रैगिंग से हर पांचवां पीड़ित मेडिकल का छात्र, मुंबई से भी गई शिकायतें

महाराष्ट्र में रैगिंग का शिकार होनेवाला हर पांचवां छात्र मेडिकल कॉलेज से होने की बात सामने आई है। हाल ही में रैगिंग के चलते २६ वर्षीय डॉ. पायल तड़वी ने सुसाइड किया था। ऐसे में उक्त आंकड़े साफ दर्शाते हैं कि मेडिकल कॉलेजों में रैगिंग अब भी जारी है और छात्र इसका शिकार हो रहे हैं। डॉक्टरों की मानें तो प्रभावी निवारण प्रणाली न होने और कड़ी कार्रवाई न होने के कारण रैगिंग अब भी जारी है।
बता दें कि एंटी रैगिंग से निपटने के लिए नेशनल एंटी-रैगिंग टोल फ्री नंबर १८००-१८०-५५२२ जारी किया गया था। वर्ष २०१२ से लेकर ७ जून २०१९ उक्त टोल प्रâी नंबर पर महाराष्ट्र से रैगिंग की कुल २४८ शिकायतें दर्ज करवाई गई हैं। गौर करनेवाली बात यह है कि ४३ शिकायतें मेडिकल कॉलेजों से आई थीं, जिनमें ३ शिकायतें नायर, २ एमजीएम, एक केईएम और एक सायन अस्पताल व मेडिकल कॉलेज से की गई थी। हेल्पलाइन नंबर के प्रभारी राजेंद्र कचरू ने कहा कि अन्य कॉलेजों की तुलना में मेडिकल कॉलेजों में छात्र कम होने के बावजूद रैगिंग का प्रमाण ज्यादा है। राज्य में ४०,००० कॉलेज व ५०० मेडिकल कॉलेज हैं। इसके बावजूद अन्य कॉलेजों में रैगिंग का प्रमाण ०.५ प्रतिशत है जबकि मेडिकल कॉलेजों में रैगिंग का प्रमाण १० से १५ प्रतिशत है। दुख की बात यह है कि मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया इस कुप्रथा को खत्म करने के लिए असफल रही है। मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. सागर मूंदड़ा ने बताया कि मेडिकल की पढ़ाई काफी लंबी, कठिन और काम का भार भी छात्रों पर अधिक होता है। ऐसे में कुछ छात्र भावनात्मक रूप से टूट जाते हैं और फिर अपनी नकारात्मकता जाहिर करने के लिए वे रैगिंग करते हैं। शहर के जानेमाने डॉक्टर का यह कहना है कि इस कुप्रथा को रोकने के लिए सरकार व प्रशासन को कोई पुख्ता और सख्त कदम उठाना होगा, नहीं तो लोग इसका शिकार होते रहेंगे।