लोकमंच: वोट-वोट चिल्लाय

 

व्यंग्य की दुनिया में बेहद सक्रिय रचनाकार शशि पांडेय पेशे से हिंदी प्रवक्ता हैं। उनके लेखन की विधा समसामयिक लेख, समीक्षा, व्यंग्य, कविता, गीत का सृजन है। साथ ही उन्होंने नारी सशक्तीकरण पर भी काफी कुछ लिखा है। उनकी प्रकाशित रचनाएं चौपट नगरी, अंधेर राजा (व्यंग्य संग्रह), व्यंग्य बत्तीसी (साझा व्यंग्य संग्रह),नए नवेले (साझा व्यंग्य संग्रह), व्यंग्य के नवस्वर (साझा व्यंग्य संग्रह) तथा लेडिज डॉट काम (साझा व्यंग्य संग्रह) हैं। उन्होंने पत्रिका ‘लोकोदय’ तथा लमही में परिचर्चा संयोजित की है। साथ ‘अट्टहास’ पत्रिका के महिला व्यंग्य विशेषांक का संपादन किया है। मेरी व्यंग्य यात्रा , व्यंग्य की बलाओं किताब का संपादन किया है।

दई वोट वोटै वोट रहे चिल्लाय
गलिन मा कुकुरमुत्ता हंस रहे उतराय
पांच साल जम वैâ किन्हौं राज
भए एत्ते दिन देखाई दिन्हौं आज
जनता का बनाएव खूब बइकल
खूब उड़ेव जहाज जनता चलै सइकल
होइगा तुम्हार अब आगे अउ न चली
जनता सही मा बिन सरकार वैâ भली
जबहिन खोलै मुंह किन्हौं गुर गोबर
तुमसे नीक तौ सर्कस क्या जोकर?

कलेजा मेरा यूं धड़के रे!
कलेजा मेरा यूं धड़के यूं धड़के रे
कबहुं न मोरे सइयां लावै रंग पिचकारी
कभी न खेला जिया भर के जिया भर के रे
कबहुं न मोरे सइयां लावै भांग ठंडाइया
कभी न पिया खाया जी भर के जी भर के रे
कबहुं न मोरे सइयां लावै लड्डू पेड़ा
कभी न खाया जिया भर वैâ जिया भर के रे
सुनेव सइयां मोरे हम मइके चले जइबे
रहि लेहेव बिना जिया भर के जिया भर के रे
सुनते ही रातिन सइयां सब लइ आए
सबेरे खेली, खाई जिया भर के जिया भर के रे

हुई गै स्वच्छता अभियान
हुई गै स्वच्छता अभियान वैâ
क ख ग घ, च छ ज इयां
खैनी, पान खा-खा वैâ
पीक मार रहे भइया
तौ जहां-तहां कुल्ला वैâ
भउजी मचा रही ता-ता थाइया
भारी संकट है यात्रीजन वैâ
कौनो तान पार कइ देहेव नइया
सफाई मा मिलैं नंबर वैâ
कचरा फेंवैâ वाले हैं पुछवइया
थक गै सब कहि-कहि वैâ
कोऊ न कहुं के मानै भइया
हार गए नेतन का कहि-कहि वैâ
बातैं कवै बंद करिहैं ढरकइया