" /> लोकप्रियता और स्वीकार्यता, तय करेंगे यूपी के उपचुनाव

लोकप्रियता और स्वीकार्यता, तय करेंगे यूपी के उपचुनाव

उत्तर प्रदेश में मंगलवार को सात विधानसभा सीटों पर पड़े वोट किसके हक में नतीजे देंगे? जीत की दरकार भारतीय जनता पार्टी और सरकार से कहीं ज्यादा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को है, जो नतीजों के दम पर अपनी लोकप्रियता और स्वीकार्यता को साबित करेंगे। वहीं, आंशिक सफलता भी समाजवादी पार्टी या कांग्रेस को आगामी विधानसभा चुनावों में सशक्त विकल्प के तौर पर सामने खड़ा करेगी। भाजपा के रणनीतिकारों की निगाह इस पर भी होगी कि विपक्षी दलों को कितने ज्यादा वोट मिल पाते हैं।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उनके प्रबंधकों का मानना है कि १० नवंबर को गणना में प्रत्येक विधानसभा में जितने ज्यादा वोट विरोधी दलों को मिलेंगे या बटेंगे उतना ज्यादा भाजपा की जीत को सुनिश्चित करेंगे। ऐसे में टूंडला फिरोजाबाद में कांग्रेस प्रत्याशी के नामांकन के खारिज हो जाने से वे चिंतित हैं, तो जौनपुर मल्हनी में निर्दलीय के मुख्य मुकाबले में होने से चिंतित हैं।
उत्तर प्रदेश में सात विधानसभा सीटों के उपचुनाव के लिए मंगलवार को वोट पड़ गए हैं। उपचुनाव प्रदेश के पश्चिमी, पूर्वी, ब्रज, रुहेलखंड से लेकर अवध क्षेत्र की सीटों पर हो रहा है और इसीलिए इसे पूरी तरह से विधानसभा के लिए सेमीफाइनल माना जा रहा है। उपचुनाव में पहली बार उतरी बहुजन समाज पार्टी ने चार दिन पहले सपा के खिलाफ भाजपा के साथ भी जाने का बयान देकर सेल्फ गोल कर लिया है, तो तमाम विरोधों से घिरे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए इन चुनावों की जीत न केवल कद को बड़ा करेगी, बल्कि उन्हें निर्विघ्न शासन का रास्ता भी तैयार करेगी। बसपा के विधायकों को तोड़, कांग्रेस की बड़ी नेता अन्नू टंडन को अपने साथ लाकर समाजवादी पार्टी के हौसले बुलंद हैं और वो इन चुनावों के नतीजे से अपने पक्ष में बह रही लहर का संदेश देना चाहते हैं। कांग्रेस के लिए हर बार की तरह इन उपचुनावों में खोने के लिए कुछ नही है, बल्कि कई सीटों पर मजबूती के साथ लड़कर वह विपक्ष में माया को हटाकर उसकी जगह हथियाने के करीब पहुंचती दिखती है। सात सीटों के लिए उपचुनावों में छह सीटें भाजपा तो एक सीट सपा के पास थी।
उपचुनावों में जनता का रुख और विपक्षी प्रत्याशियों की मजबूती ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सांसत में डाल रखा है। खुद को मजबूत साबित करने के लिए उन पर कम-से-कम अपनी छह सीटें बचाने की चुनौती है। हालांकि, उनका दावा तो सातवीं सीट भी सपा से छीनने की है। उपचुनावों के प्रचार में जहां सपा प्रमुख अखिलेश यादव और बसपा सुप्रीमों मायावती घरों से नहीं निकले हैं, वहीं योगी आदित्यनाथ ने हर क्षेत्र में दो-दो सभाएं की हैं और वीडियो कांप्रâेंसिंग के जरिए लगातार कार्यकर्ताओं से संवाद कर रहे हैं। उप मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा व केशव प्रसाद मौर्य लगातार रैलियां कर रहे हैं, तो दर्जनों मंत्री चुनाव क्षेत्रों में डेरा डाले हुए हैं। भाजपा का संगठन देख रहे सुनील बंसल दिन-रात पसीना बहा रहे हैं।
उधर उपचुनावों के मतदान से हफ्ता भर पहले ही राज्यसभा में भाजपा की मदद से एक सीट झटकने में कामयाब रही बसपा प्रमुख मायावती ने आगे विधानपरिषद के चुनाव में सपा को हराने के लिए भाजपा से हाथ मिलाने की बात कहकर पार्टी के लिए मुसीबत मोल ले ली है। हालांकि, सोमवार को माया ने अपने बयान पर सफाई दे भाजपा के साथ न जाने की बात कही पर तब तक नुकसान हो चुका था। दरअसल, लगातार छीजते जनाधार और कद्दावर नेताओं के पार्टी छोड़ने से बसपा पहले से ही कमजोर थी। ऊपर से माया के भाजपा के साथ दिखने के चलते अब अल्पसंख्यक उससे पूरी तरह से परहेज कर रहे हैं। उपचुनावों में अकेले बुलंदशहर सीट पर उसके प्रत्याशी को अल्पसंख्यकों का समर्थन मिल रहा है।
गौरतलब है कि बसपा आमतौर पर उपचुनाव नहीं लड़ती पर पहली बार उसने प्रत्याशी खड़े किए हैं। सपा का आरोप है कि भाजपा को फायदा पहुंचाने के लिए ऐसा किया गया है।
प्रियंका गांधी की एंट्री और यूपी कांग्रेस का प्रभारी बनने के बाद यह पहला चुनाव है, जहां सब कुछ उनके मनमाफिक हो रहा है। प्रत्याशी चयन से लेकर चुनाव प्रचार तक प्रियंका गांधी के मुताबिक ही हो रहा है। कांग्रेस के पास उपचुनावों में न तो कोई सीट थी न ही पूर्व में कहीं उसका प्रत्याशी रनर अप ही रहा था। इस सबके बाद भी कांग्रेस उन्नाव जिले की बांगरमऊ और कानपुर देहात की घाटमपुर सीट पर अपना सब कुछ झोंक रही है। इन दोनों सीटों पर अल्पसंख्यक मतों का बड़ा हिस्सा उसके पाले में खड़ा दिखता है। कांग्रेस के सभी दिग्गज नेता खास तौर पर बांगरमऊ सीट जो रेप आरोपी भाजपा विधायक कुलदीप सेंगर को सजा मिलने के बाद खाली हुई है, पर ही चुनाव प्रचार कर रहे हैं। कांग्रेस इन चुनावों में बेहतर प्रदर्शन कर संदेश देना चाहती है कि भाजपा से असल मुकाबले में वो ही है।
उत्तर प्रदेश में मंगलवार को नौगावां सादात, देवरिया सदर, मल्हनी जौनपुर, बांगरमऊ, टूंडला, घाटमपुर और बुलंदशहर में मतदान संपन्न हुआ है। नतीजे १० नवंबर को आने हैं। इनमें से नौगावां सादात सीट योगी सरकार में वैâबिनेट मंत्री चेतन चौहान की मृत्यु तो घाटमपुर सीट मंत्री कमलरानी वरुण और बुलंद शहर व देवरिया सदर सीट विधायकों के दिवंगत होने के चलते खाली हुई है। समाजवादी पार्टी के विधायक पारसनाथ यादव की मृत्यु के चलते जौनपुर जिले की मल्हनी सीट पर उपचुनाव हो रहे हैं। अयोग्य साबित होने के नाते बांगरमऊ में उपचुनाव हो रहे हैं तो अदलाती विवाद में फंसी टूंडला सीट पर भी उपचुनाव हो रहे हैं। इनमें से बुलंदशहर, नौगावां सादात पर ही भाजपा ने दिवंगत विधायकों के परिजनों को टिकट दिया है, जबकि बाकी की सीटों पर पुराने कार्यकर्ता या जिताऊ प्रत्याशी को उतारा है।
विधानसभा के २०१७ के चुनाव में बीजेपी को अप्रत्याशित जीत हासिल हुई थी। कुल ४०३ में से ३१३ सीटें जीतने पर पार्टी द्वारा योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर दो कारणों से सुशोभित किया गया था। पहला तो यह कि वह हिंदुत्ववाद के अपने चिर-परिचित झंडे को और ज्यादा बुलंद करके देशव्यापी हवा को भाजपा के लिए सुनिश्चित करने में मददगार साबित होंगे और दूसरा यह कि सब कुछ ठीक चला तो कम उम्र होने के चलते भविष्य के प्रधानमंत्री पद के लिए वह एक मजबूत दावेदार साबित हो सकेंगे।
इसमें कोई शक नहीं कि इन साढ़े तीन सालों में योगी आदित्यनाथ ने अपने हिंदुत्व के प्रबल संवाहक के तौर पर स्थापित किया है। उनका गेरुआ वस्त्र और कठोर मुसलमान विरोधी रुख, हिंदू वोटर के जनमानस को अपनी ओर खींचने में सफल रहे हैं। एक प्रशासक के रूप में उनकी कुशलता और क्षमता पर जब तब सवाल भी खड़े हुए हैं। हाल ही में उनकी सरकार पर उस कानून-व्यवस्था के नाम पर सबसे ज्यादा हमले हुए हैं, जिसकी दुहाई देकर वो सरकार में आए थे। समूचे प्रशासन में नौकरशाही के दखल ने उनकी अपनी ही पार्टी के नेताओं, जनप्रतिनिधियों को दुखी किया है। पार्टी में उनके आलोचकों का मानना है कि कानून और व्यवस्था के पूरे तौर पर चरमरा जाने से आम मतदाता को भी बुरी तरह निराश और हताश किया है। बीते अनुभव बताते हैं कि उपचुनाव योगी आदित्यनाथ के लिए जबरदस्त सिरदर्द साबित होते हैं चाहे वे लोकसभा के चुनाव हों या विधानसभा के। पिछली बार के उपचुनाव में लोकसभा की तीनों सीटें तो वे हार ही गए थे। मौजूदा विधानसभा के अक्टूबर, २०१९ में हुए ११ सीटों के उपचुनाव के समय, उन्होंने एक सीट गवां दी थी और मुश्किल से ७ सीट जीत सके थे। इस बार मामला ज्यादा मुश्किलों भरा है, जब विपक्षी दलों के साथ उनके अपने भी नतीजों पर बारीकी से नजरें गड़ाए बैठे हैं।

(लेखक उत्तर प्रदेश अधिस्वीकृत पत्रकार संघ के अध्यक्ष हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति के जानकार और स्तंभकार हैं।)