रोमांचक होती है अमरनाथ यात्रा

महान हिमालय की गोद में प्रकट होनेवाले पवित्र शिवलिंग के दर्शन की श्रीअमरनाथ यात्रा शुरू हो गई है। जिसने कभी अमरनाथ की रोमांचक यात्रा नहीं की, वह धरती के स्वर्ग के खास आनंद से वंचित रह गया। दरअसल, तमाम असुविधाओं, बाधाओं और खतरों के बावजूद मॉनसून के दौरान दो महीने चलनेवाली यह यात्रा सुखद एहसास होती है। दरअसल, सरकार की उपेक्षा के बावजूद श्रद्धालुओं का उत्साह कम नहीं होता। अब तो अमरनाथ यात्रा धार्मिक यात्रा से बढ़कर राष्‍ट्रीयता का प्रतीक बन गई है। हिमालय की गोद में स्थित अमरनाथ हिंदुओं का सबसे ज्यादा आस्थावाला पवित्र तीर्थस्थल है। पवित्र गुफा श्रीनगर के उत्तर-पूर्व में १३५ किलोमीटर दूर समुद्र तल से १३ हजार फीट ऊंचाई पर है। गुफा की लंबाई (भीतरी गहराई) १९ मीटर, चौड़ाई १६ मीटर और ऊंचाई ११ मीटर है। इस्की ख़ासियत गुफा में बर्फ से नैसर्गिक शिवलिंग का बनना है। प्राकृतिक हिम से बनने के कारण ही इसे स्वयंभू ‘हिमानी शिवलिंग’ या ‘बर्फानी बाबा’ भी कहा जाता है। गुफा में ऊपर से बर्फीले पानी की बूंदें टपकती रहती हैं। यहीं पर ऐसी जगह है, जहां टपकनेवाली हिम बूंदों से करीब दस पुâट ऊंचा शिवलिंग बनता है। चंद्रमा के घटने-बढ़ने के साथ-साथ बर्फ के लिंग का आकार भी घटता-बढ़ता रहता है। सावन की पूर्णिमा को यह पूर्ण आकार में हो जाता है और अमावस्या तक धीरे-धीरे छोटा हो जाता है। हैरान करनेवाली बात है कि शिवलिंग ठोस बर्पâ का होता है जबकि आसपास कच्ची और भुरभुरी बर्फ होती है। भगवान शिव के प्रमुख धार्मिक स्थल अमरनाथ को तीर्थों का तीर्थ कहा जाता है। मान्यता है कि यहीं शिव ने पार्वती को अमरकथा सुनाई थी, जिसे सुनकर सद्योजात शुक-शिशु शुकदेव ऋषि के रूप में अमर हो गए। गुफा में आज भी कबूतरों का जोड़ा दिखाई देता है, जिन्हें अमर पक्षी कहते हैं। मान्यता है कि जिन श्रद्धालुओं को कबूतरों जोड़ा दिखाई देता है, उन्हें शिव-पार्वती का दर्शन और मोक्ष हासिल होता है। यह भी माना जाता है कि भगवान शिव ने ‘अनीश्‍वर कथा’ पार्वती को गुफा में सुनाई थी इसीलिए गुफा बहुत पवित्र मानी जाती है। कई विद्वानों का मत है कि शंकर जब पार्वती को अमरकथा सुनाने ले जा रहे थे तो छोटे-छोटे अनंत नागों को अनंतनाग में छोड़ा, माथे के चंदन को चंदनबाड़ी में उतारा, अन्य पिस्सुओं को पिस्सू टॉप पर और गले के शेषनाग को शेषनाग स्थल पर छोड़ा था। अमरनाथ गुफा का सबसे पहले पता सोलहवीं शताब्दी के पूर्वाध में एक मुसलमान गड़ेरिए बूटा मलिक को चला था। आज भी चौथाई चढ़ावा बूटा मलिक के वंशजों को मिलता है। यह एक ऐसा तीर्थस्थल है जहां फूल-माला बेचनेवाले मुसलमान होते हैं।
अमरनाथ जाने के दो मार्ग हैं। पहला पहलगाम और दूसरा सोनमर्ग बालटाल से। जम्मू या श्रीनगर से पहलगाम या बालटाल सड़क मार्ग से पहुंचना पड़ता है। आगे पैदल जाना पड़ता है। श्रीनगर से पहलगाम ९६ किलोमीटर दूर है। यह देश का मशहूर पर्यटनस्थल भी है। यहां नैसर्गिक सौंदर्य देखते ही बनता है। लिद्दर और आरू नदियां इसकी ख़ूबसूरती में चार चांद लगाती हैं। पहलगाम का यात्री बेस वैंâप छह किलोमीटर दूर नुनवन में बनता है। पहली रात भक्त यहीं बिताते हैं। दूसरे दिन यहां से १० किलोमीटर दूर चंदनबाड़ी पहुंचते हैं। चंदनबाड़ी से आगे इसी नदी पर बर्फ का पुल है। यहीं से पिस्सू घाटी की चढ़ाई शुरू होती है। कहा जाता है कि समुद्रतल से ११,१२० ़पुâट ऊंचा पिस्सू घाटी में देवताओं-राक्षसों के बीच घोर लड़ाई हुई जिसमें राक्षस हार गए। पिस्सू घाटी के बाद अगला पड़ाव १४ किलोमीटर दूर शेषनाग में पड़ता है। लिद्दर नदी के किनारे पहले चरण की यात्रा बहुत कठिन होती है। यह मार्ग खड़ी चढ़ाई वाला है। शेषनाग पहुंचने पर ठिठुरन भरी ठंड से सामना होता है। यहां पर्वतमालाओं के बीच नीले पानी की खूबसूरत झील है। इसमें झांकने पर भ्रम होता है कि आसमान झील में उतर आया है। झील करीब डेढ़ किलोमीटर व्यास में फैली है। कहते हैं कि इस झील में शेषनाग का वास है। २४ घंटे में शेषनाग एक बार झील के बाहर निकलते हैं, लेकिन दर्शन खुशनसीबों को मिलता है। तीर्थयात्री यहां रात्रि विश्राम करते हैं और तीसरे दिन की यात्रा पर चलते हैं।
शेषनाग से पंचतरणी १२ किलोमीटर दूर है। बीच में बैववैल टॉप और महागुणास दर्रे पार करने पड़ते हैं, जिनकी समुद्रतल से ऊंचाई क्रमश: १३,५०० पुâट व १४,५०० पुâट है। महागुणास चोटी से पंचतरणी का सारा रास्ता उतराई का है। यहां पांच छोटी-छोटी नदियों बहने के कारण ही इसका नाम पंचतरणी पड़ा। यह जगह चारों तरफ से पहाड़ों की ऊंची-ऊंची चोटियों से ढंकी है। ऊंचाई की वजह से ठंड भी बहुत ज्यादा होती है। ऑक्सीजन की कमी की वजह से तीर्थयात्रियों को यहां सुरक्षा के इंतजाम करने पड़ते हैं। पवित्र गुफा यहां से केवल आठ किलोमीटर दूर रह जाती है। रास्ते में बर्फ ही बर्फ जमी होती है। रास्ता काफी कठिन जरूर है, लेकिन गुफा में पहुंचते ही सफर की सारी थकान पल भर में छू-मंतर हो जाती है।
दरअसल, जब चंदनबाड़ी या बालटाल से श्रद्धालु निकलते हैं तो रास्ते भर उन्हें प्रतिकूल मौसम का सामना करना पड़ता है। पूरा बेल्‍ट यानी चंदनबाड़ी, पिस्‍सू टॉप, जोली बाल, नागा कोटि, शेषनाग, वारबाल, महागुणास टॉप, पबिबाल, पंचतरिणी, संगम टॉप, अमरनाथ, बराड़ी, डोमेल, बालटाल, सोनमर्ग और आसपास का इलाका साल के अधिकांश समय बर्पâ से ढंका रहता है। इससे इंसानी गतिविधियां महज कुछ महीने रहती हैं। बाकी समय यहां का मौसम इंसान के रहने लायक नहीं होता। गर्मी शुरू होने पर यहां बर्फ पिघलती है और अप्रैल से यात्रा की तैयारी शुरू की जाती है। पवित्र गुफा की ओर जानेवाले श्रद्धालुओं के लिए चंदनबाड़ी से अमरनाथ और बालटाल के बीच ठहरने या विश्राम करने का कोई ठिकाना नहीं है। ३० किलोमीटर से अधिक लंबे रास्‍ते में अकसर तेज हवा के साथ भारी बारिश होती रहती है और श्रद्धालुओं के पास भीगने के अलावा कोई विकल्‍प नहीं होता। बचने के लिए कहीं कोई शेड नहीं है, सो बड़ी संख्‍या में लोग बीमार भी हो जाते हैं। यही वजह है कि कमजोर कद-काठी के यात्री शेषनाग की हड्डी ठिठुराने वाली ठंड सहन नहीं कर पाते और उनकी मौत तक हो जाती है। इसीलिए मेडिकली अनफिट लोगों को यात्रा पर न जाने की सलाह दी जाती है।
लोगों की बढ़ती भीड़ को देखकर सन् २००० में श्रीअमरनाथ श्राइन बोर्ड की स्‍थापना की गई। श्रद्धालुओं की कठिनाइयों को दूर करने के लिए केंद्र के आग्रह पर ग़ुलाम नबी आजाद सरकार ने २६ मई २००८ को श्रीअमरनाथ श्राइन बोर्ड को बालटाल के पास डोमेल में वन विभाग की ८०० कनाल यानी ४० हेक्‍टेयर जमीन आवंटित की थी ताकि यात्रियों की सुविधा के लिए अस्थायी शिविर यानी टेंपररी शेड बनाए जा सकें। प्रस्‍तावित शेल्‍टर में नहाने, खाने और रात में ठहरने की सु‍विधा होनी थी। बदले में २.५ करोड़ रुपए का मुआवजा भी तय किया गया था। दरअसल, पहले मामला जम्‍मू–कश्‍मीर हाईकोर्ट में गया, जहां अदालत ने साफ कहा कि यात्रियों की सुविधा के लिए प्रीपैâब्रिकेटिड हट बनाए जाएं और अन्य सुविधाएं दी जाएं। लेकिन पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी और अलगाववादी नेताओं ने जमीन हस्तांतरण का विरोध किया। इनकी शह पर श्रीनगर में हिंसा हुई थी। लिहाजा, पहली जुलाई २००८ को जमीन आवंटन रद कर दिया गया। इस तरह अमरनाथ की कठिन यात्रा पर जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए उनके अपने देश में शिविर बनाने का सपना साकार नहीं हो सका। वैसे अस्थायी शेड की जरूरत बालटाल ही नहीं, डोमेल, संगम टॉप, अमरनाथ, पंचतरिणी, पिस्‍सू टॉप, चंदनबाड़ी और नुनवन में भी है क्‍योंकि कपड़े के जो टेंट बनाए जाते हैं, उसमें श्रद्धालु भीग जाते हैं।
बेहतरीन मेहमाननवाजी के लिए मशहूर कश्‍मीरी आवाम जागरूक और संवेदनशील रही है। उसी अवाम की तहज़ीब और डेमोग्राफी केवल ४० हेक्‍टेयर जमीन श्राइन बोर्ड को देने से से खतरे में पड़ गई थी। होना तो यह चाहिए था कि मुस्लिम बाहुल्‍य राज्‍य होने के नाते कश्‍मीरी लीडरशिप को एकमत से ज़मीन देने के पैâसले को मानना चाहिए था क्‍योंकि यह पूरी दुनिया के करोड़ों हिंदुओं के आस्‍था का सवाल था। यह भी कटु सच है कि राज्‍य केंद्र की मदद के बिना एक दिन भी सरवाइव नहीं कर सकता। राज्‍य के सालाना बजट में राज्‍य का योगदान महज १४ फीसदी होता है। कर्मचारियों का पूरा वेतन केंद्र वहन करता है, जो पूरे देश के टैक्सपेयर्स का पैसा होता है। जिस राज्य के लिए देश की जनता इतना कुछ करती है, उसी श्रद्धालुओं के लिए अस्थायी सेल्टर नहीं बनाने दिया गया। यह सुनकर हैरानी और दुख होता है। होना तो यह चाहिए कि हर जगह श्रद्धालुओं के लिए व्यवस्था हो। हिंदुस्थान में हर धर्म के लोग रहते हैं, हिंदू हो, मुसलमान हो, सिख हों या ईसाई हों, केंद्र या राज्‍य सरकारें सभी महत्‍वपूर्ण धर्मथलों पर बुनियादी सुविधा उपलब्‍ध कराने के लिए कश्‍मीर से कन्‍याकुमारी और गुजरात से बंगाल तक कहीं भी जमीन आवंटित करने का अधिकार होना चाहिए ताकि जो लोग कहीं जाते हैं, उन्हें बेहतर सुविधाएं दी जा सकें। क्या इस बार यह सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी?