राष्ट्रीय शर्म का दूषण!

राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण आज ज्वलंत मुद्दा बन गया है। केंद्र और राज्य सरकार द्वारा इस गंभीर विषय पर ध्यान न दिए जाने के कारण देश की सर्वोच्च न्यायालय अब भड़क गई है। इसमें विशेष रूप से वरिष्ठ अधिकारी सुप्रीम कोर्ट के निशाने पर आ गए हैं। सर्वोच्च न्यायालय की अवधारणा बन गई है कि प्रमुख सरकारी पदों पर बैठे हुए अधिकारी वर्ग को प्रदूषण की जरा भी चिंता नहीं है और दिल्ली की हवा को स्वच्छ रखने के लिए वे कोई उपाय नहीं कर रहे हैं। इसलिए ‘तुम यहां आराम से बैठकर राज कर रहे हो और तुम्हारी नाकामी के कारण लोगों को मरने दिया जाए क्या?’ ऐसा संतप्त सवाल इस विषय पर न्यायमूर्ति ने सुनवाई के दौरान किया। प्रदूषण के संकट को रोकने के लिए सरकारी तंत्र यदि कुछ नहीं कर पा रही है तो देश की जनता को प्रगति का क्या लाभ हुआ? ऐसा सवाल दिल्ली, पंजाब, हरियाणा के मुख्य सचिवों से न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा ने किया। न्यायमूर्ति मिश्रा का यह संताप बेवजह नहीं है। दिल्ली में वायु प्रदूषण की समस्या हर साल खड़ी होती है। ‘हिंदुस्थान की राजधानी विश्व का सर्वाधिक प्रदूषित शहर है’ ऐसी खबरें मीडिया में दिखती हैं, इसके कारण विश्व में हिंदुस्थान की थू-थू होती है। दिल्ली की जनता घर से बाहर निकल भी नहीं पाती है, ऐसी स्थिति बन जाती है। मुंह पर रूमाल या मास्क लगाए बगैर काम पर जाना संभव नहीं होता। मिट्टी और धूल की मोटी परत के कारण चार फुट के आगे कुछ भी दिखाई नहीं देता। स्कूल और विश्वविद्यालयों को छुट्टी देने की नौबत सरकार पर आ जाती है, ये एक प्रकार का लांछन ही है। अक्टूबर महीने में पंजाब, हरियाणा इन दिल्ली से लगे राज्यों के खेतों में फसल की खूंटी जलाई जाती है। इस दौरान दिल्ली की तरफ बढ़नेवाली हवा इस आग के धुएं से राजधानी को भर देती है। हर साल ऐसी भयंकर अवस्था दिल्ली पर आन पड़ती है फिर भी पंजाब, हरियाणा और दिल्ली सरकार के अधिकारी दमघोंटू प्रदूषण की तरफ घाग की तरह वैâसे देख सकते हैं? ऐसा सवाल सर्वोच्च न्यायालय में खड़ा हो तो इसमें गलत क्या है? दिल्ली देश की राजधानी है और इस राजधानी की जनता को जीने के लिए जरूरी सांस लेना संभव न होता हो तो इसे चिंताजनक कहना चाहिए। पर्यावरण स्वच्छता पुरस्कार और प्रदूषण पर नियंत्रण रखने के लिए युद्धस्तर पर की जानेवाली कोशिशें, इन दोनों विषयों पर केंद्र और राज्य सरकार स्तर पर सब कुछ अच्छा ही अच्छा है इसीलिए प्रदूषण की समस्या ने उग्र रूप धारण कर लिया है। पंजाब और हरियाणा के करीब २ लाख किसान फसल की खूंटी जलाते हैं। इन सभी किसानों पर नियंत्रण रखना कठिन है। इसके लिए विभाग बनाकर खेत में खूंटी जलाने की इजाजत दे दें तो प्रदूषण पर कुछ हद तक नियंत्रण रहेगा, ऐसा मुद्दा केंद्र सरकार के अटॉर्नी जनरल ने रखकर समय मांगने का प्रयत्न किया, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने नकार दिया। प्रदूषण की समस्या के लिए किसानों को नहीं बल्कि अधिकारियों को जिम्मेदार मानना चाहिए। किसान और सरकार के बीच कोई समन्वय नहीं दिख रहा है। ‘कल्याणकारी राज का मतलब तुम भूल गए हो इसके लिए तुम पर निलंबन की कार्रवाई ही करनी पड़ेगी’, ऐसी करारी फटकार तीनों राज्यों के मुख्य सचिवों को न्यायमूर्ति ने लगाई। न्यायमूर्ति मात्र अधिकारियों को फटकार लगाकर नहीं रुके बल्कि ‘सरकार लोगों के प्रति उत्तरदायी नहीं होगी तो उन्हें सत्ता में रहने का अधिकार नहीं है’, ऐसी तीखी टिप्पणी न्यायमूर्ति मिश्रा ने की। फसलों की खूंटी जलाने की बजाय उसे काटा क्यों नहीं जाता? खूंटी काटनेवाले यंत्र किसानों को क्यों उपलब्ध कराए नहीं जाते? विश्व के किसानों ने इतनी प्रगति की पर तुम्हें अपने किसानों की कोई कद्र है कि नहीं?, ऐसे कई सवाल सर्वोच्च न्यायालय ने उठाए हैं। किसी भी देश के लिए राजधानी उसकी नाक होती है लेकिन दिल्ली के वायु प्रदूषण ने देश की नाक ही काट दी है। पर्यावरण और स्वच्छता पर कई भाषण हुए पर प्रदूषण से हिंदुस्थान की राजधानी का दम घुटता होगा तो इन भाषणों के शाब्दिक बुलबुलों का क्या उपयोग है? हिंदुस्थान की सरकार दिल्ली में ही बैठती है। सत्ता का सिंहासन, संसद भवन, राष्ट्रपति भवन, विभिन्न देशों के दूतावास, दुनिया के राजदूत… क्या नहीं है दिल्ली में? उसी राजधानी दिल्ली के माथे पर विश्व के सबसे प्रदूषित शहर का कलंक लग रहा होगा तो ये प्रदूषण राष्ट्रीय शर्म का दूषण ही कहा जाना चाहिए! सर्वोच्च न्यायालय का संताप सत्ता के सिंहासन तक पहुंचेगा क्या?