" /> लोकमान्य तिलक के लिए कर्म ही थी पूजा

लोकमान्य तिलक के लिए कर्म ही थी पूजा

देश में जब भी महान क्रांतिकारियों की बात होगी तो उसमें बिना लोकमान्य बालगंगाधर तिलक के वह अधूरी होगी। प्रखर देशभक्त और कर्म के पुजारी तिलक जी को देश हमेशा याद रखेगा। बालगंगाधर तिलक (१८५६-१९२०) ने प्रारंभ से ही जनता की सेवा का व्रत ले रखा था। सन १८७९ में बीए व एलएलबी की परीक्षा पास कर लेने पर घरवाले, मित्र सब आशा कर रहे थे कि वे अब वकालत कर खूब पैसा कमाएंगे किंतु उनके मन में कुछ और ही था। तिलक ने अपनी संपूर्ण सेवाएं एक शिक्षा संस्थान के निर्माण के लिए अर्पित कर दी।

इसके परिणाम स्वरूप वर्ष १८८० में `न्यू इंग्लिश स्कूल’ और उसके ४-५ वर्षों बाद `फारग्युसन कॉलेज’ की स्थापना की गई। यह कहना ज्यादा सही होगा कि महाराष्ट्र में जो उल्लेखनीय जन-जागृति और सामाजिक उत्थान की लहर चली उसमें इन दो शिक्षा संस्थाओं से निकलनेवाले विद्यार्थियों का बड़ा हाथ था। १९वीं शताब्दी के अंत मे भारतवर्ष में प्लेग की बीमारी तीव्रता से पैâली थी। कोलकाता जैसा बड़ा शहर उजाड़ सा हो गया था। सेना बुलानी पड़ी थी। इस बीमारी का प्रकोप जब पुणे में पैâला तो हालत बहुत गंभीर हो गई। ब्रिटिश सरकार ने जो गोरे अफसर पुणे में नियुक्त किए थे उनका व्यवहार जनता के साथ कठोर और अपमानपूर्ण था। इससे लोगों में असंतोष का भाव इतना अधिक पैâल गया कि दो युवकों ने `रैंड’ नामक अंग्रेज अफसर की हत्या कर दी। इस घटना से अंग्रेज क्रुध्द हो उठे और चारों ओर दमन करना शुरू कर दिया था। सरकार की इस नीति का तिलक ने कड़ा विरोध किया और दमन करनेवाले अधिकारियों को दोषी ठहराया। इस बात पर सरकार ने तिलक को मानहानि का दोषी बताकर गिरफ्तार कर लिया और १८ महीनों की कड़ी वैâद की सजा सुना दी। जेल में उन्हें बहुत यातनाएं दी गईं। सब प्रकार का काम कराया गया और खाने में खराब भोजन दिया गया। जिससे उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर हुआ। परिणामत: वे बीमार हो गए। ये खबर सुनकर मैक्समूलर, सर विलीयम हंटर, विलीयम केन, दादा भाई नौरोजी जैसे प्रसिध्द व्यक्तियों ने इंग्लैंड की सरकार से कहा कि तिलक के समान विद्वान व्यक्ति के साथ ऐसा दुर्व्यवहार किया जाना कलंक की बात होगी। आखिर ब्रिटिश सरकार को उन्हें १ वर्ष में छोड़ना पड़ा।
लोकमान्य तिलक ने जन-जागृति का कार्यक्रम पूरा करने के उद्देश्य से महाराष्ट्र में दो राष्ट्रीय त्योहारों का प्रचलन किया। एक
`गणपति उत्सव’, दूसरा – `शिवाजी जयंती’। गणपति की मान्यता महाराष्ट्र में प्राचीनकाल से है। तिलक जी ने बंगाल की दुर्गा पूजा की तरह १० दिन तक पूजने और साथ में तरह-तरह के राष्ट्रीय तथा सामाजिक महत्व के कार्यक्रम सम्मिलित कर उसे लोकशिक्षा का माध्यम बना दिया।
छत्रपति शिवाजी महाराज का उदाहरण तो राष्ट्रीयता की दृष्टि से अनुपम है ही। उन्होने विदेशियों के आक्रमण से स्वधर्म और स्वदेश की रक्षा के लिए आजन्म कार्य किया। इन उत्सवों के कारण २-३ वर्षों में ही जनता ऐसी जागरूक हो गई कि ब्रिटिश सरकार उससे डरने लगी और उसने ऐसी चाल चली की पुणे और मुंबई में भयंकर हिदू-मुस्लिम दंगे शुरू हो गए। सरकार ने इसका दोषारोपण शिवाजी जयंती पर किया कि उसी के कारण मुसलमान रुष्ट हो गए और हिंदुओं से लड़ बैठे। इस पर तिलक ने निर्भीक होकर अपने पत्र केसरी’, जो उन्होंने १८८१ में शुरू किया था, में लिखा- मैं समझता हूं कि इन झगड़ों का कारण सरकार ही है। उसकी पक्षपातपूर्ण नीति के कारण दंगे हुए। लॉर्ड डफरिन की भेद नीति ही इन दंगों का मूल है। देश में सरकार द्वारा हिंदू-मुस्लिम द्वेष के बीज बोए जा रहे हैं। उन्होंने हिंदुओं से संगठित होने का आह्वान किया।
सन १९०७-०८ में तिलक जी ने कांग्रेस को सरकार के मुकाबले में क्रांतिकारी कार्यक्रम अपनाने की प्रेरणा दी तो सरकार बौखला गई और उसने उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाकर ६ वर्ष के देश निकाले का दंड दे दिया। लोकमान्य का गीता रहस्य उनके जेल से छूटने के बाद जब प्रकाशित हुआ तो उसका प्रचार तूफान की तरह बढ़ा। जिससे भारतीय जनता स्वयं ही कर्तव्य पालन की प्ररेणा प्राप्त करती रही। सरकार डर रही थी कि जब तक वे भारतीय जनता के निकट रहेंगे उनका क्रांतिकारी व्यक्तित्व सर्वसाधारण को प्रभावित करता रहेगा। इसलिए उनको बर्मा की मांडले जेल में रखा, जहां कोई उनकी भाषा समझने वाला न था। सरकार की कुचाल को समझकर तिलक जी ने भी अपना ध्यान गीता के अध्ययन में लगाकर ६वर्ष में एक प्रेरणाप्रद भाष्य, गीता रहस्य लिखा।
एक बार किसी ने तिलक से पूछा-भारत में स्त्रियां अच्छा वर पाने के लिए गौरी व्रत करती हैं लेकिन पुरुषों के लिए ऐसी कोई व्यवस्था क्यों नहीं है?
तिलक जी ने जवाब दिया कि भारत की स्त्रियां सभी अच्छी हैं। कठिनाई केवल अच्छे पुरुष ढूंढ़ने की है। एक बार तिलक जी कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने लखनऊ गए थे। काम की व्यस्तता बहुत थी। सुबह से दोपहर तक काम से जरा भी अवकाश ना मिला। बड़ी मुश्किल से भोजन का समय मिला। भोजन के समय एक स्वयंसेवक ने कहा कि महाराज आज तो आपको बिना पूजा किए ही भोजन करना पड़ा?
तिलक ने गंभीर होकर उत्तर दिया कि अभी तक हम जो कर रहे थे क्या ये पूजा नहीं थी? यानी वे काम को ही पूजा समझते थे। जब पुणे में भयंकर प्लेग फैला तो तिलक जी के बड़े बेटे को भी प्लेग हुआ। पुत्र की दशा चिंताजनक होते हुए भी तिलक `केसरी’ का अधूरा अंक पूरा करने के लिये कार्यालय चले गए। लोगों के कहने पर बोले-सारा महाराष्ट्र `केसरी’ की प्रतीक्षा कर रहा है। बेटे से ज्यादा महत्वपूर्ण देश और जनता है।
तिलक जी कभी भविष्य की चिंता नहीं करते थे। जब वे न्यू इंग्लिश स्कूल में सिर्फ ३० रुपए प्रतिमाह लेते थे तो उनके एक मित्र ने कहा कि इतनी कम राशि में तो आपके देहावसान के बाद आपका अंतिम संस्कार भी ना हो पाए।
तिलक जी ने जवाब दिया कि इसकी चिंता समाज को होनी चाहिए। यदि लोगों को ठीक प्रतीत होगा तो वे इस देह का अंतिम संस्कार कर देंगे।
लोकमान्य तिलक एक निडर, राष्ट्र को पूरी तरह समर्पित, महान उद्देश्य के प्रति संकल्पनिष्ठ देशभक्त थे। ऐसे महान व्यक्ति का आज स्मृति दिवस है। प्रखर देशभक्त लोकमान्य तिलक जी को बारंबार प्रणाम।