" /> लोकमंच: छत्तीसगढ़ी

लोकमंच: छत्तीसगढ़ी

आप जांजगीर-चम्पा छत्तीसगढ़ से हैं। इनका जन्म व शिक्षा छत्तीसगढ़ में ही हुई है। अभी मुंबई में लेखिका, गायिका व निर्देशिका के रूप में कार्यरत हैं। कविताएं, हिंदी-छत्तीसगढ़ी गीत, उपन्यास, लघु कथा, शोध-लेखन, अनेक विषयों से संबंधित लेख लिखती हैं। इनके द्वारा रचित दो पुस्तकों का प्रकाशन भी हो चुका है। इनकी कई सारी कविताओं को अब तक तमाम समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में स्थान मिल चुका है, साथ ही १५ से ज्यादा म्यूजिक एल्बम व कई फिल्मों में इनके लिखे गाने भी रिलीज हो चुके हैं। इतना ही नहीं यह कई लघुकथाओं पर फिल्म भी बना चुकी हैं।

जीवन के मिठास भुला गेन
बोइर इमली चोरा-चोरा के लावन
कहूं ल कछु खात देख ललचावन
घामेघाम अमराइया के आम टोरे जावन
नून धर पारा म घूम-घूम के खावन
जब ले वो बचपन के एहसास गंवा देन
तब ले जीवन के मिठास भुला गेन
नावा सामान मिलय त इतरावन
नावा अंगरखा पहिन के मटमटावन
बिन सोच बिचारे कछु भी कही आवन
संगी संग कतको लड़ाई होके मिलजावन
जब ले वो बचपन के एहसास गंवा देन
तब ले जीवन के मिठास भुला गेन
पहुना आवय त बिना तिहार तिहार मनावन
बढ़िया खाय पिए ब मिलही कईके झूमन गावन
पहुना मन ल देख के अऊ ज्यादा उपदरो मचावन
पैसा देके जाहि सोच के दुवारी के बहार छोड़े जावन
जब ले वो बचपन के एहसास गंवा देन
तब ले जीवन के मिठास भुला गेन
का जाने कब प्राण देह
छोड़ निकल जाए
दो घरी के जीवन संगी का जाने कब बुता जाए
आज जियत हन, कल आत्मा प्राण छोड़ जाही उड़याय
कुछ बेरा जम्मों संग मया बांट के लेवा बिताय
का जाने कब प्राण देह छोड़ के निकल जाए
कई युग याद रथे वो जे दया मया के फूल बगराय
मयारू मइनखे जब तक जिथे धरती म रखथे बैकुंठ बसाय
बैरी ल कोन याद करे बैरी मरे म कोनो नी शोक जताय
का जाने कब प्राण देह छोड़ के निकल जाए
अगले जनम का जाने, का बनके जनम आय
बड भाग वाला जीव ही धरती म मानुष के तन पाय
ऐसे जिया ये जीवन ल की सब्बो जनम सफल हो जाय
का जाने कब प्राण देह छोड़ के निकल जाए
हमर जीवन सम्हाले ब तयं अपन जीवन बार देहे
हमर जीवन म महतारी, तोर उपकार हावे
दुनिया म जम्मो ले जायदा, तयं प्यार देहे
अपन करे के तयं, हमनसे न कबहु हिसाब लेहे
हमर जीवन सम्हाले ब तयं अपन जीवन बार देहे
बिना कछु मजदूरी लेहे, जी जान अउ प्रान देहे
कतको दर्द दुख सहे मुह ले कबहू कछु नी कहे
जीवन के धूप म, हर पग म तयं छाव बने रहे
हमर जीवन सम्हाले ब तयं अपन जीवन बार देहे
बिना कछु कहे बोले हमर मन के गोठ ल जान लेहे
हमर जीवन सीचे बर सब सह के जीवन निकाल देहे
कठिन घरी म भी तयं अपन रिश्ता फर्ज निभा लेहे
हमर जीवन सम्हाले ब तयं अपन जीवन बार देहे