" /> लॉकडाउन के बाद क्या?, कोरोना की अर्थी से उठो!!

लॉकडाउन के बाद क्या?, कोरोना की अर्थी से उठो!!

महाराष्ट्र में विधान परिषद चुनाव निर्विरोध हो रहे हैं। इसलिए राज्य में अस्थिरता का बादल छंट चुका है और सब-कुछ इच्छानुसार हुआ। हालांकि सत्ताधीश और राजनेता इससे खुश होंगे लेकिन सवाल यह है कि लोगों के संकट को कैसे दूर किया जाए। लॉकडाउन के बाद सरकार की क्या योजना है? यह सवाल राहुल गांधी से लेकर कई प्रमुख नेताओं ने पूछा है। फिलहाल एक ही सवाल महत्वपूर्ण है और सरकार के पास इसका कोई जवाब नहीं है और कोई हल भी नहीं है। लॉकडाउन हटाएं या बढ़ाएं? नतीजा कुछ भी हो, दोनों तरफ मौत जनता की ही है। एक बात सुनिश्चित है कि कोरोना की अर्थी से अब उठना होगा। काम-धंधा शुरू होना चाहिए। केंद्र सरकार ने अब यह स्पष्ट कर दिया है कि कोविड अर्थात कोरोना से सुरक्षा आवश्यक है, लेकिन अब व्यवसाय आदि शुरू हो जाना चाहिए। आर्थिक व्यवहार शुरू होना आवश्यक है। अगर ऐसा नहीं हुआ तो चरमराई अर्थ-व्यवस्था सीधे रसातल में चली जाएगी। स्कूल, कॉलेज, दुकानें, उद्योग, सार्वजनिक परिवहन, हवाई परिवहन फिलहाल बंद हैं। लोगों की ‘आवक’ रुक गई है। मध्यम वर्ग कल तक राशन की दुकान पर कतार में खड़ा नहीं होता था। उनमें से कई लोग अब मुफ्त अनाज पर जी रहे हैं, ये तस्वीर अच्छी नहीं है। काम करनेवाले हाथ खाली हैं और कोरोना काल में सरकार को तीन महीनों में जो राजस्व प्राप्त हुआ, वह कोरोना से लड़ाई में ही खर्च हो गया। इसलिए सरकारी तिजोरी भी खाली होने के कारण लॉकडाउन के बाद क्या किया जाए? यह सवाल बना हुआ है। देशभर के उद्योग-धंधे कब शुरू होंगे, यह अनिश्चित ही है। महाराष्ट्र के रेड जोन को छोड़कर, लगभग ५७,००० उद्योगों को लाइसेंस दिया गया है और २५,००० कंपनियों में उत्पादन शुरू हो गया है। लगभग साढ़े छह लाख कर्मचारी इन जगहों पर काम कर रहे हैं, ये जानकारी उद्योग मंत्री सुभाष देसाई ने दी है। इसके अलावा, केंद्र सरकार की ओर से भी जल्द ही राज्य में लघु उद्योगों की मदद के लिए एक वित्तीय पैकेज की घोषणा की जाएगी, ऐसा उद्योग मंत्री ने कहा। महाराष्ट्र में लॉकडाउन के परिप्रेक्ष्य में उद्योग-व्यापार को धीरे-धीरे पटरी पर लाने के प्रयास जारी ही हैं, लेकिन मुंबई, ठाणे, पुणे, पिंपरी-चिंचवड़ और नासिक जैसे औद्योगिक शहर इसमें शामिल नहीं हैं। मुंबई, ठाणे और नई मुंबई न केवल राज्य के लिए बल्कि देश और दुनिया के लिए भी महत्वपूर्ण शहर हैं। पिंपरी-चिंचवड़ और पुणे के ग्रामीण क्षेत्र में उद्योग-व्यापार फैला है। पुणे के ग्रामीण क्षेत्रों में और संभाजीनगर के बाहर ‘ऑटो’ उद्योग के कारखाने राज्य को रोजगार और राजस्व प्रदान कर रहे हैं। इसके अलावा, राज्य में इंजीनियरिंग और दवा कंपनियां फल-फूल रही थीं और खाद्य उद्योग भी बढ़ रहा था। लेकिन कोरोना लॉकडाउन से ये सभी उद्योग बुरी तरह प्रभावित हुए। इससे रोजगार प्रभावित हो रहा है। इसके अलावा असंगठित क्षेत्रों में काम करनेवाला श्रमिक वर्ग बहुत बड़ा है। पांच सितारा और मध्यम दर्जे के होटल और उन पर टिका ‘परिवहन और पर्यटन’ व्यवसाय भी ढह गया है। स्ट्रीट फूड स्टॉल, खुदरा विक्रेताओं और रिक्शा चालकों का भविष्य अनिश्चित है। कोरोना की फांस उनके गले में लिपटी हुई है। गैर-अनुदानित स्कूलों में हजारों शिक्षक दो महीने से अपना अल्प वेतन भी नहीं पा सके हैं। घरेलू कामगारों की स्थिति और भी खराब है। इस वर्ग का कोई पालक नहीं है। घर काम करनेवाली ‘बाइयां’ झोपड़ियों या चालियों में रहती हैं। अब उन्हें अन्य आवासीय परिसरों में प्रवेश करने से रोक दिया गया है और वे कब तक मुफ्त अनाज की कतार में खड़ी रहेंगी? इसका जवाब सरकार के पास नहीं है। मोदी और महाराष्ट्र की सरकार मजबूत है, लेकिन सरकार को यह ध्यान रखना होगा कि जनता का धैर्य न खोने पाए। अन्यथा लोगों के संताप का सामना करना मुश्किल हो जाएगा। लोगों के वेतन व पेंशन आदि रुके हुए हैं। भारतीय स्टेट बैंक ने सावधि जमा पर ब्याज दरों में कमी की है। इससे ब्याज पर गुजारा करनेवाले भी बेहाल ही होंगे। ये सच है कि यह सब कोरोना के कारण हो रहा है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रहे। लोग आज ही जीना चाहते हैं। उन्हें कल का आश्वासन नहीं चाहिए। हर कोई यही सोच रहा है ‘कल की क्या बात करें, आज का ही कुछ ठिकाना नहीं है’। लोग जीना चाहते हैं। भले ही उनका इलाज अस्पताल के वार्ड में लाशों के साथ किया जा रहा हो। मुंबई में शीव और केईएम जैसे अस्पतालों की भयंकर तस्वीर सामने आई थी। जहां लाशों को बांधकर रखा गया है, वहीं कोरोना के रोगियों का इलाज किया जा रहा है, यह तस्वीर भयावह है और बड़े शहरों में कोरोना संकट की भयावहता को सामने लानेवाली है। अस्पतालों में कोई बिस्तर नहीं बचा है और ऐसे मामलों में उपचार करना व करवाना एक आवश्यकता बन गई है। लोग जीना चाहते हैं। आज लोग अस्पतालों में मर रहे हैं। वे लाशों से नहीं डर रहे, लेकिन लॉकडाउन के बाद भूख और आर्थिक तंगी के कारण सार्वजनिक स्थानों पर, घरों में, सड़कों पर लाशें न बिछने पाएं, इसके लिए सत्ताधीशों को ‘कोरोना’ का भजन रोकना होगा। सरकार पहले कोरोना की अर्थी से उठे। लोग अपने आप काम-धंधे पर लग जाएंगे! ‘लॉकडाउन’ के बाद सरकार की क्या योजना है? कोरोना की अर्थी से उठने से पहले ही जनता को इसका जवाब मिलना चाहिए!