रोशनी को है मदद की आस

रोशनी का जिक्र होते ही हमारी आंखों में सबसे पहले सूर्य, लाइट या फिर दीये का चित्र उभरता है। लेकिन माहिम स्टेशन के बाहर अपने परिवार की क्षुधापूर्ति के लिए गजरा बेचकर थोड़ा-बहुत पैसा कमानेवाली १२ वर्षीया रोशनी को इन दिनों अपनी जिंदगी में अचानक छाए अंधेरे से बाहर निकलने के लिए लोगों से मदद की दरकार है।
मुंबई में करीब डेढ़ लाख से ज्यादा लोग मुंबई में फुटपाथ पर जीवनयापन करते हैं। इन्हीं में से एक है रोशनी। आम बच्चों की तरह रोशनी भी दिवाली के दिन पटाखा जला रही थी। इस बीच एक पटाखा की चिंगारी रोशनी के चेहरे और आंखों को घायल कर गई। इस घटना में रोशनी के आंखों की रोशनी तो बच गई लेकिन उसका चेहरा बुरी तरह से झुलस गया। फुटपाथ पर रहनेवाले रोशनी के परिवार की इतनी आमदनी नहीं है कि वो अपनी बेटी का इलाज भी ठीक तरह से करा सकें। ऐसे में अब रोशनी को उन लोगों से उम्मीद है जो उसकी तरफ मदद का हाथ बढ़ाएं ताकि रोशनी अपने चेहरे की खोई हुई चमक वापस पा सके। वैसे रोशनी के परिवारवालों ने इलाज के लिए अपनी बिरादरी और अन्य दूसरे लोगों से मदद मांगी। लेकिन किसी के पास इतना पैसा नहीं है कि वो रोशनी के चेहरे के इलाज के लिए पैसा खर्च कर सके। गजरा बेचकर गुजारा करनेवाले इस परिवार को कभी आधा पेट तो कभी-कभार भूखे पेट सोना पड़ता है। रोशनी की मां राधा काले का कहना है कि रोशनी के प्रारंभिक इलाज के लिए उन्होंने जैसे-तैसे थोड़े-बहुत पैसों का इंतजाम किया। लेकिन अब दवा खत्म होने के बाद उनके पास इलाज के लिए पैसे नहीं है। दूसरों से उम्मीद के अलावा उनके पास दूसरा कोई अन्य विकल्प नहीं है।