" /> राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस आज, पृथ्वी पर भगवान का रूप!

राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस आज, पृथ्वी पर भगवान का रूप!

आज पूरी दुनिया कोरोना महामारी से जूझ रही है, जिससे विश्व की एक करोड़ से ज्यादा आबादी संक्रमित हो चुकी है और पांच लाख से अधिक व्यक्ति प्राण गवां चुके हैं। दूसरा पहलू देखें तो कोरोना संक्रमितों की बड़ी संख्या में से ५० लाख से भी ज्यादा को ठीक करने में भी सफलता मिली है और इस सफलता का श्रेय अगर किसी को जाता है तो वे हैं हमारे चिकित्सक। जिस प्रकार दुनियाभर में आज चिकित्सक अपनी जान की परवाह किए बिना लाखों लोगों के जीवन की रक्षा कर रहे हैं, ऐसे में वे वाकई सम्मान के सबसे बड़े हकदार हैं। हालांकि आज निजी चिकित्सा तंत्र भले ही मुनाफाखोरी के व्यवसाय में परिवर्तित हो चुका है लेकिन फिर भी इस सच को नकारा नहीं जा सकता कि कोरोना हो या वैंâसर, हृदय रोग, एड्स, मधुमेह इत्यादि कोई भी बीमारी, छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी बीमारियों से चिकित्सक ही करोड़ों लोगों को उबारते हैं। चूंकि चिकित्सक प्राय: मरीज को मौत के मुंह से भी बचाकर ले आते हैं इसीलिए चिकित्सकों को भगवान का रूप माना जाता रहा है।

बिना चिकित्सा व्यवस्था के इंसान की जिंदगी वैâसी होती, इसकी कल्पना मात्र से ही रोम-रोम सिहर जाता है। यही कारण है कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में चिकित्सकों का महत्व सदा से रहा है और हमेशा रहेगा। चिकित्सकों के समाज के प्रति इसी समर्पण व प्रतिबद्धता के लिए कृतज्ञता एवं आभार व्यक्त करने और मेडिकल छात्रों को प्रेरित करने के लिए ही प्रतिवर्ष देश में एक जुलाई को ‘राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस’ मनाया जाता है। चिकित्सक दिवस मनाने का मूल उद्देश्य चिकित्सकों की बहुमूल्य सेवा, भूमिका और महत्व के संबंध में आमजन को जागरूक करना, चिकित्सकों का सम्मान करना और साथ ही चिकित्सकों को भी उनके पेशे के प्रति जागरूक करना है। दरअसल कुछ चिकित्सक ऐसे भी देखे जाते हैं, जो अपने इस सम्मानित पेशे के प्रति ईमानदार नहीं होते लेकिन ऐसे चिकित्सकों की भी कमी नहीं, जिनमें अपने पेशे के प्रति समर्पण की कोई कमी नहीं होती।

भारत में वर्ष १९९१ में चिकित्सक दिवस की स्थापना हुई थी। पश्चिम बंगाल के दूसरे मुख्यमंत्री और जाने-माने चिकित्सक डॉ. बिधान चंद्र रॉय के सम्मान में चिकित्सकों की उपलब्धियों तथा चिकित्सा के क्षेत्र में नए आयाम हासिल करने वाले डॉक्टरों के सम्मान के लिए इस दिवस का आयोजन होता है। वे एक जाने-माने चिकित्सक, प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और वर्ष १९४८ से १९६२ में जीवन के अंतिम क्षणों तक पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री रहे। उन्होंने पश्चिम बंगाल में दुर्गापुर, बिधाननगर, अशोकनगर, कल्याणी तथा हबरा नामक पांच शहरों की स्थापना की थी। संभवत: इसीलिए उन्हें पश्चिम बंगाल का महान वास्तुकार भी कहा जाता है। कोलकाता विश्वविद्यालय से मेडिकल की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने वर्ष १९११ में एमआरसीपी और एफआरसीएस की डिग्री लंदन से ली। उन्होंने एक साथ फिजीशियन और सर्जन की रॉयल कॉलेज की सदस्यता हासिल कर हर किसी को अपनी प्रतिभा से हतप्रभ कर दिया था। वर्ष १९११ में भारत में ही एक चिकित्सक के रूप में उन्होंने अपने चिकित्सा करियर की शुरूआत की। वे कोलकाता मेडिकल कॉलेज में शिक्षक नियुक्त हुए। वर्ष १९२२ में वे कोलकाता मेडिकल जनरल के संपादक और बोर्ड के सदस्य बने। १९२६ में उन्होंने अपना पहला राजनीतिक भाषण दिया और १९२८ में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के सदस्य भी चुने गए।

वर्ष १९२८ में डॉ. बिधान चंद्र रॉय ने इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के गठन और भारत की मेडिकल काउंसिल (एमसीआई) की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कई बड़े-बड़े पदों पर रहने के बाद भी वे प्रतिदिन गरीब मरीजों का मुफ्त इलाज किया करते थे। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात उन्होंने अपना समस्त जीवन चिकित्सा सेवा को समर्पित कर दिया। बेहतरीन स्वास्थ्य सुविधाओं को आम जनता की पहुंच के भीतर लाने के लिए वे जीवनपर्यन्त प्रयासरत रहे। ४ फरवरी १९६१ को उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया। १९६७ में दिल्ली में उनके सम्मान में डॉ. बी.सी. रॉय स्मारक पुस्तकालय की स्थापना हुई और १९७६ में उनकी स्मृति में केंद्र सरकार द्वारा डॉ. बी.सी. रॉय राष्ट्रीय पुरस्कार की स्थापना की गई। संयोगवश डॉ. रॉय का जन्म और मृत्यु एक जुलाई को ही हुई थी। उनका जन्म १ जुलाई १८८२ को पटना में हुआ था और मृत्यु १ जुलाई १९६२ को हृदयाघात से कोलकाता में हुई थी।

हालांकि भारत के अलावा दूसरे देशों में भी चिकित्सकों के सम्मान में ऐसे ही दिवस मनाए जाते हैं किन्तु वहां उनका आयोजन अलग-अलग तारीखों में होता है। वैसे चिकित्सक दिवस की शुरूआत सबसे पहले अमेरिका के जॉर्जिया में हुई थी। वहां चिकित्सकों के सम्मान के लिए एक दिन निश्चित करने का सुझाव जॉर्जिया निवासी डॉ. चार्ल्स बी एलमंड की पत्नी यूडोरा ब्राउन एलमंड ने ३० मार्च १९३३ को दिया था। ३० मार्च १९५८ को यूएस के हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव्स ने उनके उस सुझाव को स्वीकार करते हुए यह दिवस मनाना शुरू किया। वहां इसके लिए ३० मार्च की तारीख इसलिए रखी गई क्योंकि जॉर्जिया में इसी दिन डॉ. क्राफोर्ड डब्ल्यू लोंग ने पहली बार ऑपरेशन के लिए एनेस्थीसिया का उपयोग किया था। जहां अमेरिका में ३० मार्च को चिकित्सक दिवस मनाया जाता है, वहीं वियतनाम में इसकी स्थापना २८ फरवरी १९५५ को हुई थी और वहां तभी से २८ फरवरी को या उसके आसपास वाले किसी दिन यह दिवस मनाया जाता है। ब्राजील में महान चिकित्सक रहे वैâथोलिक चर्च के सेंट ल्यूक के जन्मदिवस के अवसर पर १८ अक्टूबर को जबकि क्यूबा में पीले बुखार पर शोध करनेवाले चिकित्सक कॉर्लोस जुआन फिनले के जन्मदिवस ३ दिसंबर को यह दिवस मनाया जाता है। नेपाल में यह दिवस नेपाल मेडिकल एसोसिएशन की स्थापना के बाद ४ मार्च को तथा ईरान में महान चिकित्सक एविसेना के जन्मदिवस के अवसर पर २३ अगस्त को मनाया जाता है।

बहरहाल चिकित्सकों को पृथ्वी पर भगवान का रूप माना जाता है इसलिए समाज की भी उनसे यही अपेक्षा रहती है कि वे अपना कर्त्तव्य ईमानदारी और पूरी निष्ठा के साथ निभाएं। दरअसल चिकित्सा केवल पैसा कमाने के लिए एक पेशा मात्र नहीं है बल्कि समाज के कल्याण और उत्थान का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है। इसीलिए चिकित्सक को सदैव सम्मान की नजर से देखनेवाले समाज के प्रति उनसे भी समर्पण की उम्मीद की जाती है।