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राहत कम, आफत ज्यादा!

समस्याएं और चुनौतियां बताकर नहीं आती, बिना बुलाए आ धमकी हैं। कमोबेश, इस वक्त कुछ हो भी ऐसा ही रहा है। अप्रैल मई और जून ये तीन माह शादी-ब्याहों के नाम होते हैं। मांगलिक आयोजनों के लिहाज से बड़ा सीजन माना जाता है। बैंड-बाजे के शोर से सड़कें शाम के वक्त गुलजार होती हैं। पर, इस बार कोरोना संकट ने सब गुड़गोबर कर दिया है। शादियां हो जरूर रही हैं, मात्र पांच-दस बारातियों के बीच। कुछ इसी तरह मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल की पहली वर्षगांठ भी मनाई गई। तीस मई को मोदी सरकार-२ का पहला वर्ष पूरा हुआ। समाचार पत्रों में विज्ञापन भी नहीं छापा गया। दिल्ली में कोई बड़ा प्रोग्राम व जलसा भी आयोजित नहीं हुआ। भाजपा मुख्यालय में पूरी तरह सन्नाटा छाया रहा। दरअसल, इस वक्त मोदी सरकार तमाम चुनौतियों से घिरी हुई है। अर्थव्यवस्था डवांडोल हो गई है। सरकार के लिए फिलहाल गनीमत ये है कोई कहने-सुनने वाला नहीं है। समूचा विपक्ष गर्मी की तपिश और कोरोना संकट से पहले ही बेहाल है। एकाध दल हैं जो नाक में दम किए हुए हैं? बीते चार-पांच माह के दरमियान अर्थव्यवस्था की चाल बैलगाड़ी की रफ्तार से भी कम हो गई है। केंद्र सरकार के लिए अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना बड़ी चुनौती है।
केंद्र सरकार एक समस्या से निपट नहीं पाती, दूसरी आफत उसके सामने खड़ी हो जाती है। चीन से तनातनी हो, भूकंप का लगातार आना, टिड्डों की फड़फड़ाहट, कोरोना का संकट वहीं बेमौसम बारिश जैसी देशी और कुदरती समस्याओं ने चारों तरफ से घेर रखा है। दिल्ली में पिछले डेढ़ माह में पांचवी बार भूकंप के तगड़े झटके लगे। कोरोना संकट के बीच टिड्डियों ने भी केंद्र सरकार को सकते में डाल दिया है। शायद कभी किसी ने सोचा भी न होगा कि कीड़े-मकोड़े भी कभी ऐसी आफत बनेंगे जिससे सरकारों को हाई अलर्ट जारी करना पड़ेगा। कोरोना वायरस ने पहले से सभी को बेहाल किया हुआ अब रही सही कसर टिड्डियां निकाल रही हैं। पिछले सप्ताह टिड्डियों के आने की संभावना दिल्ली में जताई गई, तो सरकारी महकमा उन्हें भगाने में सतर्क हुआ। उत्तर प्रदेश का वह इलाका जो दिल्ली गेट से लिंक करता है, वहां दिल्ली सरकार के अधिकारियों ने डीजे और बैंड़-बाजों के साथ डेरा डाला। आदेश था, टिड्डियों को देखते ही डीजे को बजाना क्योंकि टिड्डियां ढोल की आवाज सुनकर भाग जाती हैं। दोपहर से लेकर रात हो गई, टिड्डियां नहीं आई। पता चला अधिकारियों को चकमा देकर दूसरे रास्तों से बाहरी दिल्ली में प्रवेश कर गईं।
दरअसल, टिड्डियों ने सबसे ज्यादा मुसिबतें किसानों के लिए खड़ी कर रखी हैं। किसानों ने भी कभी नहीं सोचा था कि उनका सामना विदेशी टिड्डियों से होगा। कोरोना वायरस ने पहले ही तबाही मचाई हुई है। टिड्डियां दिल्ली और उसके आसपास के इलाकों के अलावा कई राज्यों में परेशानी का सबब बनीं हुई है। वह खड़ी फसलों को चैपट कर देती हैं। इस वक्त खेतों में आम, कद्दू, खीरा, खरबूजा, तरबूज, लौकी, करेला व पान की फसलें लगी हैं टिड्डी दल उन्हें नुकसान पहुंचा रही हैं। टिड्डियां ने सबसे पहले दस्तक सदिर्‍यों में यानी जनवरी-फरवरी में दी थी। टिड्डियों का आगमन पांच-छह माह पहले सरहद पार पाकिस्तान से हुआ था। वहां से हिंदुस्थान पहुंची हजारों लाखों की तादाद में टिड्डियों ने बड़े पैमाने पर फसलों को बर्बाद करना शुरू कर दिया है। सबसे पहले बॉर्डर से सटे राज्यों राजस्थान, पंजाब और गुजरात में उत्पात मचाया। जहां कई एकड़ फसलों को नुकसान पहुंचाया। इस समस्या को एक तौर पर पाकिस्तान की साजिश भी नहीं कह सकते, क्योंकि वह खुद टिड्डियों से परेशान रह चुका है। अब जाकर उन्होंने राहत की सांस ली है। पाकिस्तान के पंजाब और सिंध प्रांतों के इलाके में हजारों एकड़ खड़ी फसलों को टिड्डियों ने चौपट करने के बाद हमारे यहां का रूख किया था।
दिल्ली स्थित पूसा कृषि संस्थान में टिड्डियों से मुकाबला करने के लिए स्प्रे मशीनों और दूसरे आधुनिक यंत्रों का तैयार किया गया है। कई राज्य सरकारों ने केंद्र सरकार से मदद मांगी है। टिड्डियां ने सबसे पहले गुजरात में तबाही मचाई थी। अनुमान के तौर पर सिर्फ दो जिलों के २५ हजार हेक्टेयर की फसल तबाह होने का आंकड़ा राज्य सरकार ने पेश किया है। टिड्डियों के आतंक को देखते हुए गुजरात सरकार ने प्रभावित किसानों को ३१ करोड़ रुपये मुआवजे का ऐलान किया है। वैज्ञानिकों की मानें तो इस किस्म की टिड्डी पांच महीने तक जीती है। इनके अंडों से दो सप्ताह में बच्चे निकल सकते हैं। वहीं, संयुक्त राष्ट्र के उपक्रम फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन के मुताबिक एक वर्ग किलोमीटर इलाके में आठ करोड़ टिड्डी हो सकती हैं। एक साथ चलने वाला टिड्डियों का एक झुंड एक वर्ग किलोमीटर से लेकर कई हजार वर्ग किलोमीटर तक फैल सकता है। पाकिस्तान से दिसंबर में हिंदुस्तान में जितनी संख्या में टिड्डियां आईं थीं, अब उनसे सौ गुना की वृद्वि हो चुकी है। इनके प्रजनन का सिलसिला लगातार जारी है।
केंद्र सरकार को जरूरी कदम उठाने होंगे? क्योंकि कुछ दिनों बाद मानसून का आगमन होने वाला है। किसान अपने खेतों में धान जैसी फसलों की रोपाई करेंगे। तब तक अगर ये आफत खत्म नहीं हुई तो किसानों के लिए खेती करने में दिक्कतें हो सकती हैं। केंद्र सरकार टिड्डियों के आतंक की समीक्षा करनी चाहिए। पूर्व में इन्होंने कई मुल्कों में तबाही मचाई हुई है। केन्या, इथियोपिया और सोमालिया टिड्डियों के आतंक से सबसे ज्यादा आहत हुए। वहां कई सालों तक टिड्डियों का आतंक रहा। इस समय जो टिड्डियां फसलों को बर्बाद कर रही हैं वह न पाकिस्तान की जन्मी हैं और न भारत की। अफ्रीका के इथियोपिया, युगांडा, केन्या, दक्षिणी सूडान से निकलकर ओमान होते हुए पाकिस्तान और उसके बाद हिंदुस्थान पहुंची हैं। शायद कोरोना संकट अभी खत्म होने वाला नहीं। इसलिए दूसरी समस्याओं पर भी केंद्र व राज्य सरकारों को ध्यान देना होगा।