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लॉकडाउन का पॉजिटिव इफेक्ट

लॉकडाउन में कई चीजों के साथ पॉल्यूशन भी डाउन हुआ। ध्वनि और वायु प्रदूषण ही नहीं, बल्कि जल प्रदूषण में नीचे हुआ। हमारी राष्ट्रीय नदी गंगा के प्रदूषण स्तर में भी ४० से ५० प्रतिशत की कमी आई है। गंगा में जहां बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड-बीओडी और फेकल कॉलीफार्म काउंट- एफसीसी घटा है। वहीं, ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ी है। जो इंसान ही नहीं जीव जंतुओं के लिए अच्छी है। गंगा जल स्वच्छ और आचमन योग्य हुआ है।
कोरोना वायरस से जंग में २२ मार्च को जनता क‌र्फ्यू और उसके बाद लॉकडाउन के चार चरण ने भले ही लोगों को घर के अंदर रहने पर मजबूर किया पर यह कोरोना वायरस संक्रमण की चेन तोड़ने के साथ पर्यावरण के लिए भी अच्छा हुआ। औद्योगिक गतिविधियां बन्द रहीं, लोगों का बाहर निकलना बंद रहा, मोटर गाड़ियों का आवागमन वायु प्रदूषण ही नहीं गंगा, यमुना समेत देश की अन्य नदियों के प्रदूषण स्तर में भारी कमी ला दी।
डेनमार्क के कोपेनहेगन में २८ साल पहले पृथ्वी सम्मेलन हुआ था जिसमें दुनिया के प्रमुख देश शामिल हुए थे। उसमें धरती के पर्यावरण को साफ सुथरा बनाए रखने की ढेर सारी कसमें खाई गई थी। कई योजनाएं बनाई गर्इं। कई प्रस्ताव पास किए गए। पर पृथ्वी सम्मेलन के २८ साल बाद भी हालात जस के तस ही थे, लेकिन कोरोना महामारी से भयाक्रांत समूचे विश्व में लॉकडाउन ने पर्यावरण को कुछ स्वस्थ जरूर कर दिया है। हवा का जहर क्षीण हो गया है और नदियों का जल निर्मल। हवा पानी साफ साफ नजर आ रहा है। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने १४ जून १९८६ को वाराणसी से गंगा एक्शन प्लान की शुरुआत की थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जून २०१४ में २०००० करोड़ के बजट से नमामि गंगे प्रारंभ किया। पर इन सबसे जो नतीजा नहीं मिल पाया वह लॉकडाउन के ३४-३५ दिन में ही दिखने लगा। सिर्फ यही नहीं चंडीगढ़ से हिमालय की चोटियां देखने लगीं। औद्योगिक आय की दर जरूर साढ़े ७ फीसदी से दो फीसदी पर जा गिरी और देश की अर्थव्यवस्था खतरे में मंडराने लगी है। पर इस कोरोना काल ने पर्यावरण को साफ सुथरा तो कर ही डाला है। गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार के जंतु एवं पर्यावरण विज्ञान विभाग के असिस्टेंट प्रो. डॉ. राकेश भूटानी के अनुसार लॉकडाउन के दौरान गंगा जल में बीओडी घट गई है और ऑक्सीजन बढ़ गई है। जो मनुष्य ही नहीं जीव जंतुओं के लिये अच्छी है। जल साफ सुथरा और आचमन के काबिल हो गया है। कॉलीफार्म बैक्टीरिया में भी भारी कमी आई है। चूंकि लॉकडाउन के दौरान इंडस्ट्री और सीवरेज वेस्ट का गंगा में कम आना इसकी शुद्धता को बढ़ाने में सहायक रहा। इससे इतर ध्वनि प्रदूषण की बात करें तो पिछले वर्ष मार्च से मई के दौरान वायु प्रदूषण स्तर १३१.८८ माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर था। जबकि, जनता क‌र्फ्यू और लॉकडाउन के चारों चरणों के दौरान यानी २२ मार्च से ३१ मई के बीच, वायु प्रदूषण का स्तर घटकर ६१.२८ माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर हो गया। अर्थात इसमें करीब ५० प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।
बम्पर टू बम्पर ट्रैफिक, घण्टों लगे जाम, सड़क पर गाड़ियों की कतारें, हॉर्न की आवाजें, गाड़ियों से निकलते धुएं, धुआंं उगलती मिल, वर्कशाप व फैक्ट्रियां और धूल व कचरे का तूफान बिखेरते लगातार चलते हुए निर्माण कार्य यानी कांस्ट्रक्शन एक्टिविटी हमारे शहरों के विकास की पहचान बन गए थे। लोग समझने लगे थे कि असली प्रगति, असली विकास यही है। बड़े पैमाने पर होने वाली गतिविधियों ने हमारे शहरों की हवा को कितना जहरीला और नदियों को कितना प्रदूषित किया, यह हम सब जानते हैं। पर लॉक डाउन ने इसमें काफी सुधार किया। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के ताजा आंकड़ों के अनुसार पर्यावरण सुधार के अच्छे संकेत २२ मार्च को जनता कर्फ्यू के दौरान भी देखे गए। दिल्ली में उस दिन वायु गुणवत्ता इंडेक्स- एक्यूआई १०१ से २५० के बीच था।
छ: साल पहले इसी दिन के आंकड़ों से तुलना करें तो वायु के अपेक्षाकृत बड़े प्रदूषणकारी धूल कणिकाओं पीएम १० की मात्रा में ४४ज्ञ् की कमी पाई गई। अधिक खतरनाक माने जाने वाली सूक्ष्म वायु कणिकाएंं पीएम २.५ की मात्रा में हालांंकि ८ज्ञ् की ही कमी अंकित की गई, पर इसका कारण इनके नीचे आकर किसी सतह पर स्थिर होने में लगने वाला समय माना जा सकता है। सड़कों पर मोटर वाहनों की आवाजाही रुक जाने के कारण २१ मार्च की तुलना में जनता कर्फ्यू के दिन यानी २२ मार्च को आश्चर्यजनक रूप से जहरीली गैसों नाइट्रोजन और सल्फर के ऑक्साइडों में दिल्ली के कुछ क्षेत्रों में ३४ और ५१ प्रतिशत की कमी अंकित की गई। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई की हवा भी लॉकडाउन में अपेक्षाकृत साफ सुथरी पाई गई है। साथ ही दिल्ली और मुबंई के सबसे प्रदूषित कुछ क्षेत्र तो हरित जोन में तब्दील हुए हैं जहां काफी कम या नहीं के बराबर पॉल्यूशन रिकॉर्ड किया गया है। केंद्र सरकार के वायु गुणवत्ता मौसम पूर्वानुमान और अनुसंधान प्रणाली- सफर के डायरेक्टर गुफरान बेग के अनुसार दिल्ली में लॉकडाउन से पहले आठ सबसे ज्यादा प्रदूषित स्थान होते थे, जो अब हरित जोन बन गए हैं। इन क्षेत्रों में विनोबापुरी, आदर्श नगर, वसुंधरा, साहिबाबाद, आश्रम रोड, पंजाबी बाग, ओखला और बदरपुर शामिल हैं। जबकि मुंबई में वर्ली, बोरीवली और भांडुप ऐसे क्षेत्रों में हैं, जहां मुंबई महानगर क्षेत्र-एमएमआर के अन्य इलाकों की अपेक्षा में साफ हवा रिकॉर्ड की गई है। दिल्ली और मुंबई के प्रदूषण के इन हॉटस्पॉट में प्रमुख रूप से औद्योगिक गतिविधियां या यातायात की अधिकता की वजह से ज्यादा प्रदूषण होता था। पर यहां पर अब वायु गुणवत्ता सूचकांक- एक्यूआई अब ‘अच्छा’ या ‘संतोषजनक’ श्रेणी में आता है।
बता दें कि वायु की गुणवत्ता को समवेत रूप से शामिल मुख्य वायु प्रदूषकों की मात्रा के आधार पर एअर क्वालिटी इंडेक्स के रूप में आँका जाता है। एक्यूआई ५१-१०० के बीच ‘संतोषजनक’, १०१-२०० के बीच ‘मध्यम’, २०१-३०० के बीच ‘खराब’, ३०१-४०० के बीच ‘बहुत खराब’ और ४०१-५०० को ‘गंभीर’ माना जाता है।
सफर ने हवा में पीएम २.५, पीएम १० और एनओ२ (नाइट्रोजन डाई ऑक्साइड) जैसे खतरनाक प्रदूषकों की तुलना लॉकडाउन से पहले एक से २१ मार्च और लॉकडाउन के दौरान २५ मार्च से १४ अप्रैल से भी की है। यह विश्लेषण दिल्ली, मुंबई, पुणे और अहमदाबाद में किया गया है।
दिल्ली में लॉकडाउन के दौरान पीएम २.५, ३६ फीसदी तक घटा, जबकि पीएम १० में ४३ प्रतिशत की कमी आई है और गाड़ियों से निकलने वाले एनओ२ में ५२ प्रतिशत की कमी आई।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड-सीपीसीबी ने भी राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में पीएम २.५ के स्तर में ४६ प्रतिशत की कमी और पीएम १० के स्तर में ५० प्रतिशत की कमी रिकार्ड की है।
हालांंकि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में ही शामिल नोएडा और गाज़ियाबाद के आंकड़े जितने अच्छे पाए गए, गुड़गांव और फरीदाबाद के वायु प्रदूषण में भी उतना सुधार नहीं मिला इसलिए वायु प्रदूषण में स्थानीय कारणों की भूमिका को भी दरकिनार नहीं किया जा सकता है।
सीपीसीबी के आंकड़ों के अनुसार इस वर्ष २१ मार्च के ५४ शहरों में अच्छी और संतोषजनक एवं ९ शहरों में खराब एक्यूआई की तुलना में २९ मार्च को भारत के कुल ९१ शहरों में एक्यूआई अच्छी (३० में) एवं संतोषजनक (६१में) पाई गई। इस दिन किसी भी शहर की हवा खराब नहीं मिली परन्तु कानपुर, लखनऊ, मुजफरनगर, कल्याण, सिंगरौली, गुवाहाटी जैसे कई शहरों में २५-२८ मार्च के आंकड़ों अनुसार स्थानीय कारणों से पी. एम. २.५ का स्तर अवश्य खराब रहा।
महाराष्ट्र की बात करें तो लॉकडाउन में राज्य के कई शहरों की वायु गुणवत्ता में सुधार हुआ है। इसमें मुंबई, पुणे, ठाणे, चंद्रपुर, सोलापुर और नागपुर शामिल है। जहां के नागरिक फिलहाल शुद्ध हवा में सांस ले रहे हैं। शुद्ध हवा के लिहाज पुणे और ठाणे ने प्रथम क्रमांक पर हैं। इन शहरों में हवा मध्यम से अच्छी हुई है। नवी मुम्बई का एरोली ही एकमात्र ऐसी जगह है जिसकी हवा संतोषजनक रही है। साफ आसमान, शोरगुल का निम्न स्तर, पक्षियों की चहचहाहट और सबसे महत्वपूर्ण प्रदूषण रहित हवा प्रदूषण में कमी के संकेत दे रहे हैं।
इसी लॉकडाउन के कारण ही दिल्ली में यमुना एवं हरिद्वार, कानपुर, प्रयागराज तथा वाराणसी में गंगा के प्रदूषण स्तर में भी महत्वपूर्ण सुधार आया है। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़े बताते हैं कि इस दौरान वाराणसी में गंगा में घुलनशील ऑक्सीजन की मात्रा ८.३ -८.९ ग्राम प्रति लीटर पाई  गई  जो स्वच्छ जल के न्यूनतम स्तर ७ ग्राम प्रति लीटर से पर्याप्त अधिक है। दिल्ली जल बोर्ड और नागरिकों का मानना है कि इस लॉकडाउन में यमुना का प्रदूषण स्तर भी पर्याप्त मात्रा में सुधरा है। इसका मतलब यह कहा जा सकता है कि लॉकडाउन ने पॉल्यूशन को डाउन तो कर ही दिया है। यह लॉकडाउन का पॉजिटिव इफेक्ट है।