" /> वर्चुअल रैलियां और नेपालियों की उछल-कूद

वर्चुअल रैलियां और नेपालियों की उछल-कूद

कोरोना संकट के बीच घरेलू राजनीतिक गर्माहट के साथ-साथ पड़ोसी देशों की उछल-कूद भी आरंभ हो गई। बिहार-बंगाल विधानसभा चुनाव की सुगबुगाहट बीते सप्ताह दिल्ली से वर्चुअल रैलियों और बेमिनार सभाओं से श्रीगणेश हुआ। गृहमंत्री अमित शाह ने दिल्ली स्थित भाजपा मुख्यालय से बिहार और पश्चिम बंगाल की जनता से वर्चुअल रैली के माध्यम से रूबरू हुए। ये अलग बात है कि वर्चुअल रैलियों में रीयल जैसी फीलिंग न आए, लेकिन काम चल रहा है। वहीं, दूसरी बड़ी घटना पिछले ही सप्ताह पड़ोसी पहाड़ी देश नेपाल द्वारा घटी। नेपाली सैनिकों ने भारत-नेपाल सीमा पर ताबड़तोड़ गोली चलाकर हमारे एक सैनिक को मार डाला। नेपाल के क्षेत्र नारायणपुर में बीते शुक्रवार तड़के कई राउंड फायरिंग हुई है, उस घटना से भारत और नेपाल के रिश्तों की दीवारों को दरका दिया है, भयंकर तनातनी का माहौन उत्पन्न हो गया है।

केंद्र सरकार भी हैरत में है कि नेपाल भला इतनी हिमाकत कैसे कर सकता है? दशकों से शांत पड़ी दोनों देशों की सीमाओं में अचानक ऐसा माहौल क्यों बना। नेपाल ने ऐसा क्यों किया? इस बात की तहकीकात फिलहाल केंद्र सरकार अपने स्तर से कर रही है। लेकिन जो तथ्य और सूचनाएं सामने आई हैं, उससे पता चला है कि इस घटना के पीछे चीन का हाथ है, उसने ही नेपाल को उकसाया है। दरअसल, चीन भारत को उनके सभी बॉर्डर इलाकों में घेराबंदी करने की फिराक में है। लद्दाख में वह जो कर रहा वह किसी से छिपा नही है। सवाल उठता है केंद्र सरकार किस बात का इंतजार की रही है? क्यों हाथ पर हाथ रखे बैठी है? नेपाल सरकार ने गोलीकांड पर सफाई देते हुए कहा कि कुछ भारतीय तस्कर जो उनकी सीमा से जबरन घुस रहे थे। नेपाली सैनिकों की राइफलें छीनने की कोशिशें कर रहे थे, तभी अपनी आत्मरक्षा में उनके सैनिकों ने गोली चलाई। पर मामला कुछ और है?

गौरतलब है उस घटना को भारत-नेपाल नक्शा विवाद से जोड़कर देखा जा रहा है। पिछले दिनों नेपाल ने अपनी संसद में नक्शे में संशोधन की मंजूरी दी है। इस नए नक्शे में नेपाल ने भारत के कुछ इलाकों को अपना बताया है। नेपाल सरकार द्वारा जारी नये नक्शे में लिम्पियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख को नेपाल की सीमा में दिखाया गया है। नेपाली संसद द्वारा स्वीकृत उस नक्शे पर भारत सरकार ने कडा विरोध जताया है। नेपाल की कैबिनेट ने इसे अपना जायज दावा करार देते हुए कहा है कि महाकाली (शारदा) नदी का स्रोत दरअसल लिम्पियाधुरा ही है जो फिलहाल भारत के उत्तराखंड का हिस्सा है। नेपाल उसे भारत पर वापस लेने का दबाव डाल रहा है। इसके पीछे अप्रत्यक्ष रूप से चीन की ही खुराफात है। उसी के बहकावे में आकर नेपाल कूद-फांद मचा रहा है। लेकिन ये तय है नेपाल ‘न घर का रहेगा न घाट का’! अपना उल्लू सीधा करके चीन रफूचक्कर हो जाएगा।

फिलहाल नेपाल में इस घटना को लेकर काफी उबाल है। वहां संसद से लेकर सड़क तक आंदोलन हो रहे हैं। नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की सरकार ने इस सिलसिले में भारत के समक्ष लिपुलेख इलाके पर नेपाल के दावे को दोहराते हुए कड़े शब्दों में कूटनीतिक विरोध लगातार दर्ज करा रहे हैं। वैसे देखा जाए तो, उस क्षेत्र को लेकर भारत-नेपाल में विवाद तकरीबन २०० साल पुराना है। १८ वीं शताब्दी में नेपाल और ब्रिटिश राज के बीच युद्ध के बाद १८१५ में एक समझौता हुआ जिसमें यह तय हुआ कि ये क्षेत्र ब्रिटिश राज के अधीन होगा। उन दिनों भारत पर ब्रिटेन का शासन था और भारत का कहना है कि इस समझौते के अनुसार यह क्षेत्र भारत का है।

नेपाल के इतिहासकारों, अधिकारियों और गुंजी गांव के लोगों का कहना है कि नेपाली पक्ष के पास इस बात को लेकर पर्याप्त सबूत हैं कि सुगौली की संधि के अनुसार लिपुलेख और उस इलाके के कई गांव नेपाली क्षेत्र में आते हैं। विवाद दूसरे इलाकों को लेकर भी है। नेपाल की सरकार लगातार इस बात पर जोर देती रही है कि लिपुलेख और गुंजी गांव के अलावा भारत ने महाकाली नदी के उत्तर में उससे लगे इलाकों पर भी कब्जा कर रखा है जिसमें कालापानी भी शामिल है। अब जो नया नक्सा नेपाल ने बनाया है उसमें इन क्षेत्रों को उन्होंने अपना बताया है। यहीं से नया विवाद आरंभ हुआ है। केंद्र सरकार फिलहाल इस मसले पर शांत है, कोई जवाब नहीं दिया। लेकिन आने वाले वक्त में यह मसला और उलझेगा, ये तय है।

बिहार और पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव का शंखनाद तकरीबन हो चुका है, बिगुल बच गया है। इन तैयारियों के बीच में नेपाल ने टांग अड़ाकर चुनावी माहौल के रंग को फीका कर दिया है। घटना छोटी नहीं, बड़ी है? चुनाव हों या कोरोना संकट केंद्र सरकार के लिए जरूरी हो जाता है कि समस्या को जल्द से जल्द सुलझाए। घटना की असल जड़ पर अगर थोड़ा फोकर करें तों कई बाते स्पष्ट हो जाती हैं। आठ मई को जब रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने लिपुलेख से होकर गुजरने वाले उत्तराखंड-मानसरोवर रोड का उद्घाटन किया था, राड़ तभी से शुरू हो गई थी। दरअसल, लिपुलेख वह क्षेत्र है जो चीन, नेपाल और भारत की सीमाओं से एकदम सटा हुआ है। इस पर नेपाल का तर्क है कि वह क्षेत्र उनकी सरहद में आता है, जबकि भारत का दावा है कि यह इलाका उनका है। बस यहीं से तनातनी शुरू हुई। शुरुआत में भारत सरकार ने मसले को हल्के में लिया। पर, नेपाल अंदर ही अंदर खुन्नस पाले बैठा रहा। इस बीच उसे चीन की सपोर्ट मिली। उसके बाद उन्होंने कूदफांद मचानी शुरू कर दी। मामला धीरे-धीरे गोलीबाजी तक पहुंच गया। हालांकि बीते दिनों नेपाल के रक्षा मंत्री बोल ही चुके थे कि ‘मौका आने पर उनकी सेना भी लड़ने को तैयार है’।