रेलवे की ‘टेरिटोरियल आर्मी’ भी है जोश में

जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में १४ फरवरी २०१९ को सीआरपीएफ जवानों के काफिले पर हुए आतंकी हमले का बदला कल हिंदुस्थान ने पाकिस्तान से ले लिया। भारतीय वायु सेना के लड़ाकू विमानों ने एलओसी के पार जाकर ‘जैश-ए-मोहम्मद’ के आतंकी वैंâपों को ध्वस्त कर दिया। इस जवाबी कार्रवार्ई में लगभग ३५० आतंकवादियों के मारे जाने की खबर है। इस हमले के बाद रेलवे की ‘टेरिटोरियल आर्मी’ भी जोश में आ गई है। रेलवे के स्टाफ को ‘आर्मी ट्रेनिंग’ दी जाती है, जिसे टेरिटोरियल आर्मी कहा जाता है।
बता दें कि रेलवे के स्टेशन मास्टर और अन्य रेल कर्मचारियों को बतौर रेलवे स्टाफ हर साल डिफेंस की ट्रेनिंग दी जाती है। यह ट्रेनिंग ४२ वर्ष की आयु से पहले लेनी होती है। रेलवे के अधिकारियों के अनुसार साल के १२ महीनों में से १ महीने ‘टेरिटोरियल आर्मी’ की ट्रेनिंग दी जाती है। इस ट्रेनिंग में स्टेशन मास्टर सहित अन्य रेलवे स्टाफ को ग्रेनेट फेंकना, एके-४७ रायफल चलाने सहित विभिन्न किस्म के हथियार चलाने की ट्रेनिंग दी जाती है। ट्रेनिंग का सारा खर्च आर्मी उठाती है। बाकायदा एक महीने का वेतन भी रेलवे स्टाफ को ‘रेलवे’ और ‘टेरिटोरियल आर्मी’ की ओर से दिया जाता है। यह ट्रेनिंग कोटा के आर्मी कैंप में दी जाती है। ‘टेरिटोरियल आर्मी’ का मुख्य मकसद है कि जब भी देश पर कोई आपदा आए और सरहद पर जवानों की कमी पड़े तो ‘टेरिटोरियल आर्मी’ को मोर्चा संभालने के लिए कभी भी बुलाया जाता है। ‘टेरिटोरियल आर्माr’ की ट्रेनिंग ले चुके कई स्टेशन मास्टर और रेलवे स्टाफ से ‘दोपहर का सामना’ ने बात की तो पता चला कि सरहद पर जिस तरह का माहौल पैदा हुआ है और हमारे सीआरपीएफ के ४० जवान शहीद हुए हैं, उनका बदला लेने के लिए पूरे जोश से ‘टेरिटोरियल आर्मी’ की ट्रेनिंग ले चुके स्टेशन मास्टर तैयार हैं। एक स्टेशन मास्टर ने बताया कि उन्हें दुख है कि उन्होंने ‘टेरिटोयिल आर्मी’ की ट्रेनिंग नहीं की है। उनका कहना है कि इस ट्रेनिंग के बारे में उन्हें शुरुआत में पता नहीं था, जब पता चला तब उनकी उम्र ४८ हो चुकी थी। उन्होंने बताया कि आज मुझे दुख हो रहा है कि मैं इस आर्मी का हिस्सा नहीं बन पाया।