रेलवे का ‘सनकी’ राजतंत्र

शुरुआत एक कहानी से करना चाहता था, परंतु उसका उल्लेख आगे आवश्यकतानुसार करूंगा। पहले एक बड़ी खबर पर बात करते हैं। अगर आप देश के अपेक्षाकृत पिछड़े इलाकों में रहते हैं। गरीब-मध्यम वर्ग से हैं। समय और पैसों की बचत के लिए रात में भी यात्रा करते हैं और इसके लिए छोटी लाइन की ट्रेनों पर निर्भर हैं तो समझ लीजिए आपके ‘बुरे दिन’ आने वाले हैं। भारतीय रेलवे ने मीटरगेज सेक्शन की सभी रात्रिकालीन ट्रेनों का परिचालन बंद करने का फैसला लगभग ले लिया है। रात तो रात, दिन में भी छोटी लाइन की रफ्तार पर लगाम लगने जा रही है। यदि सब कुछ रेलवे के ‘राज’तंत्र के अनुसार हुआ तो देश के करीब ११ मीटरगेज रेल सेक्शन की ७३ रात्रिकालीन ट्रेनें बंद हो जाएंगी और दिन की ट्रेनों की रफ्तार घट जाएगी। यह सब इसलिए किया जा रहा है ताकि चौकीदार रहित क्रॉसिंग पर होने वाले हादसों पर अंकुश लग सके। हाल ही में एक अंग्रेजी दैनिक ने इस आशय की खबर प्रकाशित करके रेलवे के इस संभावित निर्णय की जानकारी दी है।
एक कहानी बचपन में कई बार पढ़ी और सुनी थी। ‘सनकी’ राजा की। बात बहुत पुरानी है, उस दौर की, जब जूते-चप्पल का आविष्कार नहीं हुआ था। एक राजा था। उसका बहुत बड़ा साम्राज्य था। तमाम मंत्रिगण थे। एक बार राजा अपने साम्राज्य का हाल जानने निकला। उसने नगर का विस्तृत भ्रमण किया। जब लौटा तो उसका बुरा हाल था। पैरों में छाले पड़ चुके थे। वो बुरी तरह दर्द से परेशान था। मंत्रिगणों ने जब राजा से परेशानी का कारण जानना चाहा तो राजा ने बताया कि उनके साम्राज्य में सड़कें काफी बुरे हाल में हैं। कंकड़-पत्थरों से भरी पड़ी हैं। वही वंâकड़-पत्थर पैरों में चुभते रहे। राजा ने मंत्रियों से इस समस्या के निराकरण का उपाय पूछा। तब सुधी मंत्रिगणों ने तमाम सड़कों की सफाई और रखरखाव का सुझाव दिया। राजा को जंच गया, उसने तत्काल उस पर अमल का आदेश दे दिया और इस तरह सड़क सफाई का जिम्मा राजतंत्र पर आ गया।
इस आधुनिक युग में भी भारतीय रेलवे के तमाम ‘राजा’ समय-समय पर यात्रियों के पैरों में चुभने वाली कंकड़-पत्थररूपी समस्याओं के समाधान के लिए इसी तरह आदेश देते रहे हैं, पर सवाल ये है कि वे कितने सार्थक सिद्ध हुए, उसका गंभीरता से आकलन उन्होंने कभी नहीं किया। इसका अर्थ ये नहीं है कि इस क्षेत्र में काम ही नहीं हुआ, पर उसे जिस रफ्तार से, जिस स्वरूप में होना चाहिए था, वैसा तो निश्चित ही नहीं हुआ है। रेलवे ने गत ३ वर्षों में ५,१५६ चौकीदार रहित लेवल क्रॉसिंग को खत्‍म किया है। अभी पिछले आर्थिक वर्ष २०१७-१८ में ही ऐसी १,५६५ क्रॉसिंग हटाई गर्इं। इसके लिए कर्मचारियों की नियुक्ति, सब-वे, मर्जर और क्‍लोजर किया गया। सेंट्रल और वेस्‍ट सेंट्रल जोन में अब एक भी मानवरहित लेवल क्रॉसिंग नहीं है। जिससे हादसों में कमी आई है। २०१३-१४ में ऐसी क्रॉसिंग पर ४७ एक्‍सीडेंट हुए थे, जो २०१७-१८ में घटकर १० रह गए। २०१४-१५ में ऐसे ५०, २०१५-१६ में २९ और २०१६-१७ में २० हादसे हुए थे यानी हकीकत यह है कि पिछले ५ वर्षों में इन क्रॉसिंग पर १५६ एक्‍सीडेंट हो चुके हैं। इस शर्मनाक सच को भुलाया नहीं जा सकता। कुशीनगर हादसे के बाद रेल मंत्री पीयूष गोयल ने आला अधिकारियों को इसी साल सितंबर तक १६ में से ११ रेल सेक्शन पर चौकीदार रहित क्रॉसिंग खत्म करने के आदेश दिए। शेष के लिए मार्च २०२० का टारगेट रखा। बहुआयामी रणनीति के तहत ओवरब्रिज, अंडरपास बनाने के अलावा कुछ क्रॉसिंग को बंद कर यातायात को दूसरी क्रॉसिंग की ओर डायवर्ट करने के आदेश थे, परंतु ये सब करने की बजाय रेलतंत्र ने छोटी लाइन के इन ११ सेक्शंस की नाइट ट्रेनें ही बंद करने का तुगलकी फैसला ले लिया। जब दावा चैकीदार रहित लेवल क्रॉसिंग को खत्म करने का था, तब ट्रेनें बंद करने का क्या औचित्य? सब जानते हैं कि इससे तो समस्या और विकट होगी। ये फैसला ‘सनकी राजा’ की सोच ही तो दर्शाता है। राजा ने भी सड़क सफाई का आदेश देने के कुछ दिनों बाद दोबारा नगर भ्रमण किया, यह देखने के लिए कि उसके आदेश पर कितना अमल हुआ है? कंकड़-पत्थर हटे या नहीं? जब इस बार भी राजा को निराशा ही हाथ लगी, उसके पैर बुरी तरह मिट्टी से सन गए, पैरों में फिर छाले पड़ गए। तब निराश राजा ने सरे दरबार मंत्रियों को कड़ाई से उपयुक्त उपाय सुझाने के आदेश दिए। चकराए मंत्रिगण कुछ सुझाते, उससे पहले ही राजा का साला, जिसे राजा ने रानी की सिफारिश पर मंत्री बनाया था, ने तपाक से सुझाव दे डाला कि क्यों न नगर की तमाम सड़कों को चमड़े से पटवा दें। चूंकि सुझाव राजा के साले का था इसलिए अन्य मंत्रियों ने उसे काटने की हिम्मत नहीं दिखाई। वैसे भी उस वक्त किसी को कोई पर्याय सूझ भी नहीं रहा था। राजा ने सबकी चुप्पी को उनकी सहमति मान लिया और साले के सुझाव पर हामी भर दी। इस तरह सड़कों को चमड़े से ढंकने का बिना विचारे ही आदेश पारित हो गया। भारतीय रेलवे के नीतिकर्ताओं के मामले में भी ऐसे ही विवेकहीन फैसलों की कड़ी है। रेलवे का ‘राजतंत्र’ भी समस्या समाधान का यही पैमाना समय-समय पर अपनाता है। ११/७, २००६…। मुंबई की लोकल ट्रेनों में शृंखलाबद्ध बम धमाके हुए थे। तब २०९ यात्रियों की जानें गई थीं। ७०० से ज्यादा घायल हुए थे। ऐसे में मुंबई लोकल की सुरक्षा को लेकर जब सवाल उठे तो रेलवे ‘राज’तंत्र ने खानापूर्ति के लिए मेटल डिटेक्टर, चेकिंग डेस्क और सीसीटीवी कैमरों के अलावा वही ‘साले वाले सुझाव’ की तर्ज पर सबर्बन ट्रेनों में लगे लगेज रैक्स को ही निकलवाने का काम शुरू कर दिया, जिन पर लोकल यात्री अपना सामान रखते थे। चूंकि आतंकवादियों ने बम सामान में छिपाकर ही लगेज रैक्स पर रखे थे, इसलिए रेलवे के राजतंत्र ने ‘न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी’ वाला पैâसला कर लिया। जब लगेज रैक्स ही नहीं होंगे तो कोई बम कहां से रखेगा? यात्रियों के भारी विरोध के बाद लगेज रैक्स दोबारा लगाए गए। सुरक्षा एजेंसियों का सुझाव मान कर रैक्स हटाते समय रेल के ‘राज’तंत्र ने ये विचार तक करने की जरूरत नहीं समझी कि खचाखच भर कर चलने वाली लोकल में यात्री अपना सामान कहां रखेंगे? इससे और कितनी समस्याएं खड़ी होंगी? यात्रियों में कितने विवाद होंगे? और सबसे महत्वपूर्ण यह कि रैक्स हट जाने से आतंकवादियों के लिए पर्याय खत्म हो जाएंगे क्या? वगैरह… वगैरह…
‘सनकी राजा’ ने भी अपने साले का सुझाव मानते वक्त ऐसे किसी दुष्परिणाम पर विचार ही नहीं किया था। जैसे सड़के ढंकने में लगने वाले चमड़े के लिए कितने पशुओं का कत्ल होगा? पशु धन के नुकसान की भरपाई कैसे होगी? पशु शक्ति और दुग्ध संपदा का भारी अभाव होगा? अत्यधिक पशु वध से महामारी फैलेगी? और इन सबमें कितना धन और समय व्यर्थ होगा? और अंत में वही महत्वपूर्ण सवाल कि क्या इससे समस्या हल हो जाएगी? ऐसे तमाम मुद्दों पर राजा ने विचार किया होता तो वो तुगलकी फैसला नहीं लिया होता और उसने सार्थक व नीति संगत पर्यायों पर विचार किया होता।
आज अरसे बाद रेलवे के मीटरगेज संबंधी निर्णय द्वारा ‘साले के सुझाव’ की पुनरावृति होने जा रही है। किसलिए? ताकि मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग के मसले पर खानापूर्ति हो सके, फिर उससे गरीबों की भले ही ‘खानाबंदी’ ही क्यों न हो जाए, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। मीटरगेज की ट्रेनें खासकर उन क्षेत्रों में चलती हैं, जहां अपेक्षित विकास नहीं हुआ है। वहां के लोग अब भी रेलवे पर ही निर्भर हैं। छोटी लाइन का महत्व मैं भली-भांति जानता हूं। मेरा गांव-ननिहाल उत्तर प्रदेश के जिस क्षेत्र में बसा है, वहां अभी पिछले दिनों तक मीटरगेज की ट्रेनें ही चला करती थीं। अभी तक वहां ब्रॉडगेज का सुगम परिचालन शुरू नहीं हो पाया है, जिसका खामियाजा लोग आज भी भुगत रहे हैं। बचपन से लेकर अब तक उस आगरा फोर्ट-मथुरा-कानपुर-लखनऊ सेक्शन पर मैंने सफर किया है। तब इस पर बनारस को जोधपुर से जोड़नेवाली मीटरगेज की रानी ‘मरुधर एक्सप्रेस’ फर्राटे से दौड़ा करती थी। मेरी ननिहाल के दूसरी और टूंडला-एटा सेक्शन भी मीटरगेज ही है इसलिए इन सेक्शन्स पर चलनेवाली सीमित ट्रेनों का महत्व मैं बेहतर जानता हूं। सुबह, दोपहर और शाम की ट्रेनों के लिहाज से कैसे लोगों का टाइम टेबल चलता है, मैंने देखा है। रेल की धड़धड़ में उनकी धड़कन को मैंने सुना है। नौकरी, पढ़ाई, कारोबार, बाजार सब उन्हीं के आधार पर तय होता है। लंबी दूरी की यात्रा या दूरदराज के शहरों की कनेक्टिंग यात्रा भी छोटी लाइन पर चलनेवाली दिन-रात की ट्रेनों पर ही निर्भर होती है। वहां का सीमित जीवनतंत्र पूरी तरह छोटी लाइन पर ही निर्भर होता है। ऐसे में उनकी ‘छोटी’ सहूलियतों पर लगाम लगाकर रेलवे उनके ‘बड़े’ अर्थतंत्र का चक्का ही जाम करने जा रही है। ये सोचे बिना कि इससे उन यात्रियों को कितनी तकलीफ होगी? उन्हें इसका कितना खामियाजा भुगतना पड़ेगा? उनका कितना समय और पैसा बर्बाद होगा? निश्चित तौर पर कुशीनगर हादसे के बाद रेलवे को चौकीदार रहित क्रॉसिंग पर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करने चाहिए, ताकि इन क्रॉसिंग पर होनेवाली मौतें रुक सकें, परंतु वे इंतजाम इस तरह के होंगे? इस बारे में देश के किसी व्यक्ति ने शायद ही कभी सोचा होगा। रेलतंत्र द्वारा क्या खास तरह की ट्रेनों का परिचालन ही रोक देना समस्या का समाधान है? क्या समस्या की जड़ केवल मीटरगेज ही है? चंद मीटरगेज की ट्रेनों को रोक देने से क्या हासिल होगा? ये प्रश्न आम इंसान के दिमाग में आना स्वाभाविक है।
ये ठीक उसी तरह है जैसे राजा का आदेश पारित होते ही मंत्रियों ने राज चर्मकार को इस पर अमल करने की हिदायत दे दी। बिना दिमाग खर्च किए कि इससे लाभ होगा या हानि? हालांकि ‘सनकी राजा’ का चर्मकार सयाना था, मंत्रियों की तरह बेपरवाह नहीं। उसने आदेश पालन के लिए कुछ दिन का समय मांगा। फिर तय दिन वो दरबार में पहुंचा। जब राजा ने उससे पूछा कि ‘क्या तुमने सड़कों को ढंकने के लिए आवश्यक इंतजाम कर लिए हैं?
तब उस चर्मकार ने राजा से माफी मांगते हुए आग्रह किया कि ‘महाराज मैं आपसे एक गुजारिश करना चाहता हूं।’ राजा ने जब उससे पूछा कि ‘वह क्या है।’ तो चर्मकार ने अपने झोले से एक जोड़ी बढ़िया जूते निकालकर राजा के पैरों के सामने रख दिए और राजा से विनती की कि वे उसे अपने पैरों में पहन लें। राजा समझा नहीं, फिर भी उसने चर्मकार की बात को मानकर जूते पहन लिए। अब चर्मकार ने राजा से गुजारिश की कि वे नगर का एक चक्कर काटकर आएं। राजा ने वैसा ही किया। जब राजा लौटकर आए तो उनके चेहरे पर समाधान था। उन्हें कोई चुभन महसूस नहीं हुई। सड़कों की शिकायत नहीं रही। उनका भ्रमण बहुत ही आरामदायक रहा। तब चर्मकार ने उनसे जूते उतारने का आग्रह किया। राजा ने जूते उतारे तो देखा कि उनके पैर पर मिट्टी का एक कण भी नहीं था। राजा आश्चर्यचकित थे। उन्हें चर्मकार की चतुराई समझते देर नहीं लगी। पहली बार उन्हें उनके मंत्रिगणों से इतर एक साधारण व्यक्ति ने उत्तम सुझाव दिया था। पूरी सड़कों को चमड़े से ढंकने की बजाय अपने पैरों को चमड़े के एक छोटे से टुकड़े से ढंक लेने से पूरी समस्या का ही निराकरण हो गया था। तमाम अनहोनियां टल गई थीं।
आज रेलवे को भी ऐसे ही साधारण उपाय की जरूरत है। ‘सनकी राजा’ जब समझदारी का निर्णय ले सकता है तो समझदार रेलवे क्यों नहीं? वर्ना उसके तुगलकी फैसले से विकास की रफ्तार धीमी पड़ जाएगी, जिसका असर देश में करीब १,००० किमी मीटरगेज सेक्शन पर पड़ेगा। रेलवे के राजतंत्र को समझना चाहिए कि ६८,००० किलोमीटर में मात्र १,००० किलोमीटर का मीटरगेज बड़ा खतरा नहीं है, बल्कि ब्रॉडगेज है। जहां अंडरपास और ओवरब्रिज बनने तक फौरी तौर पर कुछ और भी समाधान हो सकते हैं। पूरे नेटवर्क की ‘चमड़ी’ उधेड़ने की बजाय क्रॉसिंग पर हादसे रोकने के तकनीक सम्मत पर्याय खोजे जा सकते हैं। तकनीक की मदद से ‘बीपर’ और ‘सिग्नल’ प्रभावी ढंग से लग सकते हैं। ट्रेन आगमन के चंद किलोमीटर पहले से ही जो तेजी से बजने और चमकने लगें। ट्रेन के एकदम नजदीक आने पर ‘लेवल क्रॉसिंग अवेयरनेस सिस्टम’ इस्तेमाल हो सकता है। गेट मित्रों को और सक्रिय करने के लिए जीपीएस ट्रेकर का प्रभावी इस्तेमाल हो सकता है। तकनीक की मदद से ‘ऑटो ऑपरेटेड गेट’ लगाए जा सकते हैं। जिन्हें सेंट्रली ऑपरेट किया जा सके। आज तकनीक उस दौर में है, जहां ड्राइवरलेस मेट्रो चलाई जा रही है, तो क्या चौकीदार रहित क्रॉसिंग का सर्विलांस और ऑपरेशन कंट्रोल सेंट्रर से नहीं किया जा सकता हर ट्रेन की समय और स्थिति का अंदाजा उन्हें होता ही है। इसके अलावा जिला पंचायत और नगरपरिषद स्तर पर सामंजस्य बिठाकर उनके क्षेत्रों की चौकीदार रहित क्रॉसिंग पर निगरानी का काम साझा किया जा सकता है। आखिर रेलवे उन्हीं के क्षेत्रों को विकास की कनेक्टिविटी देती है। लिहाजा उसके सुचारु परिचालन और उन क्षेत्रों के लोगों की सुरक्षा का जिम्मा कुछ हद तक उन पर भी है। इससे रोजगार सर्जन भी होगा और आपदा पर अंकुश भी लगेगा। फिर उसे नियोजित करने में रुकावट कैसी?
भारतीय रेलवे के विशाल नेटवरेक पर ५,७९२ चौकीदार रहित रेलवे क्रॉसिंग अब भी हैं। इनमें से मात्र १,१३५ मीटरगेज पर और १,१७८ नैरोगेज (बेहद छोटी लाइन) पर हैं यानी अधिकांश ३,४७९ ब्रॉडगेज पर ही हैं। स्पष्ट है कि ऐसी क्रॉसिंग पर हादसों का सबसे ज्यादा खतरा ब्रॉडगेज पर है। रेलवे को भी पता है कि ब्रॉडगेज पर मीटरगेज की तुलना में ज्यादा खतरनाक क्रॉसिंग हैं। कुशीनगर का रेल हादसा भी ब्रॉडगेज सेक्शन पर ही हुआ था, जिसमें १३ मासूम स्कूली बच्चों की मौत हो गई थी। इसलिए सवाल यह है कि ब्रॉडगेज के हादसे कैसे रुकेंगे? क्या ब्रॉडगेज के इर्द-गिर्द के लोग लापरवाही नहीं बरतते? अगर ऐसा था तो फिर कुशीनगर का हादसा कैसे हुआ? जब मर्ज ब्रॉडगेज का बड़ा है तो तुगलकी इलाज मीटरगेज पर ही क्यों?