब्राह्मणों को बुद्धू मत समझिए। ब्राह्मण राष्ट्र भक्त होता है, विकास का पक्षधर होता है, नीतियों और कार्यक्रमों से जुड़ता है, उसे प्रलोभन देकर अपमानित न करें। दरअसल बदले हालात में उत्तर प्रदेश की राजनीति में अचानक से पिछड़े नहीं ब्राह्मण धुरी बन गए हैं। वर्णवादी व्यवस्था की इस सबसे अगड़ी जाति के वोटों की अरसे तक स्वाभाविक दावेदार रही कांग्रेस और अयोध्या के मंदिर आंदोलन के बाद से अब तक इसका साथ पाकर सत्ता की सीढ़ियां चढ़ती रही भाजपा या फिर एक बार दलित ब्राह्मण गठजोड़ से कुर्सी पा चुकी बसपा तो इन्हें रिझाने में लगी ही हैं। अब समाजवादी पार्टी भी इस मैदान में कूद पड़ी है।

सपा, बसपा और कांग्रेस को लगता है कि योगी आदित्यनाथ सरकार से ब्राह्मण वर्ग नाराज चल रहा है। कानपुर के बिकरू कांड के मास्टरमाइंड विकास दुबे के एनकाउंटर के बाद उपजी प्रतिक्रियाओं में विपक्ष को ब्राह्मण वोट साधने की संभावना दिखने लगी है। कुल २२ करोड़ से ज्यादा की आबादी वाले उत्तर प्रदेश में करीब १३-१४ प्रतिशत ब्राह्मण हैं। ब्राह्मण मतों के सहयोग से सत्ता का सुख प्राप्त कर चुके सभी दल अब इस समुदाय को रिझाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं। फिलहाल सूबे की सियासत का केंद्र ब्राह्मण बने हुए हैं। आने वाले २०२२ के विधानसभा चुनाव के मद्देनजर सूबे के चारों प्रमुख सियासी दल अपने अपने तरीके से ब्राह्मण समुदाय को पाले में लाने की कवायद में हैं। कांग्रेस साथ छोड़ चुके ब्राह्मण मतदाताओं को `ब्राह्मण चेतना संवाद’ के माध्यम से पुन: साधने में जुटी है तो २००७ में ब्राह्मणों को साथ लेकर सरकार बना चुकी बसपा भी कहीं पीछे नहीं है।

भाजपा ने हाल फिलहाल में विधानसभा से लेकर राज्यसभा में मुख्य सचेतकों की नियुक्ति में ब्राह्मण कार्ड खेला है और अब उनकी हर समस्या में फौरन राहत पहुंचा रही है। कांग्रेस ने और आगे निकल कर न केवल अपने पूर्व केंद्रीय मंत्री को ब्राह्मण समुदाय के जख्मों पर मरहम लगाने भेजा है बल्कि वाराणसी के इस समुदाय के अपने नेता राजेश मिश्रा को भी सक्रिय कर दिया है।

वहीं, सपा प्रबुद्ध सभा की ओर से कुछ जिलों में प्रथम स्वाधीनता संग्राम के नायक मंगल पांडेय की प्रतिमा लगवाए जाने की तैयारी की जा रही है। सरकार रहते परशुराम जयंती पर छुट्टी घोषित की गई थी, जिसे भाजपा सरकार ने खत्म कर दिया। समाजवादी पार्टी प्रदेश में गरीब ब्राह्मण परिवारों को उनकी बेटियों की शादी कराने में आर्थिक मदद भी करेगी। इस संबंध में पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ ब्राह्मण नेताओं पूर्व विधानसभा अध्यक्ष माताप्रसाद पाण्डेय, पूर्व मंत्री मनोज पाण्डेय, अभिषेक मिश्र आदि की बैठक भी हुई।

उधर कांग्रेस ने अलग-अलग क्षेत्रों में अपने ब्राह्मण नेताओं के सक्रिय किया है। पिछड़ी जाति से आने वाले प्रदेश अध्यक्ष लल्लू के साथ बराबर की तरजीह के साथ विधानमंडल दल की नेता आराधना शुक्ला मोना को खड़ा किया है। लखनऊ, कानपुर सहित कई प्रमुख जिलों में कांग्रेस की कमान ब्राह्मण चेहरों को ही दी गई है। हाल ही में पार्टी ने अपने जिला अध्यक्षों की नियुक्ति में इस समुदाय का खास ख्याल रखा है। वाराणसी से सांसद रहे राजेश मिश्रा को पूर्वांचल के ब्राह्मणों को जोड़ने के काम में लगाया गया है। कांग्रेस के जितिन प्रसाद पार्टी से दूर हुए और फिलहाल बीजेपी के मजबूत ब्राह्मण वोट बैंक को फिर से पाले में लाने के लिए `ब्राह्मण चेतना संवाद’ की शुरुआत कर चुके हैं। जितिन प्रसाद ब्राह्मणों से जुड़े मसलों पर खुलकर सक्रिय हैं। प्रियंका गांधी की अगुआई वाला कांग्रेस नेतृत्व भी संदेश देने में जुटा है। पिछले दिनों गाजीपुर में फौजी ब्राह्मण परिवार की पुलिस द्वारा पिटाई की घटना के बाद कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल वहां पहुंचा भी था।

वास्तव में जिस दुर्दांत विकास दुबे प्रकरण के बाद उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण राजनीति की सरगर्मियां बढ़ीं, उसके प्रभाव क्षेत्र वाले ब्राह्मण बाहुल्य कानपुर जिले के बिकरू और चौबेपुर के आसपास ये जाति बड़ी तादाद में है। हांलाकि इस वर्ग का वोट हर जिले में है। पूर्वांचल में पैâजाबाद, वाराणसी, गोरखपुर, गाजीपुर, गोण्डा, बस्ती, महाराजगंज, ,सिद्वार्थनगर, जौनपुर, गोंडा और मध्य यूपी में कानपुर रायबरेली, फर्रुखाबाद, कन्नौज, उन्नाव, लखनऊ, सीतापुर, बाराबंकी, हरदोई, इलाहाबाद, सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, अमेठी के अलावा बुंदेलखण्ड में हमीरपुर, हरदोई, जालौन, झांसी, चित्रकूट, ललितपुर, बांदा आदि ब्राह्मण मतदाताओं के केंद्र माने जाते हैं। मोटे तौर पर ब्राह्मणों की लगभग ३० जिलों की राजनीति में अहम भूमिका है और इसीलिए सभी राजनीतिक दलों के लिए यह मजबूरी हो जाती है कि इस दृष्टिकोण से इन इलाकों में उम्मीदवार उतारें। यदि हम एक जिले के पांच-पांच विधानसभा क्षेत्रों में इस जाति का प्रभाव मानें तो कुल संख्या १५० तक पहुंच जाती है ।

अब जब प्रियंका गांधी की अगुवाई में कांग्रेस संघर्षरत है तो उसके प्रवक्ता ऐलानिया दावा कर रहे हैं कि आजादी के बाद कांग्रेस की सरकारों में १९८९ तक यूपी में छह ब्राह्मण मुख्यमंत्री बने। कांग्रेस का यह दावा सच भी है लेकिन ९० के दशक में मंडल कमीशन लागू होने और अयोध्या के मंदिर मस्जिद विवाद ने हिंदी हृदय प्रदेश की राजनीति में आमूल-चूल बदलाव पैदा कर दिया। इस कालखंड में उत्तर प्रदेश में दलितों और मुस्लिमों की राजनीति का दौर शुरू हुआ जो कई वर्षों तक चलता रहा। लेकिन दलितों की राजनीति करने वाली बहुजन समाज पार्टी ने अचानक २००५ में अपना स्टैंड बदल दिया और सियासत की नई सोशल इंजीनियरिंग से बड़े ब्राह्मण वोट बैंक पर अपना दांव लगा दिया। जगह-गह ब्राह्मण सम्मेलन कराए और नारा दिया `हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश हैं।’ इसके बाद २००७ के विधानसभा चुनाव में बसपा ने ५६ ब्राह्मणों को टिकट देकर सबको चौंका दिया। इसका उसे भरपूर लाभ मिला और ४१ ब्राह्मण विधायक बसपा से जीते।

२००७ में प्रदेश में बसपा की सरकार बनने के बाद कांग्रेस ने भी आनन-फानन में डॉ रीता बहुगुणा जोशी को प्रदेश की कमान सौंप दी। इससे ब्राह्मणों का परम्परागत वोट बैंक कांग्रेस की तरफ आकर्षित हुआ और २००९ के लोकसभा चुनाव में उसके २२ प्रत्याशी लोकसभा पहुंच गए। भाजपा ने डॉ रमापति राम त्रिपाठी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया। अयोध्या आंदोलन के बाद से भाजपा का साथ दे रहा ब्राह्मण वोट बैंक इससे संतुष्ट नहीं हुआ। बदलती राजनीति के चलते ही मुस्लिमों और यादवों की राजनीति करने वाली समाजवादी पार्टी ने भी अपने दल में ब्राह्मण नेताओं को आगे बढाने का काम किया। जिसका उन्हें लाभ मिला और २०१२ के विधानसभा चुनाव में बसपा का ब्राह्मण वोट बैंक छिटककर समाजवादी पार्टी की तरफ मुंड़ गया। लेकिन ब्राह्मणों का एक हिस्सा भाजपा के साथ लगातार बना रहा। २०१४ और २०१९ के लोकसभा चुनाव में अधिसंख्य ब्राह्मण खुलकर भाजपा के साथ रहे और गैर यादव ओबीसी वर्ग की जुगलबंदी के साथ २०१७ में भाजपा को सवा तीन सौ विधायकों वाली बड़ी सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाई। हालांकि इन चुनावों में भाजपा को यादव और दलित वर्ग के भी वोट मिले और पिछले तीन दशक के दौरान आठ बार सरकार बनाने वाली सपा-बसपा को हाशिए पर आना पड़ा।