लोकमंच

लेखक, स्वतंत्र पत्रकार व युवा कवि देवेंद्रराज सुथार राजस्थान के जालोर जिले के बागरा कस्बे के रहनेवाले हैं। बचपन से इनकी विशेष रूचि साहित्य में रही है। इनकी रचनाएं कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी है। साथ ही, कई छोटे-मोटे पुरस्कार भी मिल चुके हैं। फिलहाल देवेंद्रराज कला संकाय के साथ स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रहे हैं।
जात…
मैं पूछियो पशुओं सूं
कि थारी जात का है?
बोलिया सबे एक हाथी
म्हारी जात पशु है…
पक्षियों से पूछियो
बतां थारी जात का है?
बोलिया सबे एक हाथी
म्हारी जात पक्षी है…
मैं पूछियो नाली म्हानै
रेंगते सूअर नै…
बतां थारी जात का है?
तो वो भी बोलियो
मालिक!
म्हारी जात तो सूअर है…
पर, ओ सवाल मैं
जब इंसाने रे बच्चा सूं पूछियो…
बतां थारी जात का है?
जर जवाब एक कोणी मिलियो…
सब रो जवाब अलग-अलग आयो…
इयां सुण म्हारी नजरा झुक गई…
शर्म आवण लागी इंसानियत मातै
दम घुटन लागो…
आजादी री इण फिजा म्हानै
दर्द सू सीनो दुखण लागो…
ईश्वर तो इंसान पैदा करियो…
पर वो जाति रो बीज बोवण लागो…
किन्हा को हिंदू तो
किन्हा को मुस्लिम बतावण लागो…
अच्छो है! पशु-पक्षियां…
थारे म्हाने अक्ल घनी कोणी होवे है…
वरणा थै भी बंट जाता
नै अपनी पशुता और
पक्षिता सूं हट जाता…
कलयुग…
आज इंसान नै
सांप कोणी डस रियो…
इंसान नै इंसान ही डस रियो…
घृणा नै नफरत रो
जहर आपस म्हानै उगल रियो…
पड़ोसी रो सुख देखण..
कळोजा सू धुआं उठ रियो…
छोटी सी दुनिया म्हानै
कतरी छोटी सोच वै गई
दरियादिली कठे खो गई
रिश्तों रो बाजार लागौ…
मर्यादा रो जनाजो उठ गयो
इंसान रो इंसान मातै
विश्वास जब सूं उठ गयो
तब सूं घरा रे बाहरे
मोटो सो तालो लग गयो…
ठूंठ…
इंसान बोवै है
इंसानी बीज
स्त्री रे कोख म्हानै…
पछै नव महिना रे बाद
उग आवै है…
पौध रे शक्ल म्हानै
नन्हो टबरियो…
पछै समय रे हाथी
टबरियो वनै है…
मोठियार..
जिकण पौध वनै है
वटवृक्ष…
जिण री खुद री वै
शाख-पत्ती, फल-फूल…
जो सींचे
प्रीत रो पोणी
नै अपनत्व री खाद सूं…
एक दिन
जुदा हो जावै….
टहनियां, फल-फूल नै
हवा म्हानै लहराता पतो
सबे दूर हो जावै…
काले तक छांव देतो…
आज ठूंठ बनकर रै जावै…
मिनखां रै हाथी भी…
ऐसो ही होवै…