" /> ‘राष्ट्रीय पुरस्कार मुझसे दूर ही रहे!’ -मनोज बाजपेई

‘राष्ट्रीय पुरस्कार मुझसे दूर ही रहे!’ -मनोज बाजपेई

बॉलीवुड के सेलेबल और बेहतरीन एक्टर्स में अभिनेता मनोज बाजपेई का शुमार है। बॉलीवुड में मनोज बाजपेई के करियर को २५ वर्ष पूरे हो चुके हैं। बिहार से मुंबई आने के बाद उनका सफर बेहद उतार-चढ़ाव भरा रहा। आज करोड़ों देशवासी जब नेपोटिज्म के मुद्दे पर बातचीत कर रहे हैं, उस समय मनोज का जिक्र किए बिना कोई आगे नहीं बढ़ सकता। ‘द्रोहकाल’, ‘बैंडिट क्वीन’, ‘सत्या’ जैसी सफल और यादगार फिल्मों में काम करनेवाले मनोज बाजपेई के परिवार में दूर-दूर तक कोई फिल्मों से संबंधित नहीं था, इसके बावजूद वे सफल हैं। पेश है बहुमुखी प्रतिभा के धनी मनोज बाजपेई से पूजा सामंत की हुई बातचीत के प्रमुख अंश-

 लॉकडाउन के दौरान तीन महीने आप उत्तराखंड में फंसे रहे?
उत्तराखंड में मैं अपनी अगली फिल्म ‘पहाड़ों में’ की शूटिंग कर रहा था। हमने चार-पांच दिन शूटिंग की और लॉकडाउन शुरू हो गया। इस वजह से मैं वहीं फंसा रहा। अब पिछले कुछ दिनों से मैं अपने घर दिल्ली में हूं और मेरा परिवार मेरे साथ है। फिल्म ‘भोसले’ का किरदार निभाना और निर्माता बनना आपके लिए कितना आसान और कितना मुश्किल रहा? फिल्म ‘भोसले’ दुनिया के कई देशों में सराही गई। ये कहानी एक नेक दिल महाराष्ट्रियन पुलिस कांस्टेबल भोसले का रीयल किरदार है। इसके निर्माण के लिए मैंने आगे हाथ बढ़ाया। कुछ निर्माता आगे बढे लेकिन जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती गई, इसके निर्माता नदारद होते गए। मुझे और देवाशीष को समझ नहीं आ रहा था कि आगे क्या होगा? दस दिन की शूटिंग के बाद हमारे पास पैसे नहीं थे। फायनांस की विकट समस्या बनी हुई थी। मैं इसे अधर में नहीं छोड़ना चाहता था। निर्माता संदीप कपूर आगे आए और उन्होंने पैसा लगाया। इस फिल्म को बनते-बनते पूरे ५ वर्ष लग गए। लॉकडाउन की वजह से फिल्म को थियटर में रिलीज करना मुमकिन नहीं था। फिल्म की रिलीज के लिए मैं ‘सोनी लीव’ का शुक्रगुजार हूं।

आज के माहौल में ये फिल्म कितनी रिलेवेंट है?
इस दौर में ही ‘भोसले’ बहुत ज्यादा रिलेवेंट है। आज लॉकडाउन शुरू होने के बाद हजारों माइग्रेंट्स अपने गांवों की ओर चल दिए। इन सभी माइग्रेंट्स के लिए भोसले जैसे जुझारू लोग अपनी पूरी क्षमताओं के साथ लड़ते हैं, उनका साथ देते हैं। गरीबों का साथ देनेवाले भोसले जैसे मसीहा की सख्त जरूरत है।

फिल्म ‘भोसले’ के लिए आपको नेशनल अवॉर्ड की उम्मीद है?
भारत सरकार की तरफ से मुझे २०१९ में ‘पद्मश्री’ पुरस्कार मिल चुका है। मेरी अभिनय की काबिलियत पर अपने देश ने मुहर लगा दी है। ये बहुत खुशी की बात है। मेरे परफॉर्मेंस की चर्चा राष्ट्रीय स्तर पर होती रही, लेकिन राष्ट्रीय पुरस्कार मुझसे दूर ही रहे। अब तो मैंने उम्मीद करना ही छोड़ दिया है।

अपने से दोगुनी उम्र का किरदार निभाते हुए आपको डर नहीं लगता?
मैंने खुद को कभी स्टार नहीं माना। आज से २१ साल पहले मैंने फिल्म ‘तमन्ना’ की थी, उसमें मेरे किरदार की उम्र ६० वर्ष की थी और व्यक्तिगत जिंदगी में मेरी उम्र २४-२५ के आसपास थी। ऑनस्क्रीन उम्रदराज दिखना मेरे लिए कभी परेशानी का सबब नहीं रहा। ये इनसिक्यूरिटी कभी नहीं रही मुझमें। इसी वजह से शायद मैं स्टार नहीं एक्टर ही रहा।

करियर के २५वें पायदान पर क्या निर्देशक बनने की इच्छा नहीं है?
नहीं, मुझे नहीं लगता कि २५ वर्षों से लगातार अभिनय करने के बाद मेरी काबिलियत अब निर्देशक बनने की हो चुकी है। मैं डायरेक्टर्स का एक्टर हूं। निर्देशक मुझे जो कहता है मैं उसका पालन करता हूं। सेट पर कभी निर्देशक पर हावी होने की कोशिश मैंने नहीं की।