लोकमंच-अवधी

एन २४ न्यूज चैनल, लखनऊ में एंकर हेमलता त्रिपाठी मूलरूप से हिंदी की कवयित्री, लेखिका, कहानीकार व समीक्षक हैं पर वे कभी-कभार अवधी में भी लिखती हैं। उनका कहना है कि मैं अवधी इलाके गोंडा में जन्मी। इस लोकभाषा में जन-जीवन व संस्कृति तथा अपनेपन के चित्र मुखरित होते हैं। जीवन में सुख-दुख व परंपराएं अवधी लोकगीतों का मूल स्वर है। इनके लेखन से मुझे आत्मिक शांति मिलती है। वाजा इंडिया काव्य गौरव, लोकायन काव्य रत्न, साहित्य मिलन, गऊभारत भारती, विकलांग की पुकार विशिष्ट सम्मान व आशीर्वाद युवा लेखन प्रतिभा पुरस्कार विजेता हेमलता पत्रकारिता कोश मीडिया डायरेक्टरी की लखनऊ ब्यूरो हैं। उनकी कृति ‘ये आसमां की गुड़िया का’ काव्य संग्रह भारत पब्लिकेशन मुंबई से प्रकाशकाधीन है।
लोकगीत
छापक पेड़ छिउलिया त पतवन गहवर
रामा तेहि तर ठाढ़ि हिरिनियां त मन अति अनमनि।
चरत चरत हरिना हरिनी से पूछइ
की तोर चरहा झुरान कि पानी बिना मुरझिउं?
न मोर चरहा झुरान न पानी बिन मुरझिउं
हरिना आजु राजा दशरथ के छट्ठी तुहैं मारि डरिहैं।
मचियइ बैठी कौसिल्या रानी हिरनी अरज करइ
रानी मसुवा त रीझइ रसोइया खलरिया हमइ देतिउ।
पेड़वा से टंगतिउ खलरिया कि हेरि फेरि देखतिउं
रानी हेरि फेरि मन समझइतिउं जनुक हरिना जीतय
जाहु जाउ हिरनी घर अपने खलरिया नहिं देबइ
हिरनी! खलरी कइ खझड़ी मढ़उबय त राम मोर खेलिहैं।
जब जब बाजय खझड़िया सबद सुनि अनकइ
हिरनी दउरि ढखुलिया के बीच हिरना का बिसूरइ।
अमवां महुलिया
अमवा महुलिया घन पेड़ तेही के बीचे राहि परी
राम तेहि तर ठाढ़ि तिरियवा, मनहिं वैराग भरी
पूछइ लागे बाट कय बटोहिया अकेली घन का रे खड़ी
भइया चले जाउ बाट कय बटोहिया हमहिं रे तुहंय का परी
की रे तुहंय सास ससुर दुख दीन, कि नइहर तोर दूर बसइ
भइया हमइं नाहीं सास ससुर दुख दीन न नइहर दूर बसइ
भइया हमरा बलम परदेश मनहिं बैराग भरी
बहिनी तोहरा बलम परदेश तोहइं कछु कहि न गए
राम दइ गए कुपवन तेल हरफवन सेन्हुर
भइया अपनी दोहइया चरखवा उठाइ गजओबरि
भइया दइ गए अपनी दोहइया धरम जिनि छोड़िउ
भइया चुकइ लगे कुपवन तेल हरफवन सेन्हुर
भइया धुनइ लागे चनन चरखवा ढहइ गज ओबरि
भइया चुकइ लागी मोरी उमिरिया धरम लागे डोलइ
विवाह गीत
कौन की ऊंची अंटरिया सुरूज मुख छाई
किन घर कन्या कुंवारी त दुलहो चाहिय
ससुर की ऊंची अंटरिया सुरज मुख छाई
बाबुल घर कन्या कुंवारी त दुलहो चाहिय
कौन क पूर तपसिया आंगन मेरो तप करइ
सजन क पूत तपसिया अंगन मेरो तप करइ
भितरा से निकरी अजिया धार भर मोती लिहे
भितरा से निकरी मइया धार भर मोती लिहे
भितरा से निकरी भउजिया धार भर मोती लिहे
भितरा से निकरी बहिनिया धार भर मोती लिहे
लहु न पूत तपसिया अंगन मेरो छोड़उ
तुम घर कन्या कुंवारी त हमका बियहि देउ
बहरे से आए बीरन भइया हथवा खड़ग लिहे
मारौं न पूत तपसिया बहिन मोरी मांगइ
भितरा से निकरी बहिनियां कि मोतियन मांग भरइ
जिनि मारौ पूत तपसिया जनम मोर को खेइहैं