" /> राष्ट्र निर्माण का संकल्प

राष्ट्र निर्माण का संकल्प

भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को सेवा-निवृत्ति के चार माह के भीतर राज्यसभा में नामजद कर देने की घटना ने एक नया इतिहास रचा है। इससे लोकतंत्र को नई ऊर्जा एवं नया परिवेश मिला है। राष्ट्रपति द्वारा नामजद किए जानेवाले १२ लोगों में से वे एक हैं। ऐसा नहीं है कि गोगोई के पहले कोई न्यायाधीश या सर्वोच्च न्यायाधीश सांसद नहीं बने हैं, वे बने हैं लेकिन गोगोई ऐसे पहले सर्वोच्च न्यायाधीश हैं, जो राष्ट्रपति की नामजदगी से राज्यसभा के सदस्य बने हैं। भारत के मुख्य न्यायाधीश का पद न्यायपालिका का सर्वोच्च पद है, अब गोगोई राज्यसभा के सदस्य बनकर राष्ट्र के निर्माण में पद एवं प्रतिष्ठा को महत्व न देते हुए उदारता का परिचय दिया है। वे एक ऐसी रोशनी की मीनार बने हंै, जो राजनीति को स्वार्थ नहीं, सेवा की एक मिसाल के रूप में प्रस्तुति देने को तत्पर हो रहे हैं।
भारत के लोकतंत्र में राज्यसभा की महत्वपूर्ण भूमिका है, संसद के इस उच्च सदन राज्यसभा में १२ सदस्यों का नामांकन राष्ट्रपति महोदय समाज के विभिन्न क्षेत्रों में उनकी विशिष्ट योग्यता व योगदान को ध्यान में रख कर करते हैं। एक तरह से वे राष्ट्र एवं समाज के नवरत्न होते हैं, जिनका चयन संविधान के संरक्षक राष्ट्रपति अपने स्व विवेक करते हैं और उनके इस निर्णय को संवैधानिक सभाएं शिरोधार्य करती हैं और कार्य को अधिक दक्ष व परिणाम मूलक बनाने का प्रयास करती हैं, जिससे देश के समग्र विकास में समयानुसार परिपक्वता आ सके। इनमें वैज्ञानिक से लेकर साहित्य, खेल, मनोरंजन, चिकित्सा, न्याय व सांस्कृतिक जगत से जुड़ी प्रतिभाएं तक शामिल होती हैं। बेशक राष्ट्रपति ने यह नामांकन ‘अपनी’ सरकार की सलाह पर ही किया है फिर भी जिसमें उनकी मौलिक सोच एवं परिपक्वता का ही परिचय मिलता है।
गोगोई द्वारा मुख्य न्यायाधीश पद से दिए गए पैâसलों से कांग्रेस के नेताओं के मतभेद हो सकते हैं परंतु राष्ट्रपति के पैâसले से उनका मतभेद वैâसे हो सकता है जिसे उन्होंने अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग करते हुए किया है? अतः परोक्ष रूप से कांग्रेस का गोगोई का विरोध राष्ट्रपति का विरोध ही समझा जाएगा, लोकतंत्र की मर्यादाओं एवं कार्यप्रणाली का ही विरोध कहा जाएगा। विरोध के स्वर तो अन्यत्र भी सुनाई दे रहे हैं, ऐसे स्वर जहां उभरते हैं, वहां सोच की मौलिक दिशाएं उद्घाटित नहीं होतीं। वहां राजनीतिक दलों में जड़ता, नैराश्य ही दिखाई देता है। वे स्वार्थी एवं संकीर्ण धारणाओं के आधार पर अपने को सिद्ध करते है। ऐसे राजनीतिक लोग असंतुष्ट कामनाओं एवं दमित आकांक्षाओं के कारण राष्ट्रहितों को भूल कर स्वयं के स्वार्थों पर केंद्रित हो जाते हैं। उनका आत्मविश्वास एवं मनोबल ढीला पड़ जाता हैं। आज लोकतंत्र को विरोध का शस्त्र नहीं बल्कि नवनिर्माण का रचनात्मक-सृजनात्मक संकल्प चाहिए।
देश के मुख्य न्यायाधीश पद की शोभा बढ़ाए रंजन गोगोई अब राज्यसभा की शोभा बनेंगे, यह तो लोकतंत्र के इतिहास की विरल घटना है, जिसका स्वागत होना चाहिए। उनके चयन पर प्रश्न खड़े करनेवालों को सोचना होगा कि पिछली मनमोहन सरकार के दौर में फिल्म अभिनेत्री रेखा की नामजदगी क्या सोच कर की गई थी? जब पं. जवाहर लाल नेहरू ने जब १९५२ में प्रख्यात वैज्ञानिक आइनस्टाइन के सहयोगी रहे भारतीय वैज्ञानिक सत्येंद्र नाथ बोस के साथ फिल्म अभिनेता पृथ्वीराज कपूर और हिंदी के मूर्धन्य कवि मैथिली शरण गुप्त को भी राज्यसभा में नामांकित कराया था तो पूरे भारत को लगा था कि संसद में नवरत्नों की बहार आ गई है, राष्ट्रपति के द्वारा १२ ऐसे ही नवरत्नों के चयन की परंपरा डाली गई थी ताकि उच्च-सदन में ऐसी प्रतिभाएं किन्हीं कारण वोट की राजनीति से वहां तक नहीं पहुंच पाए तो राष्ट्रपति उन्हें वहां पहुंचाए और देश उससे लाभान्वित हो। गोगोई की प्रधान न्यायाधीश पद पर नियुक्ति सर्वोच्च न्यायालय के नियमों के अनुसार की गई थी और इस पद पर बैठने के बाद उन्होंने जो निर्णय लिए उससे भारत मजबूत ही हुआ, वर्षों से चली आ रही लंबित समस्याएं निर्णय की स्थिति में पहुंचीं, इसके लिए उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। राज्यसभा में पहुंचकर वे अपनी क्षमताओं एवं योग्यताओं से भारत को मजबूती देंगे, इसमें किसी तरह का शंका नहीं हैं। उनके द्वारा किया गया न्याय भी ‘न्याय’ ही माना जाएगा। भले ही उनके अवकाश प्राप्त करने पर जिस तरह एक विशेष वर्ग उन्हें कठघरे में खड़ा करने की कोशिश कर रहा है उसी से सिद्ध होता है कि इन लोगों की दृष्टि केवल एक पक्ष को ही सोचती है, अपने स्वार्थ पर ही केंदित है। रामजन्म भूमि विवाद पर दिए गए पैâसले को लेकर गोगोई की आलोचना करने में यह वर्ग पीछे नहीं रहता। गोगोई का मुख्य न्यायाधीश का कार्यकाल हर दृष्टि से ऐतिहासिक एवं यादगार रहा। उन्होंने जितने भी पैâसले दिए हैं, जैसे राम मंदिर, सबरीमला, राफेल सौदा, सीबीआई और असम की जनगणना आदि वे सब ज्वलंत मुद्दे थे, उलझन भरे थे, समाधान ही राह ताक रहे थे, यह गोगोई की विशेषता, क्षमता एवं प्रतिभा ही कहीं जाएगी कि उन्होंने अपनी सूझबूझ से इन पर ऐतिहासिक निर्णय देकर अनिर्णय के धुंधलकों को छांटा एवं भारत को सुदृढ़ करने का प्रयत्न किया। ऐसे व्यक्ति के पास साहस के कदम और विवेक की आंख होती है। साहस चलता है और विवेक देखता है। उसकी चिंतन एवं कर्म यात्रा रूढ़ियों एवं जड़ता से प्रारंभ नहीं होती। वह अपने प्रत्येक निर्णय एवं कर्म को उचित-अनुचित के पैमाने से तौलकर आगे बढ़ता है। उसकी आंखों में उन्नत भारत के भविष्य के सपने तैरते हैं क्योंकि वह अपने समय से बहुत आगे की सोचता है और देखता है। भले ही उसकी बात को और उसके निर्णय को संकीर्ण एवं स्वार्थी सोच के लोग सहज स्वीकृति नहीं देते, कई वैचारिक एवं राजनीतिक संघर्ष जनमते हैं, पर धैर्य ऐसे व्यक्ति का कभी टूटता नहीं, सत्य विजयी बनता है। भले ही उनकी इस प्रभावी भूमिका के पारितोषिक के रूप में सरकार ने उन्हें राज्यसभा में लाए जाने का निर्णय किया है तो इसमें गलत क्या है? और गोगोई ने इसे सहज स्वीकृति दी है तो उसके निहितार्थ भविष्य के गर्भ में है, जिनके प्रकट होने पर रोशनी ही होनी है, धुंधलका नहीं। इसलिए गोगोई का राज्यसभा में गर्मजोशी के साथ स्वागत होना चाहिए था मगर ऐसा नहीं हो सका, यह विरोध करनेवालों के विवेक पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है। हमारे लोकतंत्र के लिए यह स्वर्णिम काल है कि हम लक्ष्यबद्ध होकर अपनी मौलिकता एवं राष्ट्र-निर्माण के संकल्प को उभरने का अवसर दे रहे हैं ताकि हमारी आंतरिक उपलब्धियों के नजदीक पहुंचा जा सके।