लोकमंच – भोजपुरी

डॉ. विमल हिंदी के साथ ही भोजपुरी के भी एक वरिष्ठ साहित्यकार हैं। आप अपनी कविताओं में कहीं आधुनिक तो कहीं उत्तर आधुनिक कवि के रूप में नजर आते हैं मगर सिर्फ आधुनिकता के नाम पर परंपरा के विद्रोह आपके स्वभाव में नहीं दिखता। भिन्न पीढ़ियों में, पारंपरिक और वैज्ञानिक सोच में एवं देश और विदेश की विभिन्न संस्कृतियों में आप जहां एक धीरप्रशांत संतुलित चिंतनशील रचनाकार के रूप में नजर आते हैं, वही मोती चुगनेवाले राजहंसों की भूमिकावाले एक समन्वयक के रूप में भी दिखाई पड़ते हैं। जहां इन्होंने अपने काव्य संग्रह के आरंभ में सरस्वती वंदना कर भारतीय परंपरा का निर्वाह किया है, वहीं ‘बिहान होई’ और ‘आंखि लागि गइल’ जैसी कविताओं में शिल्प और भाव दोनों धरातल पर समकालीन संवेदना से गहरे जुड़े हुए नजर आते हैं। ‘जिम्मेदारी’ और ‘अनुभव’ जैसी कतिवाओं में बृद्धिसंवेद्य पाठकों के लिए योगाभ्यास का पूरा अवकाश है। डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल का ‘फगुआ के पहरा’ भोजपुरी का अनूठा काव्य-संग्रह है। विमल भोजपुरी के बहुचर्चित रचनाकार हैं। ये अनेक पुस्कारलब्ध और सम्माप्राप्त साहित्यकार हैं।

ना शिकाइति कुछो बाटे उनसे
ना शिकाइति कुछो बाटे उनसे
दोष बा भागिए के हमार हो।
प्यार के हाथ जब-जब बढ़वलीं
नेह के गीत हियरा कढ़वलीं
नाहिं पवलीं अघाए कबहुंओ
तार टूटल हिया के हजार हो।

लाख चहलीं के उनके भुलार्इं
दीप सुधिया के हम ना जरार्इं
बाकी अजबे चढ़ल रंग आके
होत जाता दरद चटकार हो।

आजु नयना या पानी बहाइत
कंठ छने-छने ना रूँधि पाइत
ना उमिरिया बिरह में जरइतीं
टूटि जाइत भरम जे हमार हो।

प्यार पाके कबो ना जुड़इलीं
जिंदगी भर हमेशा पिरइलीं
बाकि रहबार अब ना ई टूटी
छूटी अब ना विमल के बजार हो।
बेटी प्यार के कहानी होली
बेटी प्यार के कहानी होली माई बाप के
बेटी अंखियन के पानी होली माई बाप के
केकरा के पानी चाहीं केकरा के खाना
कहां गीत गाके बाटे नेवता पुराना
बेटी नइहर के नानी होली माई बाप के।
सासु आ ससुरजी के करेली ऊ सेवा
सभके खिलावेली ऊ नेहिया के मेवा
बेटी ससुरा के रानी होली माई बाप के।

दुशमन जो तकिहें त अंखिया निकलिहें
अनको के दुख बेटी अपने समझिहें
बेटी आग कबो पानी होली माई बाप के।

ससुरा खातिर तन मन धन अरपन
बलमा प सब सुख करेली समरपन
बेटी त्याग के कहानी होली माई बाप के।