लिखा-पढ़ा

एक जगह पर लिखा हुआ था,
शायद मैंने पढ़ा हुआ था।
गिरो कि जैसे झरना गिरता है,
कहीं पेड़ से फल गिरता है।
पर नहीं गिरो इतना भी ज्यादा,
कि गिरे हुए कहलाओ।
गिरकर चोटिल इतना भी मत होना,
कि मरहम पट्टी बंधवाओ।
एक जगह पर लिखा हुआ था,
शायद मैंने पढ़ा हुआ था।
मत डर गिरने से क्योंकि,
गिरनेवाला ही उठता है।
गिर-गिरकर उठनेवाला ही,
हिम्मत-ए-जिगरबाज कहलाता।
मैदान मारता, न वह डरता,
सभी जगह पूजा जाता है।
अवसर का क्या आते रहते हैं?
एक जाता दूजा आता है।
गिर-गिरकर जो उठता रहता,
लहर-लहर लहराता।
सागर की अथाह गहराई,
का आभास कराता।
हम अभी गिरे हैं, अभी उठेंगे,
पग में दम है इतना।
गिरना-उठना खेल जगत का,
तू मंजिल से न हटना।
एक जगह पर लिखा हुआ था,
शायद मैंने पढ़ा हुआ था।
-विद्यासागर यादव, सानपाड़ा, नई मुंबई