लोकमंच- अवधी

कवि, व्यंग्यकार व संपादक डॉ. सुशील सिद्धार्थ का जन्म २ जुलाई, १९५८ को भीरा, सीतापुर (उ.प्र.) में हुआ था। उनकी मुख्य कृतियों में व्यंग्य संग्रह- प्रीति न करियो कोय, मो सम कौन, नारद की चिंता, मालिश महापुराण, हाशिए का राग, सुशील सिद्धार्थ के चुनिंदा व्यंग्य, कविता संग्रह बागन-बागन कहै चिरैया, एका (दोनों अवधी में) संपादित पुस्तकें- पंच प्रपंच, व्यंग्य बत्तीसी, श्रीलाल शुक्ल संचयिता के साथ कई पुस्तकें हैं। उन्हें अवधी से बड़ा प्यार रहा। १७ जुलाई, २०१८ को दिल्ली में उनका निधन हुआ।

महिमा
होय केतनेउ बिकट अंधेरु
जोति वैâ गीत जगाइब हो
जी लड़िहैं हक वैâ लड़ाई
उनकी महिमा गाइब हो
अपने सपनन का जोरि देति जी औरत के मन ते
गंगा निकसै गोमती बहति है उनके करमन ते
जी नखत तना चमकति हैं जग का राह देखावति हैं
अपने चरनन ते ई धरती का धन्य बनावति हैं
उनकी आरती उतारै खातिनि सबिता लाइब हो
जी सांचु कि खातिनि अगिनि परिच्छा देइं बढ़इं आगे
जिनकी आंखिन मां नान्हें नान्हें फूल रहइं जागे
हौसलन केरि पतवार लिहे कइ जाइं पार धारा
जिनकी उम्मीदन के आगे हर संकटु है हारा
उनकी राहन का अपने हाथन खूब सजाइब हो
गंगा जमुना जस करनी जिनके गीत जगत गावै
जिनकी गाथा मा परिवर्तन वैâ महामंत्रु पावै
उनके बचनन मा है रहीम औ राम केरि बानी
उनहेन तेने किरनै निकसैं सुखदायक कल्यानी
उनकी आवाज सुनति खन हम आवाज मिलाइब हो

एकाएका
रचै जिंदगी धरती अंबर पवन अगिनि औ पानी
समय सलामी देति फिरै सबु दुनिया लगै सुहानी
यावैâ सुर मा गाय रहे हैं
एका एका एका!
यावैâ मंत्रु बताय रहे हैं
एका एका एका!!
यहि की खातिनि फांसी चढ़िगा भगतसिंह मतवाला
सांस सांस मा यहै बसा है यू अमरितु का प्याला
सबिता नखत चनरमा यक्वैâ बात बतावति आवैं
द्याखौ हम तौ लाय रहे हैं
एका एका एका!!
भेदुभाव ते बिपदा उपजै टूटै भाईचारा
आगि बरै चौगिर्दा तइवैâ जमिवैâ चलैं पंवारा
बड़े नीक हैं जी अपने स्वारथ का पाछे कइवैâ
छप्पर तना छवाय रहे हैं
एका एका एका!!
देसु न सुधरी भूख न जाई मिटी न धांधागरदी
एकु भये बिनु रोकि न पइहौ ल्वागन वैâ मोटमरदी
जागौ द्याखौ सहर गाउं बन परबत करवट बदलैं
यहै धुजा फहराय रहे हैं
एका एका एका!!

पानी
कइसे गुजर अब होई अइसे गुजरिया
धंधा न पानी
सूनी परी है जइसे सारी नगरिया
धंधा न पानी
आपनि बिथा हम रोई पथरन के आगे
हमरे करेजे मइहां मुसवा हैं लागे
झांझर परी है हमने मन की चदरिया
धंधा न पानी
कारी अंधेरिया दउरै लै लै वैâ लाठी
लकड़ी वैâ घोड़वा लादे लोहे वैâ काठी
हमरे करम मा नाहीं कउनौ उजेरिया
धंधा न पानी
हउसन प पाला परिगे सपना झुराने
सातिर सिकारी द्याखौ बइठे मुहाने
का जानी अब को लेई हमरी खबरिया
धंधा न पानी