लोकमंच : निमाड़ी

कवि विजय जोशी ‘शीतांशु’ की शिक्षा एमए हिंदी साहित्य तथा अंग्रेजी साहित्य तक हुई है। उनकी मूल विद्या लघुकथा है। उनके २ संग्रह ‘आशा के दीप’ एवं ‘ठहराव में सुख कहां?’ प्रकाशित हुए हैं। लघुकथा संकलन ‘सीप में समुद्र’ लघुकथा टाइम्स में आंचलिक लोक भाषा पर स्तंभ में नियमित लेखन सहयोगी संपादक के रूप में, नार्मदीय लोक, नार्मदीय जगत में रचना लघुकथा प्रकाशन। प्रतिष्ठित दैनिक अखबारों में मधुरिमा परिशिष्ट दैनिक भास्कर, नायिका परिशिष्ट नई दुनिया, दृष्टि गुड़गांव, विशेषांक में लघुकथा शामिल। जेएमडी सम्मान, श्रेष्ठ शिक्षक सम्मान, कवि काव्य सम्मान, उत्कृष्ट शिक्षक सम्मान, प्रदेशस्तरीय ‘देवकी नंदन माहेश्वरी’ सम्मान मिल चुका है। संग्रह ‘आशा के दीप’ पर लघुकथा लहरी सम्मान लहित कई सम्मानों से सम्मानित विजय जोशी एक उत्कृष्ट कवि भी हैं।
गांव की चौपाल
लड़कपन की अठखेली ने
पणी हारिण की फोड़ी मटकी ने
करी शरारत इसकूल छोड़ी ने
गांव की चौपाल पे।।
मीरा-राधा, श्याम-गौरी सी
मिल मिलाव, चोरी-चोरी सी
सांज ढल, घणी देरी सी
गांव की चौपाल पे।।
वा शरद पूनम की बात
चांद खे देखणु सारी रात
हुई अमरत की बरसात
गांव की चौपाल पे।।
झूम नांच, गावे आधी रात
गरबा, खेल, अंबा का सात
शरद को चांद, माथ धर हात
गांव की चौपाल पे।।
होली को फाग उड़ाव
दीयो दिवाली को लगाव
गल मिली ने, ईद मनाव
गांव की चौपाल पे।।
रातभरी चकवो चांद खा चावे
चकवी निशभर आंसू टपकावे
दिन में दुइ लाड़ लड़ाव
गांव की चौपाल पे।।

आओ म्हारो गांव
आओ-आओ रे पावणा देखो म्हारो गांव।
धरती या निमाड़ की यां छे म्हारो ठांव।
खेत मेड़ पे अंबा खळा म आमली झाड़।
जेका अद्दर बठी पखेरू खोब लड़ावज लाड़।
वड़ पिपळो न लीम देज गयरी-गयरी छांव।
आओ-आओ रे पावणा देखो म्हारो गांव।
मीनत करन्या हळधर बेटा, खेत-खेत हरियाली।
सोन्नो उगळज पाणी पी ने माटी काली-काल्ी।
रेवाजी का खोला म चलज प्रेम की नांव।
आओ-आओ रे पावणा देखो म्हारो गांव।
टिक्कड़ खावांज ज्वार का अम्माडी की भाजी।
रूखो सुखो खाई पी रया सदा हम राजी।
घर फोड़नइं लछमी को कदी चल्यो नी दांव।
आओ-आओ रे पावणा देखो म्हारो गांव।
चैत, निमाड़ म मच गणगौर की धूमधाम
धणीयर राजा, लेण आया रणुबाई धाम
अंबा म सखी सहेली संग पाती खेल गांव
आओ-आओ रे पावणा देखो म्हारो गांव।।
याणी-याणी म सी न्हाव, कार्तिक मनाव
सांझ पड़ी रेवा जी का पाणी दीया सिराव
मंडली न गाव, सिंगा जी की भक्ति को भाव
आओ-आओ रे पावणा देखो म्हारो गांव।

नवा साल में
नवा साल में, नवा-नवा हुई जावां जी
नवा जोश में जवा-जवा हुई जावां जी
परेम भाव का गीत गावां हित्तूभाई सी मेल मिलावां
बोल चाल मे सदा मिसरी घोळता जावां जी।
नवा साल मे नवा नवा हुई जावां जी।
काई खोयो, काई पायो तने सारो धन गमायो
बेटा, काई फरज निभायो साल को, हिसाब लगावां जी
नवा साल मे नवा-नवा हुई जावां जी।
तीज तिवार पे मिली जुली
घर-घर खुशी वाटता जावां
पैâशन का रंग में न रंगा
परेम की रीत निभावां जी
नवा साल में नवा-नवा हुई जावां जी।
नफरत को मुळ माथो न मिल
परेम भाव की फसल पाके
जीवन की धरती पेशीतांशु,
मईनत को इज वावां जी।
नवा साल मे नवा-नवा हुई जावां जी।