लोकतंत्र के महापर्व को जोश से मनाएं

आखिर इंतजार की घड़ियां खत्म हुईं और लोकसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान हो गया। सात चरण में होनेवाले इस लोकतंत्र के महापर्व के बीच में ही मुसलमानों के धार्मिक आस्था का कठिन लेकिन त्याग और तपस्या से लबरेज पवित्र महीना रमजान भी शुरू होगा। रमजान महीने में होनेवाले अंतिम ३ चरण के चुनाव को लेकर सियासत काफी गर्म है। सियासी कारिंदों और कुछ मुस्लिम संगठनों ने इस मुद्दे पर एक तरह से हंगामा मचा रखा है। मुस्लिम संगठनों ने चुनावी तारीखों के दरम्यान रमजान का हवाला दिया है और ऐतराज जताते हुए चुनाव आयोग से तारीखों में बदलाव की मांग की है। सोशल मीडिया पर बखेड़ा करने में माहिर कुछ यूजर्स के बीच चुनाव की तारीख और रमजान एक साथ होने पर सवाल उठ रहे हैं। कट्टरपंथियों की अगर मानें तो बिहार, यूपी और बंगाल में अल्पसंख्यक ज्यादा हैं, जिनके लिए रोजा रखकर मतदान के लिए जाना बहुत बड़ी परेशानी की बात होगी। ऐसी शक्तियों का आरोप है कि चुनाव आयोग ने इन बातों का ख्याल नहीं रखा।
दरअसल, पांच मई से रमजान शुरू हो जाएगा और आखिरी तीन चरणों यानी ६, १२ और १९ मई को मतदान के दौरान रमजान का महीना चल रहा होगा। कुछ मुस्लिम नेताओं और धर्मगुरुओं ने चुनाव आयोग को घेरा है कि पवित्र रमजान माह में मई की कड़ी धूप में मुस्लिम समाज से वैâसे उम्मीद की जा सकती है कि वह मतदान के लिए घर से निकलेगा? दिन भर बगैर कुछ खाए-पिये वह मतदान के लिए लंबी लाइन में किस तरह लगेगा? पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी ने तो इसे भाजपा का गेम प्लान बता दिया है। आप सांसद संजय सिंह ने भी इसे साजिश बताया है। कोलकाता के मेयर फिरहाद हाकिम भी चुनाव आयोग पर उंगली उठा चुके हैं। आम आदमी पार्टी के विधायक अमानतुल्ला खान ने भी इस पैâसले का विरोध किया है। दिल्ली जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी, फतेहपुरी मस्जिद के शाही इमाम डॉक्टर मुफ्ती मुकर्रम अहमद, इस्लामी विद्वान मौलाना डॉक्टर कल्बे रुशैद रिजवी, लखनऊ ईदगाह के इमाम व शहर काजी मौलाना खालिद रशीद फि‍रंगी महली, ऑल इंडिया मुस्लिम महिला पर्सनल लॉ बोर्ड की अध्यक्ष शाइस्ता अंबर, शिया धर्मगुरु कल्बे जव्वाद जैसे नामी-गिरामी मुस्लिम चेहरों ने भी बआवाज-ए-बुलंद चुनाव आयोग की तारीखों की मुखालिफत में कड़े बयान जारी किए हैं।
वहीं दूसरी तरफ आश्चर्यजनक रूप से कट्टरवादी छवि वाले एमआईएम चीफ असदुद्दीन ओवैसी, कांग्रेस नेता मीम अफजल, मुस्लिम धर्मगुरु मौलाना अतहर देहलवी और चंद अन्य मुस्लिम नेताओं ने इस मुद्दे को बहुत ही गैर-जरूरी बताया है। इन सभी के मतानुसार चुनाव आयोग के इस निर्णय से ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा। राजनीति की बारीकियों को समझनेवाले ऐसे नेताओं और व्यावहारिक अमल पर विश्वास रखनेवाले धर्मगुरुओं का मानना है कि वोटिंग के लिए रमजान को मुद्दा बनाना ठीक नहीं। वैसे रमजान के दौरान लोकसभा चुनावों की वोटिंग पर मचे घमासान के बीच चुनाव आयोग का बयान आया है कि शुक्रवार यानी जुमा और त्योहारों के दौरान वोटिंग नहीं है। आयोग ने अपना पक्ष रखते हुए यह भी कहा है कि रमजान के पूरे महीने चुनाव न कराना असंभव है।
एक बात मुस्लिम समाज क्यों नहीं समझ रहा कि संवैधानिक नजरिए से २ जून से पहले नई सरकार का गठन होना जरूरी है? ऐसे में इसे वैâसे टाला जा सकता है? साथ ही एक महीने तक चुनाव न हों, ऐसा भी वैâसे संभव हो सकता है? दूसरी बात रमजान हर वर्ष आता है वह भी अंग्रेजी महीने के हिसाब से प्रतिवर्ष १० दिन पहले। हिंदू और मुस्लिम वैâलेंडर चांद की तारीखों के ऐतबार से चलते हैं इसलिए अंग्रेजी वैâलेंडर के हिसाब से हर वर्ष इन महीनों में १० दिन कम हो जाते हैं। तीन वर्ष बाद हिंदू वैâलेंडर में ‘अधिक मास’ जोड़कर लगभग अंग्रेजी महीनों के आस-पास तारीखें मेल खा जाती हैं लेकिन इस्लामी वैâलेंडर में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है और सबसे बड़ी बात, सिर्फ मुसलमानों के लिए चुनाव को एक महीने पहले या बाद में कराने का आखिर क्या तुक बनता है? क्या इस तरह की मांग विशुद्ध सांप्रदायिकता का प्रदर्शन नहीं है? एक बात जो समझ में नहीं आ रही है कि ये गैर-जरूरी विवाद हो क्यों रहा है? क्या मुसलमान रोजा रखकर काम पर नहीं जाते? मेहनत-मजदूरी नहीं करते? रमजान में मुसलमान रोजा रखते हैं, काम भी करते हैं और पांचों वक्त की नमाज के अलावा रात में अतिरिक्त तरावीह की नमाज भी पढ़ते हैं। क्या मुसलमान इतना कमजोर है कि अपने मताधिकार का उपयोग करने के लिए रोजा रखकर कुछ देर के लिए लाइन में खड़ा नहीं रह सकता? इतिहास गवाह है कि आजादी की लड़ाई में अनेकों बार रमजान आए लेकिन क्रांतिकारी मुसलमानों की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा। यहां तक कि लाल किले पर १५ अगस्त को जब तिरंगा फहराया गया तब पवित्र रमजान का आखिरी यानी अलविदाई जुमा था तो फिर अब अगर वोटिंग रमजान में है तो दिक्कत क्‍या है? खास वोटिंग को रमजान महीने से क्यों जोड़ा जा रहा है? अगर इस मुद्दे पर कुछ नेताओं और उलेमा को आपत्ति है भी तो इस पर इतना शोर क्यों? क्यों नहीं उन्हें नजरअंदाज कर दिया जाता?
मुस्लिम समाज को अगर हार-जीत का डर सता रहा है तो वह थोड़ा-सा पीछे जाकर देखें तो पाएंगे कि पिछले साल वैâराना में लोकसभा का उपचुनाव तो रमजान के महीने में हुआ था और वहां भाजपा की जबरदस्त शिकस्त हुई थी। वैâराना में चुनाव से कुछ माह पहले भीषण सांप्रदायिक दंगा हो चुका था। ध्रुवीकरण के तमाम मुद्दे गर्म थे लेकिन मतदान के दिन स्थानीय हिंदू भाइयों ने मतदान के समय रमजान का सम्मान रखते हुए दोपहर तक मुसलमानों को पहले वोट देने की राह हमवार की। सूर्योदय से पहले पढ़ी जानेवाली फङ्का की नमाज के बाद ही मुस्लिम समाज ने मतदान केंद्रों का रुख किया और दोपहर धूप चढ़ने तक अधिकांश मुसलमानों ने अपने मताधिकार का प्रयोग कर लिया। हिंदू भाइयों ने ऐसा करने में उनकी मदद की और दोपहर तक खुद मतदान केंद्रों से दूर रहे। बहुत जरूरी होने पर ही उन्होंने दोपहर तक वोट डाला। यह हमारे लोकतंत्र में एक दूसरे की भावनाओं के सम्मान की खूबसूरत मिसाल है। क्या मुस्लिम समाज अपने हमवतन भाइयों को विश्वास में लेकर ऐसे माहौल को दोबारा नहीं बना सकता? अगर नेक-नीयती से प्रयास हों तो तो ऐसा मुमकिन है।
हमारा देश दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है और उसकी खूबी यह है कि इसमें सभी धर्मों के लोग मिल-जुलकर रहते हैं। एक तरफ अगर रोजा रखना जरूरी है तो दूसरी तरफ देश का चुनावी पर्व भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। दोनों ही अहम हैं और दोनों को जिम्मेदारी और खुशअखलाकी से निभाना मिल्ली फरीजा है। दोनों में किसी किस्म का कोई टकराव भी नहीं है। न इस्लाम के नजरिए से रोजा रखकर मतदान करना मकरूह या हराम है, न संविधान मुसलमानों को रोजा रखकर मतदान करने से रोकता है। अब जब चुनाव का ऐलान हो गया है तो मुसलमानों को किसी तरह के विवाद में न पड़ते हुए मतदान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना चाहिए। खांटी सियासी रहनुमाओं और सियासी उलेमा से परहेज करते हुए संकीर्ण विचारों से ऊपर उठना ही मुसलमानों के लिए हितकर है। ऐसा नहीं होना चाहिए कि चंद सियासी हजरात के बहकावे में आकर वोट डालने के लिए लोग कम जाएं। यह लोकतंत्र के लिए शर्मनाक होगा बल्कि लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए ज्‍यादा से ज्‍यादा तादाद में वोट का इस्तेमाल करना मुस्लिम समाज की बड़ी जिम्मेदारी है। हिंदू भाई भी व्रत करते हैं, वो भी तो मतदान करते हैं और खास बात यह कि यह पहला मौका तो है नहीं कि जब रमजान में मतदान हो रहा हो। इस मुद्दे पर सवाल उठाना या राजनैतिक रोटी सेंकना, सिवाय मूर्खता के और कुछ नहीं है। चुनाव लोकतंत्र का महापर्व है, मुसलमानों को चाहिए कि उसे दोगुने जोश से मनाएं।