राहत में दर्द-ए-दिल!, स्टेंट के घटते दाम से दोगुना हुआ इस्तेमाल

एक समय ऐसा था जब हृदय को रक्त पहुंचानेवाली धमनियां ब्लॉक हो जाती थीं तो ऑपेरशन कर स्टेंट डालने की बात सुनकर ही गरीब रोगियों के हाथ-पांव ठंडे पड़ जाते थे। इसका सबसे बड़ा कारण स्टेंट की लाखों में कीमत। सरकार ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए स्टेंट की कीमत पर अंकुश लगाया। देशभर के मशहूर हृदय रोग विशेषज्ञों द्वारा किए गए एक अध्ययन में पाया कि राज्य में स्टेंट के दाम घटने से दर्दे दिल को काफी राहत पहुंची है। इतना ही नहीं ‘ड्रग इल्यूटिंग स्टेंट’ (डीईएस) का इस्तेमाल दोगुना हो गया है और मरीजों की जिंदगी बहाल भी हो रही है।
बता दें कि २०१७ में सरकार ने देश में स्टेंट के दामों पर अंकुश लगाया था लेकिन महाराष्ट्र सरकार ने २०१४ में बेस्ट प्राइस टेंडर के माध्यम से डीईएस स्टेंट के दामों को कम करने के लिए योजना बनाई थी। नतीजतन विदेशों से आनेवाले महंगे डीईएस स्टेंट के दामों में ७० फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। महाराष्ट्र में उक्त पहल की सफलता को जांचने के लिए देश के सुप्रसिद्ध हृदय रोग विशेषज्ञों ने स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के सहयोग से एक सर्वे किया। इस अध्ययन में राज्य के ८७ निजी व सरकारी अस्पतालों में कुल २,२७४ मरीजों में से १,२१४ मरीज ऐसे हैं, जिनका इलाज २०१३ में किया गया था, जब स्टेंट के दाम अधिक थे जबकि १,०६० मरीज ऐसे हैं जिनका इलाज २०१५ के बाद हुआ, जब स्टेंट के दाम पर अंकुश लगाया गया। अध्ययन में यह बात सामने आई कि स्टेंट के दाम पर अंकुश लगाने के बाद डीईएस का इस्तेमाल ४०.७ फीसदी से बढ़कर ७१.३ फीसदी तक पहुंच गया है। निजी अस्पतालों में ३२.७ फीसदी से बढ़कर ६५.२ फीसदी और सरकारी अस्पतालों में ६९.६ फीसदी से बढ़कर ९६.२ फीसदी डीईएस का उपयोग अधिक होने की बात सामने आई है। अध्ययन में शामिल एम्स ऋषिकेश के हृदय रोग विभाग के डॉ. भानु दुग्गल ने बताया कि स्टेंट के दाम पर अंकुश लगने के बाद कम आय वाले मरीजों को काफी राहत पहुंची है। स्टेंट के दो प्रकार हैं, एक बेअर मेटल स्टेंट (बीएमएस) और दूसरा डीईएस है, जिसका रिजल्ट बीएमएस से काफी अच्छा है। फिलहाल सरकार स्टेंट के दामों में ४ फीसदी का इजाफा करने पर विचार कर रही है। शहर के डॉक्टरों की मानें तो यदि स्टेंट के दाम बढ़ते हैं तो मरीजों पर इसका भार पड़ेगा।